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तृतीय परिच्छेद: भाग 5

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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हूँ । तृतीय परिच्छेद भाग पांच । दूसरी ओर वर्मा अमृतसर पहुंचा तो उसको ज्ञान हुआ कि एक लडका लडकी से सहवास के लिए उसने दस रुपया व्यय कर दी है । इससे बहुत कम मूल्य पर इससे कहीं अधिक सुंदर लडकियाँ मिल सकती थी । तीसरे महीने के समाप्त होने तक मलिका पति की संगत के लिए व्याकुलता अनुभव करने लगी । उसके पति की साप्ताहिक चिट्ठी आई कि वह अभी दो सप्ताह तक नहीं आ सकेगा । इस पर मालिक ऍम अमृतसर जाने का विचार कर लिया । वह बिना किसी प्रकार की सूचना भेजे वहाँ जा पहुंची । वहां वहां प्लाइंग मेल से दस बजे पहुंची हूँ । उसका पति घर पर नहीं था । ससुर पदों की आने का समाचार सुन अपने कमरे से बाहर विश्व में से मल्लिका का मुख देखने लगा । मल्लिका ने चरणस्पर्श किए तो वह पूछने लगा क्यों तुम्हारे घर में पांच पैसे का पोस्टकार्ड भी नहीं रहा जो आने की सूचना नहीं भेज सके । मल्लिका के लिए अपने ससुर का ये पहला अनुभव था और यही बहुत कटु प्रतीत हुआ । नौ का सामान लेकर उसके पति के कमरे में चला गया था । मल्लिका ने अपने मन में उठे क्रोध को ये अपनी से शांत किया और मुस्कुराते हुए कह दिया । तब यह मिलने की हुई तो चली आई चिट्ठी लिखने के लिए सुबह कहाँ थी वो तो विजय से व्याकुल हो उठी थी । मल्लिका ने एक दस्ती अपने ससुर की ओर है की और मुस्कुराकर अपने कमरे की ओर चल पडी । ससुर हस पडा और उसके जाते देख कहने लगा ये यहाँ भी सोना सोना प्रतीत हो तो मेरे कमरे का द्वार खुला रहता है । समझ गयी हो मल्लिका समझ गई थी परन्तु इस वाकी के कटुता तो तब स्पष्ट जब वर्मा रात भर वहाँ नहीं आएगा । वह बैठी हूँ । प्रतीक्षा करती रही । रात के दो बजे लगभग कमरे से बाहर किसी के आकर खडे होने का शब्द हुआ तो मलका ये समझे कि उसका पति होगा । द्वार खोलकर बाहर देखने नहीं द्वार के बाहर शराब के नशे में झूमता हुआ उसका ससुर वहाँ खडा था । वो डर गई और खट से द्वार बंद कर और ऍम अंदर से कुंडी चढाकर खडी रहेगी उसको अपने ससुर की विकराल हसी सुनाई दी और तो अच्छा उसको वहाँ से चले जाने का शब्द सुनाई दिया । गाते छह बजे किसी ने द्वार खटखटाया । मल्लिका ने बिना खोले पूछ लिया कौन है वर्मा तुम कौन हूँ? मल्लिका ने द्वार खोल दिया मकान में अभी सब हो रहे थे । वर्मा ने मालिक को पहचाना तो आश्चर्य प्रकट करते पूछ लिया कब आई हूँ । फ्लाइंग मेल से रात पहुंची थी । आप कह रहे हैं एक आवश्यक काम में था अभी अभी आ रहा हूँ । वर्मा आकर कपडे उतारने लगा तो मलिका ने पूछ लिया आपकी माता जी कहा है क्योंकि किसलिए पूछ रही हूँ आपके पिताजी रात कमरे से बाहर अपने लिए कोई बिस्तर का साथी ढूंढ रहे थे । वर्मा खिलखिलाकर हंस पडा । बस कर उसने पूछा कैसे जाना ही है? इस पर मलिका ने उसके पिताजी से हुए वार्तालाप और फिर उनके रात के दो बजे कमरे के द्वार पर मद्यपान किए हुए आने की बात बता दी । ये है तो कुछ नहीं मुझको कुछ ऐसा समझ आया कि तुम को उनके कमरे में स्थान मिल गया था । नहीं मैं मूर्ख नहीं हूँ छोडो इस बात को मैं तो आज फिर बाहर जा रहा हूँ । तो कब तक आपको घर आने की फुर्सत होगी । इसीलिए तो लिख रहा था की यहाँ काम बहुत तो मैं आज दोपहर के समय वापस चली जाऊंगी । यहाँ ही रह जाऊं । पिताजी आजकल काम पर नहीं जाते हैं । उनसे डरने की कोई बात नहीं । वो बहुत ही जोली फेलो है । नहीं मैं आज जा रही है । जब आपको विकास होगा तभी मैं होंगे । वर्मा फिर ऐसा मैं उठा और सोचा दी के लिए चला गया । वर्मा और मालिक आता है । ब्रेकफास्ट खाने के कमरे में गए तो वर्मा का पिता सेट नास्ता कर रहा था । मैं मालिक को दी खास पडा हस्ती वो उसने कहा था पाजी हो पति को जी उत्तर देने के लिए मलिका ने कह दिया बेटा उसने अपने पुत्र को संबोधित कल कह दिया । डीवी को बहुत देर के लिए नहीं छोडना चाहिए । अकेली कहाँ से भी ताजी दिल्ली में इसके माता पिता, भाई और भावी जी