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घुड़सवार शैतान -01

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17 KListens
Publisher:- FlyDreams Publications ... Buy Now:- https://www.amazon.in/dp/B086RR291Q/ ..... खौफ...कदमों की आहट कहानी संग्रह में खौफनाक डर शुरू से अंत तक बना रहता है। इसकी प्रत्‍येक कहानियां खौफ पैदा करती हैं। हॉरर कहानियों का खौफ क्‍या होता है, इस कहानी संग्रह को सुनकर आप समझ जाएंगे! कहानियों की घटनाएं आस-पास होते हुए प्रतीत होती हैं। आप भी सुनें बिना नहीं रह पाएंगे, तो अभी सुनें खौफ...कदमों की आहट …!
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घुडसवारों शैतान भाग एक बात उस समय की है जब शहर से दूर गांव में मनोरंजन के साधन ज्यादा नहीं हुआ करते थे । तब गांव में हर किसी के यहाँ टेलीविजन या कंप्यूटर जैसे आधुनिक उपकरण नहीं होते थे । ऍम छुपाई घंटे, कबड्डी, खोखो, छुआछूत इससे अधिक खेलों का वर्चस्व हुआ होता था । ग्रामीण लोगों को उस वक्त रेडियो पर क्रिकेट मैच का ज्यादा लग पाता था । तब लोगों के पास एक दूसरे से बात करने के लिए वक्त भी होता था और हर जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए फिल्में जरूरी भाव भी होता था । उस वक्त दूर दूर तक लोग अधिकतर पहल गाडियों से सफलतापूर्वक यात्रा करने के लिए मेरा नाम प्रदान भगत है । तब मेरी उम्र महज सत्रह वर्ष के लिए और मेरे काम का नाम कालिका पडता हूँ क्योंकि बंगाल में सिलीगुडी से किलोमीटर की दूरी पर था । सिलीगुडी में ही हमारा एक और कर था जहाँ मेरे चाचा चतर्भुज भगत अपने छोटे से परिवार के साथ रहते थे । उनका एक बेटा भी था जिसका नाम हर्षद था । हालांकि हर्षित मच्छी एक वर्ष छोटा था लेकिन फॅमिली स्कूल में मेरे साथ ही कक्षा ग्यारह में पडता था । मेरा काम शहर से इतनी दूर होने के कारण वहाँ की चकाचौंध दुनिया से अलग थे । बंदे नौगांव में हर किस्म के पेड पाए जाते थे और सडक के दोनों तरफ शीशम के पेड कदम से कदम मिलाकर सडक के साथ रहने की भांति खडे रहते थे । उस समय असम और बंगाल आपने काले जादू के लिए मशहूर हुआ करते थे । लगभग हर गांव में भूत प्रेत और डालों के किस्से प्रचलित रहते थे । स्थानीय ओझा भी मुर्गे या बकरे की बलि देकर या लोगों को झांसे में डालकर मोटी कमाई वसूल करने में पीछे नहीं रहते थे । मेरा काम कालिकापुर बंगाल के ही सिलीगुडी चले के अंतर्गत आता था । हमारे विद्यालय में गर्मियों का लगभग एक महीने का काश हुआ मेरे चाचा हम सभी को लेकर अपने पुश्तैनी गांव कालिकापुराण हैं । इस वक्त आम के लिए तो चल रही थी । हम लोग पके हुए आम का मजा ले रहे थे । मैंने आम खाते हुए का हम बहुत ही स्वादिष्ट मजा आ गया । खाकर ऐसे हम शहर में क्यों नहीं मिलते? चाचा पीडित स्वादिष्ट इसलिए है क्योंकि ये पेड के पके हुए हैं । शहर के लोग बहुत कम मूल्यों में गांव से कच्चे आम ले जाकर इनमें रासायनिक पदार्थों को साथ मिलाकर उन्हें पकने के लिए छोड देते हैं । फिर इन्हें ऊंचे मूल्य में भेजकर अच्छा मुनाफा पा लेते हैं । चाचा ने सहजभाव से मेरे प्रश्न का उत्तर दिया था क्या का हाथ में रासायनिक पदार्थ उनको क्यों करते हैं? फिर से उस पल को खाने वाले का नुकसान भी होता होगा । मैंने उनके जवाब देते ही तो प्रदर्शन कर दिया था । बिल्कुल सही । उन रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से बताए हुए फल खाने से हमारे शरीर पर इसका बडा ही प्रतिकूल असर पडता है । चाचा ने इसी तरह मेरे उत्सकता से पूछे गए सारे