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द्वितीय परिच्छेद: भाग 5

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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तो ये परिचित भाग पांच शिवलाल पेपर मिल में था । जब उसका पिता मकान खाली कर गांव चला गया तो वह अपने मित्र के क्वार्टर में रहने चला गया । उस दिन वह मैंने जबकि कमरे की बाहर जा खडा हुआ । वह जानना चाहता था कि कहीं उसकी नौकरी भी उसके पिता के सम्मान समाप्त तो नहीं कर दी गई । फैक्ट्री के नियमानुसार उसके अधिकार थे और वह अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए दावा कर सकता हूँ । जब नंदलाल कार्यालय में पहुंचा तो सिविल डालने सामने उपस् थित हो । सलाम कर पूछ लिया मेरे लिए क्या होगा? मैं किस विषय में? कारखाने में काम करने के विषय में मैं काम करता रहूँ अथवा हूँ । अपना हिसाब किताब ले जाऊँ । यदि कहूँ कि तुम भी चले जाओ तो चले जाओगे अथवा झगडा करोगे । आप क्या समझते हैं उसको झगडा करना चाहिए अथवा नहीं? झगडा करने से तो तुम्हारा बनेगा कुछ ये आप नहीं जान सकते । आप क्रोध में बुद्धि खो चुके हैं । मैं आपसे बहस करने के लिए नहीं आया । मैं केवल आ गया । जानना चाहता हूँ इस की जरूरत क्या है । जरूरत इसलिए है कि आपने पिताजी को अकारण निकाल दिया है और गोद में आदमी कुछ भी कर सकता है । तुम सब पगले हो रही हूँ । मेरे मन में क्रोध नहीं है । मैं सब बातें ठीक ढंग से विचार कर ही कर रहा हूँ तो मेरे लिए आगे लिख कर दीजिए । मैं आपके अधिकारों से लडना चाहता हूँ तो तुम्हारे लिए कोई अज्ञानी जिसको लिख कर दिया जाए? अच्छी बात है । मैं अपने कार्य पर जा रहा हूँ । इतना कह शिवलाल अपने काम पर चला गया । नाम डाल के मन में ये वह समझ आ गया कि उस की नौकरी नहीं रहेगी । इसलिए तो शिवलाल को निकालने से डर गया । वो समझने लगा कि अधिकारियों के नाराज होने की अवस्था में छोटी सी गलती भी पहाड सामान दिखाई देने लगेगी । रामसिंह तो उसका निजी सेवक था । उसके साथ क्या व्यवहार कंपनी के काम के अंतर्गत नहीं था । गोपाल को पता चल गया । किसी लाल अब भी मिल में काम करता है । इससे मैं एक रविवार को आया और शिवलाल से उसके पिता का पता हूँ पूछ गया । उसने राधा के नाम माता के भेजे रुपये में से एक सौ का मनी अगर भेज दिया साथ ही एक पत्र लिख दिया । तो ये राधारानी मेरी कारण जो पिताजी को और तुम को कष्ट हुआ तो उसके लिए मुझे भारी दुख यद्यपि इसमें मेरा कोई दोष नहीं । इस पर भी ये मेरे ही कारण हुआ है । मैं अपने पिताजी द्वारा इतना कुछ करने की आशा नहीं करता था । मई के प्रथम सप्ताह में मेरी परीक्षा समाप्त हो जाएगी । बाद एक दो मास में ही मैं किसी कार्य पर लग जाऊंगा । तब तक मैं इक्कीस वर्ष का भी हो जाऊंगा । तब तक के लिए छमा चाहता हूँ । थोडी से रोगों को मनीआॅर्डर भेजा हैं । उससे कुछ काम चलाओ हूँ । दो सप्ताह के भीतर मनी आर्डर का रुपया वापस आ गया । उस पर लिखा था लेने से इन्कारी । इस इनकारी से गोपाल बहुत परेशान था । वह रुपया नहीं लेने का कारण नहीं जान सका । अगले दिन उस को एक पत्र मिला । राधा ने पत्र में लिखा था, परम प्रिय प्रियतम, मैंने आपका भेजा रुपया वापस भेज दिया । इसमें कारण ये है । पार्थिव धन किसी पार्टी वस्तु की प्राप्ति के प्रतिकार में ही हो सकता है । मैंने अभी तक यह शरीर आपकी अधीन नहीं किया है । अजय मैं धन पाने का अधिकार नहीं रखती है । आप पहले वो अधिकार मुझको दीजिए । इसके लिए अब आप की माता जी को इस गांव की यात्रा करने का कष्ट लेना होगा । ये मेरा अंतिम और डेढ नीचे हैं । जब तक आप की माता मुझको पता तो बना करने ली जाएगी । इस जन्म में मिला नहीं हो सकेगा । आगे लिखा था, यहाँ जगह ही जितनी सुविधा और सुख तो है नहीं, फिर भी हम निर्वाह करने का उपाय कर रहे हैं । आप पत्र लिख सकते हैं परन्तु रूपया मत भेजिये । गोपाल यद्यपि ज्यादा के व्यवहार में युक्ति नहीं पाता था इस पर भी उसके पास समय नहीं था कि वह उस को समझाने का यत्न करें । वह अपनी पढाई में लीन हो गया । अच्छा अच्छा ।

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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