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4. Samajik Samarsatta in Hindi

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7 K Listens
AuthorSaransh Broadways
Kaise Jitati Hai Bhajpa writer: प्रशांत झा Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Prashant Jha
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सामाजिक समरसता उत्तर प्रदेश में मतदान से तीन दिन पहले फरवरी हो भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य सहारनपुर जिले के गंगो निर्वाचन क्षेत्र के छोटी से मैदान में हेलीकॉप्टर से पहुंचे । केशव प्रसाद मौर्य एक पिछले समुदाय के हैं । वो संघ की पैदावार हैं और उत्तर प्रदेश विधानसभा का दो हजार बारह का चुनाव लडने से पहले और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी थे । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी हवा पर सवार थे और फूलपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए जो कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू का निर्वाचन क्षेत्र हुआ करता था । भाजपा ने दो हजार सोलह के प्रारंभ में उन्हें पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया । निश्चित ही ऐसा अन्य पिछडी जातियों को लुभाने के इरादे से ही किया गया था । जैसे ही हेलीकॉप्टर से बाहर निकले भीड का एक समूह उनका स्वागत करने के लिए मैदान की और लडका मौर्य एक एसयूवी उत्तर भारत के सभी राजनीतिकों का एक ट्रेडमार्क में सवार होकर जनसभा स्थल की और रवाना हो गए । उनकी गाडी के पीछे चल रही कार में करीब एक दर्जन लोग सवार थे । ओम पाल सिंह सैनी ने अपना परिचय अखिल भारतीय सैनी समाज के अब तक के रूप में दिया । उन्होंने बडे गर्व के साथ कहा, ये सैनी बहुल इलाका है । उत्तर प्रदेश में सैनी अन्य पिछडे वर्गों की श्रेणी में आते हैं और मैं खुद को । एक बडे सैनी, कश्यप, कुशवाहा, मौर्य इससे भाजपा नेता आते हैं, समाज के हिस्से के रूप में देखते हैं । उन्होंने कहा, इस बार भाजपा ने हमें सम्मान दिया है । पूरा समाजपार्टी के साथ है क्योंकि मौर्या जी मुख्यमंत्री बनेंगे । वो कहते हैं, हमारा समाज पहले भी कई दलों के बीच झूलता रहा है परन्तु दो हजार चौदह में चुनावों में पूरी तरह नरेंद्र मोदी के साथ चला गया । मौर्या जी को दो हजार सोलह में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही समाज नहीं कमाल के साथ ही रहने का फैसला किया है । चैनी कहते हैं, भाजपा हमारी पार्टी है । प्रधानमंत्री हमारे हैं । प्रदेश अध्यक्ष हमारे हैं । जिलाध्यक्ष हमारे हैं, अंतर रहा । अब हमारी भी राजनीतिक आवास है । हालांकि ये अन कहाँ छोड दिया गया तो हमारे का तात्पर्य था कि प्रधानमंत्री भी पिछडे समुदाय के ही हैं । मौर्य अपने व्यापक जातीय समुदाय से थे जबकि जिलाध्यक्ष कश्यप था । तीन छोटे किसान भी इस जनसभा में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को सुनने आए थे । इनमें से एक राम सिंह कोचर था । वो बताता है कि हमारे परिवार की राजनीतिक संबद्धता हूँ । पूर्व प्रधानमंत्री और उत्तर भारत के बहुत ही सम्मानित नेता चौधरी चरण सिंह इन्होंने पिछडी जातियों और मुसलमानों का उनके किसान होने के आधार पर गठबंधन तैयार किया था के साथ रही है को बताता है । मेरे पिता जी चरण सिंह के साथ में थे । मैं रामजन्मभूमि आंदोलन की और आकर्षित हुआ और भारतीय जनता पार्टी ने आ गया । कल्याण सिंह ने जब भाजपा छोडी तो मैंने दूसरे दलों को वोट दिया परंतु दो हजार चौदह में पार्टी में पुणे लौटा । कल्याण सिंह उन्नीस सौ नब्बे के दशक नहीं प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे । लोड समाज के कल्याण से अन्य पिछडे वर्गों को पार्टी के साथ लाने में कामयाब रहे थे लेकिन बहुत ही तेजी से उन्हें पार्टी में हाशिये पर