प्रश्नों का सही जवाब दिया । शाम को छह बजे हो रहा था । मैं हर्षद के साथ सडक की तरफ चला गया । वहाँ जाने का मुख्य कारण समोसे कलारा अच्छा पडोस के गांव घरवालों से एक समोसा बनाने वाला अपना ठेला लेकर आता था तो एक एक दिन के अंतराल पर आता था । उसके समझ से बेहद ही लजीज होते थे । वो समोसे की चटनी में पुदीना और धनिया के साथ कुछ जादूगर खोलकर बनाता था जिससे समूह के साथ खाने से समूह लेकिन सहायता को और स्वाद मिल जाता था । सबसे बडी बात कि एक तो उसके समय से लजीज होते थे और दूसरी ये कि वह पैसे भी कम ही लेता था । एक रुपए में एक समझा देता था । सिलीगुडी में तो एक समूह पांच रुपये का मिलता था और ऊपर से चटनी भी तभी मिलती थी जब समूह से एक से अधिक लें । कुछ और हर्षित को दादा जी से एक एक रुपए मिले थे । हम तुम समोसे का आनंद ले रहे थे तभी आदित्य भी वहाँ गया । अदित्या हमारे गांव के मुखिया विमल किशोर जी का बेटा है जो कि हमारे काम से पांच किलोमीटर की दूरी पर नासरीगंज में एक स्कूल में पढता था तो कक्षा दस में था । मैं और हर्षित हर साल गर्मियों की छुट्टियों में अपने गांव जाते और हम तीनों मिलकर पूरे गांव में धमाचौकडी मचाते थे । बाद जब तो उसकी तक हो तब तो सही है । लेकिन मेरे और हर्षित के दिमाग में ये चल रहा था की आपने समोसे की बलिदानी कौन दे रहे हैं क्योंकि हम घर से पर तो ही रुपए लेकर आए थे जिससे केवल दो समोसे ही मिले थे । शायद आदित्य मेरे मन में चल रहे हैं । समोसे के बंटवारे की बात को समझ गया तो समूचे वाले भैया से बोला भैया मुझे एक समोसा देना । उसके इस बात को सुनकर हम तीनों एक साथ पढे । हम लोगों ने समूचे का आनंद लिया और घर की तरफ जाने लगे । अभी कुछ ही दूर चले थे कि हर्षित बोला अरे मैं तो पूछना भूल गया । आज रामलीला देखा चलोगे ना । इस वर्ष गांव में रामलीला नहीं हो रही । आदित्य उदास होकर का मैं बोला क्या बात कर रहे हो? प्रत्येक वर्ष तो इसका आयोजन होता था । बना ऐसी क्या बात हो गई जो मेरी बात को बीच में काटते हुए आदित्य बोला हमारे गांव में कुछ दिन पहले दो गुटों में झगडा हो गया था । बात इतनी बढ गई कि गोलियाँ चल गई । गोली चलने से जो व्यक्ति बीच बचाव करने आए थे उनकी दाहिनी भुजा में लग गई । जिनकी वजह में गोली लगी वही प्रत्येक वर्ष हमारे गांव में रामलीला आयोजन करते थे । आदित्य की बात सुनकर लोग उदास हो गए । तभी आदित्य की आंखों में चमक ऍम पडोस के गांव घरवाले भी में जाकर रामलीला देखा । आदित्य की बातें सुनकर हर्षित बोला तो दूर है वहाँ । उतनी दूर अरशिद की बात पूरी करने से पहले ही आदित्य फिर बीच में बोल पडा क्या बात करते हूँ हमारे गांव से मात्र ढाई किलोमीटर की दूरी पर ही तो और अब हम बच्चे नहीं रह गए । उसके इस बात में हम लोगों में जोश भर दिया और हम तीनों ने राहत को खाना खाने के बाद आठ बजे घरवाले दिए जाने की योजना बनाई । हम तीनों खाना खाने के बाद घर में बताकर घरवालों से रामलीला देखने निकल पडे । हम लोगों को रात में बाहर जाता देखकर हमारे साथ हमारा कुत्ता गया की भी चल दिया । आज चांदी रात में गांव बडा ही प्यारा लग रहा था । हवाओं के चलने से पेड के पत्तों की आवाज रोमांचित कर रही थी । हम तीनों एक साथ कदम से कदम मिलाकर आंखों में रामलीला देखने की ललक लिए चले जा रहे थे । थोडी देर बाद रात करीब पौने नौ बजे तक हम लोग घरवाले भी पहुंच गए । कहाँ हूँ प्रभु कछुओं अगम नहीं था पर तुम अनुकूल तत्व प्रभाव हम बढवाना नहीं जा रही । सकल घरेलू तूर क्षेत्र हूँ । आप जिस पर प्रसन्न हूँ उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है । आपके प्रभाव से हुई जो स्वयं पहुंच चलती चल जाने वाली वस्तु है । भगवान वाले को निश्चित ही चला सकती है । था असंभव को भी संभव कर सकते हैं । मंच पर ये तथा संवाद चल रहा था । हम लोग पे शांति से बैठकर रामलीला का आनंद लेने लगे । करीब डेढ घंटे के बाद पांच दिन का अध्याय समाप्त हुआ । जैसे ही आज का अध्याय समाप्त हुआ, मैंने कहा वहाँ हो गया । अभी तो नौ दिन का अध्याय और बाकी है । अब हम लोग प्रतिदिन आएंगे । मेरा ऐसा कहने पर सभी ने हामी भर दी । हम लोग फिर ग्यारह बजे के करीब घर आकर हो गए । अगले दिन मैंने घरवालों को कल के भाग के बारे में बताया कि कितना मजा आया और शाम होने का इंतजार करने लगा । शाम होते ही मैंने और हर्ष आपने खाना जल्दी निपटाया । हमारे खाना खाते ही आदित्य भी पहुंच चुका था और मेरे कुत्ते जहकि के साथ रामलीला देखने जाने का इंतजार कर रहा था । हम तीनों अपनी मंजिल की तरफ निकल पडे । हमारे साथ क्या की भी चलते चलते कभी आगे तो कभी पीछे होता हुआ चला जा रहा था । रोज अमावस की काली रात चांद आसमान से नदारद था । वातावरण में नहीं रहता और अंधेरे का आधे पत्ते था । महीना होने के कारण हवाई सर्दी थी । दिन का वेट तो उधर नहीं था की तो उग्रता की सीमा से अधिक परेड भी नहीं था । चारों तरफ गहन अंधेरा छाया हुआ था । इसी वजह से सडक पर चलने में दिक्कत हो रही थी और अशोक था कि आदित्य अपने साथ तो लेकर आया था । हम लोग एक साथ हाथ पकडकर चल रहे थे । पश्चिम दिशा में दृष्टि के आखिरी छोर कुछ हल्के से रोशनी का आधार हो रहा था । आदित्य टॉर्च को अपनी छुट्टियों में झगडे हुए सबसे आगे चल रहा था । मैं और हर्षित उसके ठीक पीछे पीछे चल रहे थे । सुनसान सडक पर आसानी से हमारे पदचापों को सुना जा सकता था । काफी देर तक हमारे बीच किसी भी किस्म की कोई बात नहीं हुई । केवल हमारे पदचापों की ध्वनि ही थी जो अभी तक हमारे साथ चल रही थी । अन्यथा आज रात तो छीन गाडियाँ । बंगले पशु वहाॅ खाकर खामोश है । हम तीनों लोग बेखौफ होकर आगे बढ रहे थे कि तभी अचानक हर्षित बोला क्या अमित आज नहीं आना चाहिए था । आज मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है । उसकी बातों को सुनकर आदित्य बोला सच कहूँ तो मेरा भी मन नहीं था । ऍम अस की कालीरात है और ऊपर से इतना घना सन्नाटा । मैं काफी देर से उन्होंने की बातें सुन रहा था । मुझे ना रहा गया तो बोला कैसे बच्चों जैसी बातें कर रहे हो । उतरे कुछ नहीं होता । ये सब मन का वहम होता है । अभी मैं ये सब कही रहता कि मुझे कुछ दूर पर कोई इंसान देखा क्योंकि कुछ दूरी पर रास्ते के किनारे खडा था । उसे दिक्कत लग रहा था जिस लोगों का ही इंतजार कर रहा है । मैंने जैसे ही हर्षित का करने पर हाथ रखकर उस तरफ इशारा किया तो अपनी ही जगह पर खडे हो गए । हम तीनों में से कोई कुछ नहीं बोल पा रहा था । हमारा कुत्ता चाहते जो काफी देर से हम लोगों के साथ चल रहा था । नहीं नहीं देखा था । जहकि के आसपास ना देखने से हम लोग और भी सहन करे । किसी तरह हम लोग हिम्मत जुटाकर एक साथ आगे बडने लगे । उस व्यक्ति के नजदीक पहुंचे ही है कि वो शख्स बिलकुल हमारे सामने खडा हो गया । उस शख्स ने सफेद साडी पहनी हुई थी और उसने अपना चेहरा ऍम हफ्ते पालों से ढक रखा था । उसके जिसमसे मनमोहक खुशबू आ रहे थे । उस खुशबू के सामने सोचने समझने की शक्ति पर काबू हो रही थी । उसके व्यक्तित्व को देख कर ही तो पता लग गया कि जैसे हम अनजान शख्स समझ रहे थे तो कोई रहस्यमय भारत है । उसे अचानक सामने खडे