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चतुर्थ परिच्छेद: भाग 2

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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चतुर्थ परिच्छेद भाग दो । मल्लिका को वर्मा की हत्या से कोई दुख नहीं हुआ था । प्रत्युत वह जीवन में हल्कापन अनुभव करने लगी । उसके मन में पुनर्विवाह का प्रश्न उन्हें उपस् थित हो गया, इस पर उसका ध्यान है । उन्हें गोपाल की ओर गया । उसकी सूचना अनुसा राधा अभी भी गोपाल के पास नहीं आई थी । इस पर भी अपनी पहली विफलता का ध्यान कर वह अपने मन की बात नहीं तो अपनी महीन रानी से कह सकें और नहीं अपने माता पिता से । एक दिन मैं कनाट प्लेस में एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर एक नया नावल देख रही थी । दुकान के बाहर बरामदे के कोने में एक अमरीकन सस्ती कीमत के नवल बेचने वाले की दुकान पर कडी वह एक पुस्तक का फॉर्वर्ड पड रही थी कि उसकी दृष्टि गोपाल पर पडी । गोपाल छोडा पाजामा और कुर्ता पहने गाँव में चप्पल और सीट से नंगा चला रहा था । मल्लिका के मन में कुछ ख्याल आया है और वह उसका मार्ग रोग खडी हो गई तो मलिका यहाँ क्या कर रही होगी उस तक खरीदने का विचार कर रही थी । गोपाल ने पुस्तक देखो ये है किंग्स रो नामक एक अमरीकन जीवन पर पन्यास था । गोपाल ने ना बडा और नाक चढाकर दुकानदार के आगे फेंक दिया । यही कोई पडने की वस्तु है । दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा बाबू साहब ये दो मिलियन से अधिक दो एक वर्ष में ही बिक चुकी है । तो पालने हसते हुए का दुनिया में मूर्खों की संख्या क्या दो मिले नहीं है मिस्टर ये अभी ओर बिकेगी । अन्य मोर भी तो लेकर पडेंगे और उनको मलिका बहन उनमें नहीं दिवस मालिक को बिना खरीदें । वहाँ से चलना पडा । चलते हुए उसने कहा तो तुमने कब से मुझको मूर्खों से कुछ अन्य समझना शुरू कर दिया है? गोपाल हस पडा हस्ती उसने कहा ये प्रसंसा तो मैंने दुकानदार के सामने की है । वास्तव में तो मैं तुमको मोरखी मानता हूँ तो फिर जाऊँ लिया हूँ पुस्तक मैं तुमको वह पुस्तक भेंट में दे सकता हूँ । ऍम भी उसको लाई थी और उसको बेचने वाली रद्दी में फेंक चुकी थी कि मेरी दृष्टि पड गई । मैंने कह दिया भाभी ये नई पुस्तक ही कबाडियों के पास जा रही है । वह बोली इसकी जितना चाहे नहीं है परन्तु विषय वही पुराना है । एडम और ईव का मैंने उठाकर रख ली । मेरा कहना था तो तुम किसी निर्धन युवक को ये पढने के लिए सस्ते दामों पर भेज देना चाहती हूँ । ये चार रुपए की पुस्तक कवाडिया आठ आने में भेज देगा तो क्या करूँ? मैं इसको फूककर । किसी दिन चाय बनाऊंगा । मेरा विचार था कि जिस दिन बिजली ऑफ होगी, उस दिन चाहे बनानी होगी तो मैं उसका प्रयोग करूंगा । वो अवसर आया नहीं तो तुम चाहो तो ले जाओ मैं तुमको भर दे दूं और था आपके विचार से मूर्ख मलिका को वह पुस्तक मुफ्त में मिलनी चाहिए । हाँ, यदि तुम चाहो तो हो तो मैं समझता हूँ कि इस प्रकार की पुस्तकें किसी को देने के लिए नहीं है तो उस तक के लिए तो आपके घर जाने पर हो जाएगी घर । अगर निमंत्रण दें तो चाय के लिए चल सकती हूँ । वहाँ एंथनी भाभी होगी और वह आपको बहुत प्यार की बातें कह सकती है । आप क्या समझते हैं कि मैं उनका प्यार