डाल दिया गया और अंततः दो हजार नौ में उन्होंने पार्टी छोड देते हैं । हालांकि बाद में वो पार्टी में लौट आए और दो हजार चौदह में उन्होंने मोदी के लिए प्रचार भी किया । रामसिंह कहते हैं, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही सिर्फ एक समुदाय की राजनीति करते हैं, सांप्रदायिक हैं । कांग्रेस सिर्फ एक ही समुदाय को देख सकती है । बसपा भी सिर्फ एक ही समुदाय को देखती है । देखिए ना मायावती हमेशा यही कहती रहती है कि मैंने सबके मन में टिकट दिए हैं तो हम सभी सपा के बारे में जानते ही हैं । उसने अखलाक के परिवार यानी गोमांस के सेवन के आरोप में दादरी में मारे गए व्यक्ति को एक करोड रुपये दिए । मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल किए बगैर ही उसने स्पष्ट कर दिया उसका आप पर रहे क्या है सिंगल कहते हैं भाजपा एक राष्ट्रवादी पार्टी है परन्तु क्या कांग्रेस की राष्ट्रवादी पार्टी थी? जो भी हो, यही वो पार्टी है जिसने भारत को आजादी दिलाई । कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है पर उनकी उसकी सोच राष्ट्रवादी नहीं है । ओम प्रकाश सैनी अपने समुदाय को भाजपा द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व और सम्मान से रोमांचित रामसिंह सांप्रदायिकता की बजाय राष्ट्रवादी नजरिए को लेकर आकर्षित हुआ । इन दोनों को एक साथ मिला दिया जाए तो ये भावनाएं उत्तर प्रदेश के चुनावों का नक्शा बदलने वाली होंगी । पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों द्वारा तैयार की गई योजना जमीन से आ रही आवाजों के साथ एकदम सटीक बैठती थी जिनके तीन घटक थे । पहला, पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करके इसे और अधिक समावेशी बनाना । दूसरा इसके प्रचार और इसके संदेश ऑपरेशन के तरीके को नया कलेवर देना ताकि पिछडी जातियों को उत्पीडन और मुक्ति दोनों का भाव महसूस हो । दूसरा था भाजपा के जबरदस्त प्रभुत्व के बावजूद इन समुदायों के बीच आधार वाले दलों के साथ गठबंधन करना । नरेंद्र मोदी ने संपन्न वर्ग का समर्थन बनाए रखते हुए स्वयं को गरीबों का नेता बना लिया था । पर्दे के पीछे अमित शाह संपन्न वर्ग का समर्थन बरकरार रखते हुए धीरे धीरे भाजपा को वंचित जातियों की पार्टी के रूप में बदलने के काम में जुटे थे । इस प्रक्रिया में भाजपा अपेक्षाकृत अलग हिंदू पार्टी बने रहने की जगह समय के हिंदू पार्टी बनने की और बढ रही थी । एक विशेष समायोजन में सबसे अधिक राजनीतिक प्रभुत्व वाली के जाती क्योंकि जरूरी नहीं कि सबसे अधिक प्रभुत्व वाली सामाजिक जाती का पर्याय हूँ की पहचान करके काम प्रभुत्व वाली जाती को उनके खिलाफ सक्रिय करके जहाँ एक पे जोर सामाजिक गठबंधन को खडा करने का ताना बाना पुल रहे हैं । सामाजिक समरसता में इस उल्लेखनीय प्रयोग में भाजपा की राजनीतिक सफलता का रहस्य छिपा है और जब की व्यापक स्तर पर सामाजिक गठबंधन बनाने में विफल हो गया । जब से सिर्फ संपन्न लोगों की पार्टी के रूप में देखा जाने लगा तब चरमरा गया । पार्टी अध्यक्ष का पद ग्रहण करने के बाद अमित शाह को महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनावों की चुनौती का सामना करना पडा । मजबूत संगठन के अभाव में उन्हें अपना गलत सही करना था । उन्होंने सम्पन्न जातियों के मुकाबले के लिए राजनीतिक रणनीति तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया । पहली नजर में ये पहल प्रतिकूल नजर आती होगी क्योंकि ये पार्टी उन जातियों से ही जुडी रही है, सामाजिक ढांचे से लाभान्वित हुए और हमेशा ही शिष्टता के मामले में ऊपर रहे । परंतु यहाँ पार्टी ने बहुत ही चतुराई से सामाजिक वरिष्ठता के मामले में पारंपरिक रूप से प्रभुत्व वाली चाहती हूँ और राजनीतिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के बीच विभेद किया था । उसका गणित बहुत