थी । यहाँ आप माता जी हैं । ये पति का अभाव अनुभव कर रही थी । इस समय में घर पर होंगा आप काम पर जाइए । पिता अल्पहार लेकर चला गया । वर्मा और मलिका चुप चाप खाते हैं । इस समय वर्मा की माँगी । उस ने कहा बेटी तुमको अकेली बैठे देखते हैं । रात मैंने तुमको बोला भेजा था और तुम पिताजी से डरकर द्वार बंद कर बैठी हूँ । हाँ जी, आपको सुन लेने के लिए आना चाहिए था । हाँ बेटा, अब बुड्ढे आदमी यही नौकरी क्या करेंगे? मल्लिका के लिए ये सब कुछ नवीन था । यदि वे बात सत्य नहीं भी हो जो वह समझी थी तो भी इस सब का ढंग ऐसा था जो उसके पिता के घर पर नहीं होता था । मैं अपनी स्वास्थ्य को तो देना चाहती थी परंतु पहले ही दिन झगडा नहीं करने के विचार से चुप रही । मैं विचार कर रही थी उसको लोड जाना है । मैं एक आई थी और अपने कमरे में चली गई । उसके चले जाने के पश्चात् वर्मा ने का माँ मुडे तो पिताजी तुमसे अधिक हैं तो उनको उसे लेने के लिए रूम जाना चाहिए था । मैं जाने लगी थी तो तुम्हारे पिताजी बोले तुम कुछ अधिक भी गई हूँ, चल नहीं से कोई मैं ही उसको बुला हूँ । ये ठीक नहीं हुआ क्यों? क्या ठीक नहीं हुआ । मैं समझा है कि पिताजी उसको अपने बिस्तर पर साथ ही बनाने के लिए लेने आए थे । ये भी ये बात वो अपने माता पिता से कहेगी तो बहुत बदनामी होगी । साथ ही कुछ वो रहनी भी हो सकती है । होगी तो हो जाये मुझ पर कोन । आपने किसी बच्चे का विवाद भी करना है और माँ मेरे तो बच्चे होंगे । जब होंगे तब देख लेना है । अभी तक तो होने के कोई लक्षण है नहीं । वर्मा को अभी अपने सोशल से कुछ पाने की आशा थी । इस कारण वो उससे झगडा करना नहीं चाहता था । इसके अतिरिक्त वे दिल्ली की शान दिखाया था । वह वहाँ पिता के प्रथक कारोबार करने का विचार रखता है । इसमें उसका ससुर सहायता दे सकता था । वह अपने कमरे में आया तो उसने देखा मल्लिका अपना सूटकेस ठीक कर रही है । उसने पूछ लिया क्या हो रहा है? दिल्ली जाने की तैयारी अभी तो बहुत समय मैं देख रही थी । मेरी कोई वस्तु यहाँ रहे ना जाएगा । मैं अभी यहाँ नहीं हूँ और मैं आप भी दिल्ली चलिए और काम गंदा वहाँ करने को बहुत हैं । यही तो वर्मा चाहता था । उसने झट कह दिया चलो मैं भी चलता हूँ । सत्य मैं आपकी कृतिक गिर होंगे । आप भी अपने दो तीन सूट रख लीजिए । वहाँ सब प्रबंध हो जाएगा । हमको मोटर से चलना चाहिए । मोटर की जरूरत तो वहाँ भी रहेगी । वर्मा ने ले जाने के योग्य छूट देखने आरंभ कर दिए । मलिका सोच रही थी कि बहुत आवश्यक कम जिससे वे दो महीने दिल्ली नहीं आ सके, उसका क्या हुआ? परन्तु उसने पूछा नहीं मनी मान गए इस घर के गोरखधंधों को समझने का यत्न कर रही थी । वर्मा ने अपना सूटकेस तैयार कर लिया । फिर कहा लंच के बाद यहाँ से चल देंगे । मैं मोटर में पेट्रोल भरवाकर लिया हूँ । कितना के है? वर्मा चला गया । उसी समय वर्मा की माँ भी उसने अपने पति के पास बैठ पीठ पर हाथ फेरते हुए कह दिया बेटी तुमको ब्रह्म हो गया तो तुम्हारे पिताजी ऐसे नहीं है । घर से बाहर जब नगर ओरतों से भरा है तो लडके के ऊपर क्यों कोई कुदृष्टि रखेगा? हँसी मजाक में इस तरह क्या करते हैं? तुम को मन से मेल निकाल देना चाहिए । मल्लिका अपने पति को अपने साथ दिल्ली ली जा रही थी । मैं अपने मन से उस घर से तीन का तोडकर जा रही थी । इस कारण झगडे को ही समाप्त करके ही जाना चाहती थी । उस ने कह दिया माजि मेरे पिता जी के घर में नहीं तो नगर की ओरतों की बात होती है । नहीं घर की बहू बेटियों से ऐसे मजा किए जाते हैं । इसी कारण गर्म हो गया था । अब ऐसी बात नहीं सोच होंगी । आप मुझको लेने आती तो मैं आपकी कुछ सेवा ही करती है । इससे बात शांत होगी । मालिक को अपने ससुर के विषय में अपनी धारणा पर संदेह होने लगा था । उसने बात बदल दी । इस पर भी उसने दिल्ली जाने की बात नहीं की । माँ गई तो वह यात्रा योगी वस्त्र पहन तैयार हो गया परन्तु मैं तैयार है गई वर्मा गया तो नहीं है ।

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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