सहन नहीं कर सकूंगी? ये मैं क्या जानूँ? जब जगह मैंने तुमसे भी वहाँ स्वीकार किया था तो तुम रानी भावी की गोद में सिर रख विफल हो रही थी । तब से ही मैं तुमको मोर समझती है । तब तो मैं पुस्तक लेने के लिए भी जा सकती हूँ । गोपाल हस बडा बस कर उसने कहा मुझे तुम को निमंत्रण देकर प्रसन्नता ही होगी । पर मैं करता हूँ कि कहीं तुम्हारा पति नाराज न हो जाए । अब गंभीर होकर मलिका ने कहा वह तो अब जीवन बंधन से हो गए हैं । गोपाल गंभीर हो, उसका मुख देखने लगा । मलिका की आंखों में सरलता देख वह चल पडा । चलते हुए पूछने लगा क्या हुआ था? मैं समझती हूँ कि मेरी बहन ने मुझे पिछले जन्म के किसी बहर का बदला लिया है । चलो फिर तो हम स्कूटर कर कोठी के लिए चलते हैं, चल होगी न! मल्लिका ने हमले बैग से रूमाल निकाल अपनी आंखें बोलने आरंभ कर दी थी । गोपाल ने एक खाली जाते हुए स्कूटर को हाथ खडाकर रोक लिया और उस पर बैठकर दोनों अशोक रोड पर सुरेंद्र की कोठी पर जा पहुंचे थे । नहीं गोपाल और मालिक को स्कूटर में बैठे आते देख आश्चर्यचकित रह गई । वह अपने कमरे में निकल उनका स्वागत करने बरामदे में आ खडी हुई । भोपाल सुलह होगी तो इतना क्या, उसने मलिका की कमर में हाथ डालकर उसे अपने साथ लगा लिया । भावी भोपाल ने का मलिका हमारे यहाँ चाय पीने के लिए आई कहती है कि भावी के हाथ की बनी चाय की नई दिल्ली में धूम मैं आज इस दम की परीक्षा करने के लिए आइए एंथनी ने कहा तब तो उसको दोबारा चाहे पीनी पडेगी मैं अभी अभी पी चुकी हूँ । चाय पीते हुए मलिका नहीं आपने विवाह से कुछ दिन तक की सारी कथा सुना दिया । इस पर एंटनी ने कहा तो दूसरा भी वहाँ कर लूँ, क्या होगा विश्वास जीवन सुख में हो जाएगा पर था फिर वही चक्की पे जो जो पिछले डेढ वर्ष से पीसती रही हूँ मुझको अब स्मरण हो रहा है कि गोपाल ने ज्यादा से मेरी तुलना करते हुए कहा था कि मैं राधा की तुलना में पच्चीस प्रतिशत ही हूँ और मेरे पिता का धान तो मेरे मूल्य को और भी काम कर रहा है । ऐसी अवस्था में मेरे साथ कौन विवाह करेगा? एंटनी ने कहा मलिका इस प्रकार नहीं तुम सोलह में तो एक एवरेज हो रहा है । हाँ और साथ में तुम को सिखाया नहीं गया । उसके अभाव में तुम रात है की तुलना में इतनी कम रह रही हूँ । फिर ज्यादा तो एक विशेष व्यक्ति तो रखती है । मेरा विचार है तो खत्म करो तो अभी भी जीवन सुख में हो सकता है । मैं इस विचार से भोपाल के साथ आई हूँ कि राधा के दर्शन कर सकते हैं । अभी नहीं आई । गोपाल ने कह दिया क्यों? क्योंकि उत्तर वही है जो मैंने तुमको कॉलेज के होस्टल में बताया था । गोपाल नहीं । वार्तालाप में दखल देते हुए कह दिया वह वहाँ तो बच्चा कर रही है और मैं यहाँ । मैं उस को बहुत बुरा भला कहती थी । अब मुझ को उस पर दया आती है । वह गया कि पात्र तो है ही । एंटनी का कहना था उस पर भी मैं उसको एक बहुत बहादुर लडकी समझती हूँ । मैं चाहती तो अब तक यहाँ नई दिल्ली में बैठ मान प्रतिष्ठा की पात्र बन सकती थी । परंतु आपने एक विचार के अधीन मैं ये सब त्याग तपस्या कर रही है । पहले मैं भी उसको मुझे मानती थी परंतु अब जो जो विचार करती हूँ मैं उसके दृष्टिकोण को ठीक समझने लगी थी । एक निर्धन की लडकी से यदि कोई धनी मानी का लडका विभाग करें तो उसकी मान प्रतिष्ठा की गारंटी होनी चाहिए । ये गारंटी उसकी दृष्टि में गोपाल की माँ ही दे सकती है और वह दे नहीं रही ज्यादा इस प्रकार गोपाल के घर नहीं आने पर ठीक ही कर रही है । गोपाल को कोई शिकायत भी नहीं होनी चाहिए तो उस उसकी माँ का है । एंटनी के विचार सुनकर गोपाल आश्चर्यचकित हो भाभी का मुख देखने लगा । एंथनी मुस्कुरा रही थी । वहाँ भी ये ज्ञान अप्रकट हुआ है । अभी उस दिन तो तुम राधा को पोस रही थी । ये ज्ञान तुम्हारे भैया नहीं कराया है । उस दिन उन्होंने भी मेरे क्रोध की बात सुनी थी । पीछे मुझ को समझाने लगे । अब मैं समझ गई हूँ उस दिन तुम्हारे वही कह रहे थे । किसी के कार्य की महिमा दूर खडे होकर बातें बनाने से पता नहीं चलती । दैनिक अपने को उस स्थिति में रखो और फिर विचार करूँ कि तुम क्या करती है? तब ही अनुमान लगा सकती हूँ कि वह क्या कर रही । मैं कहने लगे मानव मेरी एंथनी मेरे चपरासी की लडकी होती है और मैं उस से भी वहाँ कर लेता हूँ । मेरे घरवाले मेरे इस काम पर उससे नाराज हो, मुझे घर से निकाल देते तो एंटनी क्या कर दी? वही अभी मेरे पास अपने आप चली आती है । तो क्या मेरे घर वाले ये नहीं कहते की एंथनी अपनी उन्नति के लिए मुझको अपने संबोधन में फस आए हुए हैं । सबकी दृष्टियाॅ की मान प्रतिष्ठा क्या रह जाती है? साथ ही वह संभावना भी तो है कि उस एंथनी का भोकर वह घर से निकाल दी जाती हूँ । मेरे इस कार्य का घर वाले स्वागत करते अब बताऊँ राधा जो कर रही है कि कर रही है अथवा गलत । जब तक उसके पति के घरवाले उसकी मान प्रतिष्ठा से लेकर नहीं आती उसके लिए क्या कोई मार्ग है? गोपाल की भैया कहने लगे हमारे घर की पुरखा है माता जी हम सब ज्यादा को ठीक समझते हैं । इस पर भी माताजी पर उचित दबाव नहीं डालना है । मल्लिका ने कहा तो भाभी तो माता जी से मिलकर यत्न क्यों नहीं करती? हम कोई प्रभावशाली कदम उठाने वाले हैं । कई उपायों पर विचार किए हैं परन्तु अभी निश्चय किसी पर भी नहीं हुआ । इस पर गोपाल ने पूछ लिया और ये सब मुझसे चोरी चोरी हो रहा है तो तो यतन कर ही रहे हो । तुम भी तो अच्छा कर रहे हो तो रोटी तो हमने है तो अब तुम्हारे भैया ने एक बहुत बडा पत्र अपने दादा को लिखने का नीचे की है । उसकी अभी रूपरेखा नहीं बनी हूँ । माता जी कहाँ है? मल्लिका का प्रसन्न था । पिताजी की नौकरी छोडने पर उनको दिल के दौरे पडने लगे तो कश्मीर गए थे परंतु बहुत तकलीफ अधिक हो गई थी । वहाँ से अब पांडीचेरी में समुद्र तट उनको अधिक अनुकूल प्रतीत हो रहा है । पांडीचेरी भी गए । उनको एक वर्ष से अधिक हो गया है । मलिका को गोपाल और फॅमिली से मिलकर शांति मिली थी । जाते समय उसने पूछ लिया अभी मैं तुमसे मिलने आएगा तो उसको तुम से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई हूँ ।

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कामना जैसा कि नाम से ही विदित होता है यह गुरुदत्त जी का पूर्ण रूप में सामाजिक उपन्यास है इस उपन्यास में इन्होंने मानव मन में उठने वाली कामनाओं का वर्णन किया है और सिद्ध किया है कि मानव एक ऐसा जीव है जो कामनाओं पर नियंत्रण रख सकता है Voiceover Artist : Suresh Mudgal Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त
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