साधारण है । सभी भारतीय राज्य अपनी संरचना में बहुलतावादी है । मंडल राजनीति के उदय, अन्य पिछडे वर्गों की दावेदारी और उनकी गोलबंदी, खेतिहर पृष्ठभूमि से आने वाली इन जातियों की आबादी बडी होने और सामाजिक रूप से प्रभुत्वशाली होने की वजह से वो राजनीतिक रूप से भी प्रभुत्वशाली हो गई । परंतु इसकी वजह से पारंपरिक रूप से ताकतवार है और ज्यादा हाशिया वाली । दोनों ही तरह की जातियां अलग थलग महसूस कर रही थी तथा इसकी तरकीब इन जातियों को सक्रिय करना और उन वर्चस्व वाली जातियों के विरुद्ध गठजोड तैयार करना है जो मंडल के बाद के युग में अधिकतर बडी आबादी वाली मध्यम जातियां है । महाराष्ट्र में जहाँ राजनीतिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली जाती मराठा है, भाजपा ने उन्नीस सौ नब्बे ऐसे ही अन्य पिछडा वर्ग समर्थक रणनीति अपना रखी थी । इसमें पिछडी जातियों के नेताओं को ही आगे बढाया था । इसके साथ ही शिवसेना से गठबंधन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज होने की वजह से वो में सत्ता में आई थी लेकिन पंद्रह साल तक वह सत्ता से बाहर विपक्ष में रही थी । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी की अपील की वजह से पार्टी अडतालीस सीटों में से बयालीस पर विजय हासिल करके बडी सफलता के साथ लाते हैं परन्तु विधानसभा चुनावों में और अधिक सावधानीपूर्वक सामाजिक समरसता की जरूरत थी । भाजपा ने सवाल जातियों, अन्य पिछडे वर्गों और कुछ हद तक दलितों के साथ मिलकर गठबंधन तैयार किया । भाजपा को मराठों के मतों का भी एक हिस्सा मिला चुकी है । राज्य की आबादी में वे तीस प्रतिशत से अधिक हैं इसलिए पूरी तरह उन्हें बेदखल करना आसान नहीं है । हम तो इसे असली ताकत गैर मराठा जातियों से मिली क्योंकि राज्य में दो सौ से अधिक अन्य पिछडे वर्गों के समूह है और इनमें से सबसे बडे समूह में पांच प्रतिशत से कम आबादी है इसलिए जमीनी स्तर पर प्रबंधन की आवश्यकता थी । जनादेश के स्वरूप को भाजपा ने मुख्यमंत्री के लिए चयन से ही व्यक्त कर दिया था । पार्टी ने इसके लिए भ्रमण देवेंद्र फडणवीस की नियुक्ति की । उन्हें स्थित राजनीतिक वैज्ञानिक सुहास पलसीकर कहते हैं कि भाजपा ने पैंतीस प्रतिशत मतों की हिस्सेदारी के साथ शहरों की सौ सीटों में से तिरेपन पर विजय प्राप्त की थी । चुनाव बाद के सर्वे के अनुसार उसे सवर्ण जातियों के प्रतिशत और अन्य पिछडी जातियों के अडतीस प्रतिशत मत भी मिले थे । दो हजार चौदह के चुनाव के नतीजों ने मराठा अभिजात्य वर्ग को पूरी दृढता के साथ राज्य की सत्ता से बाहर कर दिया । हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने ऐसा ही कुछ किया इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । जाट समुदाय के प्रभुत्व वाले इस राज्य में भाजपा ने गैर जाट समुदायों का गठबंधन बनाया । इसका मतलब ये हुआ कि भाजपा नहीं समझ जातियों यादव, गुज्जर और सैनी जैसे अन्य पिछडे वर्गों और दलितों को एकजुट किया । इसने पूरी तरह से जाटों को छोडा नहीं था और राज्य में इस समुदाय के वरिष्ठ नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया परंतु उसका ध्यान कम प्रभुत्व वाली जातियों पर था । उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी हरियाणा में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा था लेकिन राज्य के जाट बहुल पश्चिमी क्षेत्र में तो दूसरे स्थान पर रही थी । सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के चुनाव बाद सर्वेक्षण से पता चलता है कि भाजपा को राज्य में भ्रामरों के प्रतिशत सवर्ण जातियों में से पचपन प्रतिशत और अन्य पिछडी जातियों के चालीस प्रतिशत मत मिले । में नब्बे सदस्यीय विधानसभा चुनावों में महज चार सीट जीतने वाली पार्टी ने इस बार सैंतालीस सीटों पर कब्जा कर लिया और अपने दम पर राज्य में पहली बार सरकार का गठन किया । यहाँ भी उसने गैर जांच मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया । अमित शाह अपने सामाजिक गणित को हाल कर रहे थे लेकिन अगले साल बिहार में उन्हें एक जटिल सामाजिक जमीन पर उतरना था जो उनके लिए सबसे बडी चुनौती थी और जिसमें वे नाकाम होने वाले थे । राजनीतिक दृष्टि से संपन्न वर्ग से मुकाबला करने के लिए राजनीतिक गठबंधन तैयार करने की रणनीति कम आबादी की वजह से राजनीतिक रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली जैसे सवर्ण जातियां और सामाजिक दृष्टि से कमजोर और राजनीतिक रूप से अलग थलग हो परन्तु पर्याप्त संख्या जैसे पिछडा वर्ग और दलित वालों के बीच एक गठबंधन पर टिकी हुई थी । लालू प्रसाद ऐसे नेता हैं जिनकी राजनीतिक दृष्टि एकदम स्पष्ट है । उन्नीस सौ नब्बे से ही जाति का कार्ड बहुत ही निर्ममता के साथ खेल रहे हैं और उन्होंने लंबे समय तक राज्य सत्ता की तमाम सुविधाओं पर एकाधिकार कायम रखने वाली सवर्ण जातियों के खिलाफ राजनीतिक वातावरण् बनाया, पिछडों को सशक्त बनाया और उन्हें राजनीति में आवास प्रदान की । उनका खेल उस समय खत्म हो गया जब पिछडी जातियों के उनके द्वारा बनाए गठबंधन में दरार आ गई । यादव प्रभुत्व से नाराज नीतीश कुमार ने अति पिछडे समुदायों का नेतृत्व किया और उन्होंने सवर्ण जातियों के जनाधार वाली भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया । दो हजार पंद्रह में नीतीश और लालू प्रसाद एक बार फिर से साथ थे । लालू को भी यह अहसास हो गया था । सत्ता तक पहुंचने का रास्ता पिछडों के गठबंधन का वही मूल फार्मूला है जिसने में उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था । यदि ये अगडे पिछडे के बीच चुनाव हुआ भाजपा के जीतने का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि उसी समय जातियों के बीच अपने जनाधार तक ही सीमित रहना पडेगा नहीं । हम को जाति कार्ड का इस्तेमाल करते हुए लालू प्रसाद ने अकेले ही दम पर बिहार के चुनावों को अगडी जातियों बनाम अन्य पिछडी जातियों के बीच चुनाव की शक्ल दे दी थी । इसमें उनके सामने सबसे बडे सहयोगी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत थे । ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर को दिए एक साक्षात्कार में भागवत ने आरक्षण के राजनीतिकरण की आलोचना करते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की वकालत की थी । इस इंटरव्यू के बारे में अगले अध्याय में विस्तार से बात की गई है । उन्होंने सुझाव दिया था, ये एक स्वायत्तता प्राप्त आयोग इस पर अमल कर सकता है । लालू प्रसाद यादव को इसमें राजनीतिक लाभ की गंध मिल गई और तत्काल उन्होंने घोषणा की यदि भाजपा सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी । स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद लालू ने रोजाना छह से सात जनसभाएं गी । उसमें नौ बजे पटना में अपने घर से निकलते और तेर शाम लौटते तो उनके हाथ में आरएसएस के द्वितीय सरसंचालक एम एस गोलवल्कर की बंच ऑफ थॉट्स की प्रति होती है । उन्होंने इस किताब से अंश उद्धृत करते हुए कहा, जिससे पता चलता है कि आरएसएस हमेशा से ही आरक्षण विरोधी रहा है, राघवपुर के धबौली गांव में लालू प्रसाद के दूसरे पुत्र और संभावित उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव आपने पहले चुनाव में प्रचार कर रहे थे । उन्होंने तेजी से चलते हुए महिलाओं से आशीर्वाद मांगा और आदमियों से हाथ मिलाया । उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा, ये चुनाव उनके पक्ष में आ चुका है । यहाँ बदला था । उन्होंने कहा, आरएसएस प्रमुख की टिप्पणियों ने वास्तव में खेल ही बदल दिया है । अन्य पिछडी जातियां एकजुट हो गई हैं । भाजपा शहरों में रहने वालों के बीच अंतिम प्रयास कर रही है