होते देख आदित्य पूछ पडा, आप इतनी राहत यहाँ सुनसान जगह पर अकेले क्या कर रही हो ये सवाल तो मैं भी तुम लोग उनसे कर सकती हूँ । उस रहस्यमय भारत ने सपा पत्रकार आदित्य उसके लिए तैयार नहीं था और सकपका कर रह गया । नहीं नहीं आपको परेशान करने का मेरा कोई मतलब नहीं था । वो तो मैं यहाँ आदित्य निकलते रहते हुए कहा चले जाओ यहाँ से है । तुम चेस कान के लिए जा रहे हो, उसका अनजान सही नहीं होगा । इस फॅमिली भारत ने अच्छे आवास में कहा था, लेकिन हम तो रामलीला देखने जा रहे हैं । भला उससे किसी को क्या तकलीफ हो सकती है? इस बार पर नहीं हिम्मत जुटाकर ऍसे सवाल किया था क्या तो काली अमावस की रात नजर नहीं आ रही । मतलब मान मेरी बात मेरा काम समझाना था सुबह की अनजान के लिए तैयार रहना, जिसके साथ तुम लोग ही सिम होगे तो टाॅप ये कहते ही वो औरत सोर्स जोर से हंसने लगे । तभी हर्षित बोला हम रामलीला देखकर रहेंगे । हम चाहे कुछ भी कह लो हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे हूँ । थप्पड की आवाज से बात का आस पास का वातावरण को छोटा वो थप्पड उस औरत ने हर्षित के काल पर लगाया था । उसके गाल पर पांचों उंगलियों के लाल निशान उभर आए थे । बचाना कैसे? बर्ताव को देखकर हम तीनों घबरा गए और वहाँ से पडोस के काम की तरफ था । खडे हुए मुश्किल से उस जगह से लगभग बीस तीस कर्म ही भागे थे कि हमारा कुत्ता क्या कि वो भी हमें मिल गया क्योंकि की मिलता ही जैसे मैंने टॉर्च का प्रकाश उस दिशा की तरफ क्या जहाँ फॅमिली थी हमारी आंखें फटी की फटी रह गई । वहाँ कोई शख्स दिखाई नहीं दे रहा था । अब हम लोगों ने ना आप देखा बताओ सिर पर रखकर भागे । पांच मिनट में ही हम लोग सामने वाले स्थल पर पहुंच गए । तबाही रामप्रिय चाहिए । विधि मोही प्रभु अस्सी सचिन पत्थरी, सरोही मित्र सहित परिवार को सुनाई कर रही हूँ । ऐसा पर और ही नहीं आएगी । सभी को श्रीरामचंद्र पैसे ही प्रिया है । वैसे तो मुझको है उन के रूप में आपका आशीर्वाद ही मना । आपका शरीर धारण करके शोभित हो रहा है । येस मामी सारे ब्राह्मण परिवार सहित आपके ही सामान उन पर इस नहीं करते हैं । राम लीला स्थल पर आते ही हम लोगों के जहन से सारे डर और खौफ काफूर हो गए । हम तीनों ने सारा ध्यान मंच पर केंद्रित कर दिया । हम तीनों एक साथ ही बैठे थे । बाहर से तो बिल्कुल ऐसे देख रहे थे जैसे मानो कुछ हुआ ही ना हो । लेकिन रह रहे कर हम लोगों का ध्यान उस घटना पर जहाँ जरूर रहा था । वो औरत अपनी संस्थान जगह पर इतनी रात को क्या कर रहे हैं? ऍम कह रही थी तो हम लोगों को वापस जाने के लिए मजबूर क्यों कर रहे थे? आपकी समझा उनको बहुत ने के लिए कह रही थी वो आखिर ऐसी क्या बात थी जो हर्षित अकाल पर समाचार रसीद करना पड गया? किस तरह के सवालों ने मेरे जहन में उठा पटक कर रखी थी हम सभी की आंखे तब मंच पर थी लेकिन दिमाग अभी भी वही सडक के किनारे सफेद साडी वाली उस तरह से नहीं है और अब पर ही था ।

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Publisher:- FlyDreams Publications ... Buy Now:- https://www.amazon.in/dp/B086RR291Q/ ..... खौफ...कदमों की आहट कहानी संग्रह में खौफनाक डर शुरू से अंत तक बना रहता है। इसकी प्रत्‍येक कहानियां खौफ पैदा करती हैं। हॉरर कहानियों का खौफ क्‍या होता है, इस कहानी संग्रह को सुनकर आप समझ जाएंगे! कहानियों की घटनाएं आस-पास होते हुए प्रतीत होती हैं। आप भी सुनें बिना नहीं रह पाएंगे, तो अभी सुनें खौफ...कदमों की आहट …!
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