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तृतीय परिच्छेद: भाग 4

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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हूॅं परिच्छेद तीन भाग चाहते हैं । कुछ दिन तक तो मलिका जलती धूप और लू से बस्ती हुई कोठी के भीतर ही बैठे कई वर्षों से वह प्राय किसी ने किसी पहाड पर चली जाये करती थी । इस वर्ष युवा हो जाने के कारण अपनी इच्छा से कहीं आ जा नहीं सकती थी । सबसे बडी बात ये थी मिस्टर वर्मा तो अभी तक एक दो महीने कश्मीर में ही व्यतीत करने का विचार रखता था । वैसे ही हटकर उसे दिल्ली ली आई थी । वर्मा ने सामान्य रूप में उसको बताया था कि एक महीने से भी कम समय में कश्मीर में उनका दस साहस रूपया वह हो चुका है । इससे वह उन्हें पहाड पर जाने का प्रस्ताव करने में संकोच कर रही थी । इसके साथ ही वर्मा के पत्रों में ये लिखा आ रहा था उसको इतना आवश्यक काम है कि वह अभी अमृतसर से बाहर नहीं जा सकता । ये भी हुए लिखता रहता था की मल्लिका अभी दिल्ली में ही ठहरे और वह शीघ्र ही काम समाप्त कर दिल्ली आएगा और फिर उसके पिता से राय कर दिल्ली में कोई कारोबार आरंभ करने के विषय में विचार करेगा । इस वर्ष वर्ष सिगरी आरंभ हो गई और लू चलने बंद हो गई । रात वर्षाें ठंडी हो गयी मत । ध्यान में ग्रुप तो तीव्र रहती थी । अतः मल्लिका कोटी से बाहर निकलने लगी और ऍम और इंडिया गेट की सैर करने जाने लगी । इन्हीं दिनों रानी दिल्ली अपने माता पिता से मिलने को पिता अभी भी जगह दी से लोटे नहीं थे । वहाँ मिली और मलिका मिल गई । गांधी को जब कश्मीर की सैर कि वे सब बातें बताई गई जो छोटी बहन बडी बहन को बता सकती थी तो रानी सन रहेगी । उसे इस विवाह में आपने भाग पर पश्चाताप लगने लगता है । मल्लिका बताते बताते रो पडती । हाँ की रानी ने कहा मालिक इस प्रकार रोम होने से कुछ नहीं बनेगा । तुमने बहुत भूल की तो मैं उसकी सब बिहू दियो में भाग नहीं लेना चाहिए तो क्या करती हैं? मालिक का पसंद है? पहली बात तो ये है कि तुम मैं शराब बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए । साधारण रूप में उसके पास ओपन की को मैं कैसे सहन कर? पहले ही दिन मैं समझ गई थी कि यदि सराब नहीं भी तो दो चार दिन में ही मैं मर जाऊंगी । तब ठीक था, अव्वल तो बहुत उनको अधिक कष्ट नहीं देता है । अपना मुख कहीं अन्यंत्र काला करना और यदि मैं नहीं मानता तो तुम्हारे सामने किसी प्रकार का लग जावेन व्यवहार करता तो तुम वापस दिल्ली चलिये तुमने इतना पढ लिखकर भी कुछ नहीं देखो । नीति ये सब कुछ स्कूल कॉलेजों में पडा है । नहीं जाता हूँ अपना व्यवहार ठीक रखना भी कहीं कालेज में पढाया जाता है । ये तो मानव प्रकृति होती है । अपने मन की बात अपने से जबरदस्त मनुष्य से मनवाने का एक ढंग होता है तो हठपूर्वक सारा पीने से मना कर सकती थी । मध्य पीने से सुनाई मंडल दुर्बल पड जाता है । इससे मनुष्य मानसिक और सारा दिन घर प्रतिघात अनुभव करने की सामर्थ्य हो बैठता है और दीदी अब क्या हूँ? तुम चाहती हूँ मैं तो उनके साथ रहते हुए सामान्य स्थितियों का जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ । उसको अमृतसर से बाहर निकालो जब तक हुए हैं, वहाँ की किचन में रहेगा । वह तुम्हारी संगत के योग्य नहीं बन सकेगा । इस दिल्ली में सब समाज में रहकर उसके शीघ्र ही सब बन जाने की आशा की जा सकती है । उस दिन से मलिका ने वर्मा को आग्रहपूर्वक लिखना आरंभ कर दिया कि उसे दिल्ली आना चाहिए । उसके पिता इस समय ऐसी स्थिति में हैं कि उन्हें बहुत दूर तक सहायता कर सकते हैं । इन पत्रों के उत्तर में वर्मा को सादा ये पत्र आया करता था । बस दो चार दिन का काम और रह गया और सीकरी वह दिल्ली आएगा । मालिक को इस समय उन्हें गोपाल की याद आने लगी थी । जिस परिस्थिति में वह उससे अंबाला में पृथक हुई थी, उस को सम्मान कर वहाँ उसके सामने जाने में संकोच अनुभव करती थी । रानी ने एक दिन कहा कि वह अपने देवर सुरेंद्र से मिलने जा रही है । मैं लेकर जानती थी कि गोपाल वही रहते हैं । उसके मन में आया कि वह भी वही इनके साथ जाए और देखें कि वह उससे कैसा व्यवहार करता है । परंतु मुख से वो कहने से क्या लगानी चली गई और वह गोपाल की सोम में स्मृति से पुलकित मान बैठी रह गई । जुलाई का अंतर आ गया और वर्मा को दिल्ली से गए । दो माह होने जा रहे थे । मलिका अब उन्हें पति की संगत की इच्छा करने लगी थी । गानी वापस लौट गई थी और उसकी माँ पिताजी के पास जगह भी चली गई थी । उसका भाई पिता का कारोबार दिल्ली में देखता हूँ । उसकी पत्नी और उनके बच्चे भी कोठी में रहते थे । मलिका उनसे अपना मन बहलाने का यत्न करती रहती थी । इन दिनों पंजाब विश्वविद्यालय गा परीक्षाफल निकल गया । उसने ऍम की परीक्षा दे रखी थी और उसका नाम सफल होने वालों की सूची में नहीं था । वैसे मलिका को होने की भाषा भी नहीं थी । परीक्षा से पूर्व चार महीनों से जब से वह जगादरी से वापिस गई थी, उसने पुस्तकों को हाथ तक नहीं लगाया था । कुछ दिन बाद हमें इतिहास का परीक्षा पर निकला है और गोपाल का नाम उस सूची में सबसे ऊपर देख उसे एशिया होने लगी । मैं कुछ ऐसा अनुभव करती थी कि उसकी गाडी छूट गई है और वह प्लेटफॉर्म पर मुख् देखती खडी रह गई । वो मन में कल्पना करने लगी कि वह गाडी में जब नहीं वाली थी कि किसी ने उसको रोक लिया था । उसे रोकने वाली एक चपरासी की लडकी थी । वैसे हम भी तो गाडी में नहीं चढ सकी थी । मैं भी रह गई और मलिका भी रहेगी हैं ।

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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