परन्तु मैं समझता हूँ यह वहाँ भी जीतेंगे । भाजपा सोचती है कि दो हजार चौदह के चुनावों की तरह ही विभिन्न जातियों के लोग मोदी के लिए वोट देंगे और अब तो अब ये नहीं होगा । आधुनिक शिक्षा के रूबरू हो चुका और बीस साल से अधिक आयु का ये युवा नेता सभी पक्षों द्वारा राजनीति के लिए जातियों के इस्तेमाल के बारे में क्या सोचता है ये तो हर जगह है । अमेरिका में क्या ये श्वेतों और कानों को लेकर रही हैं? जातियां तो हमारे समाज का वही तरीका है, सदियों से बनाया गया है और ये लंबे समय तक मुद्दा रहेगा । ये मायने रखता है । राष्ट्रीय जनता दल पहले से ही सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना के जाती संबंधित आंकडों की मांग करके जातियों के इर्द गिर्द अपना प्रचार केंद्र कर रहा था । सामाजिक ऍम जाति जनगणना का काम कांग्रेस के कार्यकाल में शुरू किया गया था । इसका भाजपा के सरकार के अंतर्गत जारी किया गया परंतु जातियों से संबंधित विवरण रोक लिया गया था । लालू प्रसाद का तर्क है कि ये पिछडों और दलितों की स्थिति, उनकी संपत्ति, उनकी आमदनी और शिक्षा का स्तर और उनके रोजगार की स्थिति को सही जानकारी देगा । मैं कर्जे आरएसएस आरक्षण खत्म करने की बात कर रहा है और हम आबादी के आधार पर इसे बढाने की बात कर रहे हैं कि संदेश एकदम सही ठिकाने पर पहुंचा । भाजपा जानती थी कि हालांकि सवर्ण जातियां व्यापक रूप से पार्टी के साथ रहेंगे । उसे पिछडी जातियों में अपनी पैठ बनानी थी परंतु आरक्षण खत्म होने की आशंका नीचे तक पहुंच गई थी । भाजपा पशोपेश में फंस गई तो भागवत की निंदा नहीं कर सकती थी पर अब तो उसने आरएसएस प्रमुख की टिप्पणियों से पूरी बना ली । उसने संघ से स्पष्टीकरण भी जारी कराया और प्रधानमंत्री ने भी आरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई लेकिन कुछ भी काम नहीं आया । डेढ साल बाद भाजपा के एक प्रमुख नेता नहीं तो बिहार चुनाव प्रचार में काफी सक्रिय थे । स्वीकार किया भागवत जी के बयान ने जितना हमने सोचा था उससे कहीं हमें अधिक नुकसान पहुंचाया । लालू प्रसाद के अलावा प्रशांत किशोर की टीम ने भी इस संदेश को नीचे तक पहुंचाया । उन्होंने पर्चे छापे और इसमें हमें बचाव की स्थिति में पहुंचा दिया । पिछडों में अपनी पैठ गहरी करने के लिए हमने जितना भी काम किया था सारा चौपट हो गया । इस चुनाव में नीतीश लालू गठबंधन के लिए किशोर मुख्य चुनाव रणनीतिकार थे । उन्होंने दो हजार बारह के गुजरात चुनाव और दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में मोदी के साथ काम किया था । हालांकि पार्टी के भीतर एक अलग विचार मंच था । इसका मानना था कि मतों की भागीदारी से संकेत मिलता है कि पार्टी को पिछडों का वोट भी मिला था और सिर्फ महागठबन्धन का गण था जिसने उसे सत्ता में पहुंचा दिया । लेकिन ये सिर्फ संघ ही नहीं था । किसी नेता ने ये भी स्वीकार किया कि भाजपा ने भी जातीय समीकरणों विषेशकर टिकटों के वितरण के मामले में सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया । पहली सूची में हमने सवर्ण जातियों को बहुत अधिक टिकट दे दिए थे । इसमें हमें अगडों की पार्टी के रूप में पेश करने का लालू का काम और अधिक आसान बना दिया था । इसके बाद हमने करीब तीस मिनट यादव को ये सोच कर दिए उनके यादव वोट पडेंगे, ये मूर्खतापूर्ण था । ये बातें नहीं और हमने वो टिकट बेकार कर दिए और दूसरे समुदायों को भी नाराज कर लिया । भाजपा के विद्रोही उम्मीदवार भी सत्तर से अधिक सीटों पर चुनाव मैदान में थे । भाजपा पिछडों और दलितों के बीच अपने समर्थन के अभाव को देखते हुए गठबंधन बनाने के प्रति बहुत सावधानी पड रही थी । उसने अपने राजग सहयोगी रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ये सोचकर कि वह समुचित कोई भी वोट दिलाएंगे और कुर्मी कोई भी गठबंधन को तोडेंगे जिसमें नीतीश को सत्ता तक पहुंचाया था, के साथ रिश्ता जोडा । उन्होंने मुख्यमंत्री पद से हटाए गए जीतन राम मांझी से भी तालमेल किया और उम्मीद की कि वह नीतीश कुमार के महादलित वोट बैंक में सेंध लगाएंगे तथा राजू पर तो ये गन्ना ठीक लगती थी तो इन गठबंधनों ने बहुत बडी कीमत परसोली एक और भाजपा नेता नहीं तो पासवान, कुशवाहा और मांझी के सहयोगी होने की वजह से अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते हैं हूँ । हमारा गठबंधन पूरी तरह असफल रहा । हम ने इन दलों को अस्सी सीटें दी । उनका इतना सीमित जनाधार था । यह बरबादी थी । इनमें से अधिकांश ने टिकट देश दिए और अपनी जाति पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया । किस उसके एकदम विपरीत था जो नीतीश लालू कांग्रेस को मिलाकर बने महागठबन्धन ने किया था । अपेक्षाओं के विपरीत टिकट वितरण बहुत ही सहजता से हुआ था । एक बार फिर प्रशांत किशोर नहीं जमीनी हकीकत का आकलन ये पता लगाने में अहम भूमिका निभाई किस निर्वाचन क्षेत्र में कौन सा दल और उम्मीदवार सबसे अच्छी स्थिति में होगा और वो अनौपचारिक रूप से नीतीश और लालू प्रसाद के बीच सहज साझेदारी सुनिश्चित करने के लिए मध्यस्थता की भूमिका निभा रहे थे । भाजपा नेता बताते हैं लालू प्रसाद यादव प्रभुत्व वाली सीट मिली । कांग्रेस को सवर्ण जातियों वाली सीटें दी गई जबकि नीतीश ने अति पिछडी जाति की सीटे ली और उनके मत एक दूसरे के लिए हस्तांतरित हो गए । महागठबन्धन ने करीब पचपन प्रतिशत टिकट अन्य पिछडी जातियों और पंद्रह प्रतिशत दलितों को दिए थे । नरेंद्र मोदी के पिछडी जाति का होने की वजह से दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों में पिछले समुदायों का भाजपा को समर्थन मिल गया था । यद्यपि एक साल के भीतर ही मोदी के पिछडा होने की छवि और शाह का प्रबंधन और गठबंधन कोई काम नहीं आया । भाजपा एक बार फिर सामाजिक रूप से संपन्न सवर्ण जातियों की पार्टी के रूप में देखे जाने लगी । ऐसी पार्टी तो आरक्षण के जरिए तरक्की करने के वंचितों और हाशिये के लोगों के दावों और अपेक्षाओं को कबूल करने को तैयार नहीं थी । आपने संपर्क बिहार में शासन करने की भाजपा की लाल था, अधूरी ही रहेगी क्योंकि वो बिहार की सृजनता को और लक्षित करने में असमर्थ थी । इसकी सामाजिक इंजीनियरिंग औंधेमुंह गिर गई । बिहार के ताजा नतीजों से मिले सबका के बाद भाजपा अब उत्तर प्रदेश के चुनावों की तैयारियों में जुट गई । इसके पास गठबंधन के लिए नमूना पहले से ही था । दो हजार चौदह में अमित शाह ने साठ प्रतिशत का फार्मूला तैयार किया था । फॉरमूला हाँ, क्या राज्यसभा के सदस्य भूपेंद्र यादव पार्टी के महासचिव और अमित शाह के भरोसेमंद सहयोगी हैं? बोलता हूँ राजस्थान के रहने वाले भूपेंद्र यादव उत्तर भारत की जातीय समीकरणों से परिचित थे और वो बिहार के प्रभारी थे । पेशे से वकील यादव को उत्तर प्रदेश में प्रचार के दौरान परिवर्तन यात्रा और जनता तक पहुंचने के काम में संगठन की मदद करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी । चुनाव के बाद उन्हें पिछडे वर्गों के नए आयोग के गठन संबंधी संसदीय समिति की अध्यक्षता करनी थी । उन्हें दो हजार सत्रह के अंत में गुजरात में होने वाले चुनाव के मद्देनजर राज्य का प्रभारी बनाए जाने वाला था की उनके प्रति मोदी और शाह के भरोसे को दर्शाता है । मार्च महीने की एक शाम यादव चुनाव प्रचार से लौट रहे अमित शाह को लेने पार्टी के लखनऊ कार्यालय से हवाई अड्डे जा रहे थे । हवाई अड्डे तक की पैंतालीस मिनट से अधिक की यात्रा के दौरान उन्होंने साठ प्रतिशत के फॉर्मूले की रूपरेखा को दोहराया जो चुनाव प्रबंधन के मामले में अमित शाह स्कूल का ट्रेडमार्क था । यादव बताते हैं, देखिए इस चुनाव में मुसलमान तो बीस प्रतिशत है । वो हमें वोट नहीं देंगे । यादव जो करीब दस प्रतिशत है, मोटे तौर पर समाजवादी पार्टी के प्रति ही निष्ठावान रहेंगे, जाता हूँ तो दस प्रतिशत से थोडा अधिक हैं । बसपा के प्रति वफादार बने रहेंगे । लुभाने के लिए हमारे पास बचपन से साठ प्रतिशत मतदाता ही बचते हैं । हम इन्हें ही अपना लक्ष्य बना रहे हैं । इसका मतलब पारंपरिक सवर्ण जातियों का जनाधार है । इसका मतलब है कि पिछले समुदाय जिनमें सैकडों छोटी और बडी जातियां हैं जो अन्य पिछडे वर्गों के दायरे में आती हैं परंतु उन्हें सत्ता में उस तरह की भागीदारी नहीं मिली जो यादव को मिली । इसका मतलब है उत्तर प्रदेश में साठ दलित उपजातियों में से पचास जरूरी नहीं कि जाटों की तरह सशक्त हुई हूँ परन्तु ऐसे क्षेत्रों की पहचान करना आसान काम था लेकिन उन्हें अपने साथ लाना असल चुनौती दो हजार चौदह में इसका रास्ता बनाया । अन्य पिछडा वर्ग बडी संख्या में भाजपा के पास लौट आया परंतु पार्टी नेतृत्व जानता था इस सफलता को बनाये रखने के लिए संगठन की संरचना में नीचे तक बदलाव करना होगा । यही वो मुकाम था जिसमें अमित शाह और उनकी टीम द्वारा संगठन में किए गए कार्यों को अपनी भूमिका निभानी थी । सुनील बंसल को जब संगठन का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश भेजा गया तो उन्होंने प्रदेश में पार्टी के भीतर के जातीय समीकरणों और संरचना का फटाफट सर्वे कराया और वो जानकार हतप्रद रह गए । दो हजार चौदह में राज्य में लखनऊ से लेकर जिला स्तर तक पार्टी में सिर्फ सात प्रतिशत अन्य पिछडे वर्ग और तीन प्रतिशत दलित समुदाय के पदाधिकारी थे । इसका मतलब सास था । राज्य की आबादी में करीब सत्तर प्रतिशत इन समूहों से थे । लेकिन भाजपा के संगठन में उन्हें सिर्फ दस प्रतिशत ही स्थान मिला हुआ था । संगठन में ग्रामीणों, ठाकुर और बनियों का वर्चस्व था । ये दर्शाता था लखनऊ में भाजपा में किस्टो प्रभुत्व है । इसमें कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और सूर्य प्रताप शाही थे जिनके पास पिछले दस साल से पार्टी की बागडोर थी । ये नेता संगठन में विभिन्न स्तरों पर नियुक्तियों के लिए अपनी जाती की और मुखातिब हुए और उन्हें ही आगे बढाया । भाजपा के नए नेतृत्व के पास ऐसी टीम थी । एक ऐसी टीम दो बार बार नतीजे देने में विफल रही । ऐसी टीम जिसमें राज्य की सामाजिक विविधता नहीं लगती थी, वो जानती थी की पार्टी की विफलता की यही वजह है । फिर भी हमेशा ही पार्टी के प्रति निष्ठावान रहे । इन लोगों को पूरी तरह अलग अलग किए बगैर ही उसे इसमें बदलाव करना था । इसे ठीक करने का उचित समय दो हजार चौदह के अंत और दो हजार पंद्रह के शुरू में चलाया गया सदस्यता अभियान के दौरान ही था । अन्य पिछडे वर्गों और दलित समुदाय के सात सौ अस्सी कार्यकर्ताओं को नए सदस्य बनाने के लिए उन गांवों और कस्बों में भेजा गया जहां उनकी अपनी जाति का प्रभुत्व था । इसका परिणाम यह हुआ तीन समुदायों के पंद्रह लाख नए सदस्यों का पार्टी में पंजीकरण हुआ तो पार्टी में असली बदलाव दो हजार पंद्रह में संगठन में हुए फेरबदल से आया । बंसल ने शाह से पूछा कि क्या वह पार्टी में अन्य पिछडे वर्गों और दलितों का प्रतिनिधित्व को बढा सकते हैं । चाहने जवाब दिया, बात ठीक है पर लोग नाराज होंगे । उन्होंने अभी एक रास्ता निकाला, मौजूदा व्यवस्था में हिस्सेदारी देने की बजाय पार्टी पदाधिकारियों की संख्या बढा सकती है । चाहने से हरी झंडी दे दी । इसमें पार्टी में हर स्तर पर विशेष कर अन्य पिछडे वर्गों और दलितों के लिए पद बढाने का लाइसेंस दे दिया । प्रत्येक जिले में बारह नए पदाधिकारी जोडे गए । राज्य की कार्य समिति में एक सौ नई सदस्य शामिल किए गए तो पहले से ही पदाधिकारी थे । उन्हें नहीं हटाया गया जिसने पार्टी में असंतोष काम करने में मदद थी । दो हजार पंद्रह के अंत पार्टी में नए अन्य पिछडे वर्गों और दलितों के एक हजार नेताओं का फूल था । अब ये लोग भी खुद को पार्टी संगठन का हिस्सा महसूस करने लगे । पार्टी में जगह मिली और उनकी वर्ष को मान्यता मिली । पार्टी की संरचना में औपचारिक रूप से इस के नजर आने की भी जरूरत थी । संगठनात्मक चुनावों के दौरान भाजपा ने धीरे धीरे उन्हें नेतृत्व करने की बागडोर सौंपी और पार्टी में समाहित करने तथा समुचित प्रतिनिधित्व की उनकी अपेक्षाओं को संतुष्ट किया । अब पचहत्तर जिला अध्यक्षों में से चौंतीस अन्य पिछडी जातियों और तीन अनुसूचित जाति के थे । यदि दो हजार चौदह में इन समूहों का संगठन में दस प्रतिशत प्रतिनिधित्व था, दो साल के भीतर ही उनकी हिस्सेदारी तीस फीसदी हो गई थी । भाजपा ने बेहद खामोशी के साथ लगभग अदृश्य तरीके से बदलाव किया और इसकी विशेषता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ सीधे सीधे विद्रोह किए बगैर ही ये हुआ था । क्या इससे सवर्ण जातियां परेशान हुई? बंसल जवाब देते हैं, देखिए, अगर अन्य पिछडे वर्ग और दलितों के नेताओं को कहीं और से लाकर बिठाया होता और जिला नेतृत्व से कहा गया होता, यह स्वीकार करो । उसका प्रतिरोध हो सकता था । परंतु याद रखिए, हमने इन्हें दो हजार पंद्रह नहीं संगठन ढांचे में शामिल कर लिया था । इस तरह अब एक साल तक वर्तमान सिला नेतृत्व के साथ काम कर चुके थे और जिला प्रमुखों के चयन की प्रक्रिया, परामर्श और आम सहमती थी । इसमें अधिक परेशानी नहीं थी । इस कवायद के अंत नहीं केशव प्रसाद मौर्य को राज्य इकाई का प्रदेश अध्यक्ष ने किया गया था । मौर्य पिछडे वर्ग के थे और हिंदुत्व के बारे में उनकी सोच सर्वविदित थी । निश्चित ही मौर्य एक प्रतिकात्मक पसंद थे । उत्तर प्रदेश में हर फैसले को जाती के दशमी की नजर से देखा जाता है । हम तो इस बार भाजपा उनकी संकेतिक पसंद से भी आगे बढ गई । उनकी नियुक्ति संगठन के भीतर अधिक बदलाव होने की ओर इशारा कर रही थी । केशव प्रसाद मौर्य ने सहारनपुर की जनसभा में अपना भाषण खत्म किया और हम अमरोहा में उनकी अगली जनसभा के लिए वापस हेलीकॉप्टर में सवार हुए । मैंने थोडे शरारतपूर्ण अंदाज में केशव प्रसाद मौर्य से पूछा, ये सब लोग यहां आए थे क्योंकि आपको मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं । क्या पार्टी को इस पद के लिए आप उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं करना चाहिए था? बहुत होशियार थे और हमारे ध्यान में फंसने वाले नहीं थे । मौर्य ने मुस्कराते हुए कंधे उसका और कहा, भाजपा ने प्रत्येक कार्यकर्ता संभावित मुख्यमंत्री है । भाजपा ने दो हजार सोलह में ही तीन मुख्य कारणों से किसी को भी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करने का फैसला किया । आप भी जानते थे उनके पास राज्यस्तर का ऐसा कोई चेहरा नहीं है । प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती सरीखे पहले से स्थापित क्षेत्रीय छत्रपों का मुकाबला कर सके । इस जाति के व्यक्ति को मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना दूसरी जातियों को दूर कर देगा और इस तरह से बहुजातीय गठबंधन के निर्माण का काम प्रभावित होगा और वैसे भी मोदी का नाम और आकर्षण किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करने की कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा । पार्टी नेताओं का तर्क था, इसके लिए कोई निश्चित फार्मूला नहीं था । बिहार में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा नहीं था । वहाँ उसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था जबकि महाराष्ट्र में उसने काफी अच्छा किया था । आसाम में उसके पास मुख्यमंत्री पद का चेहरा था और वह जीती, परंतु दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरा पेश किया और वह बुरी तरह पराजित हो गई । लेकिन इसमें थोडा ही संदेह है के मौर्य में मुख्यमंत्री बनने की महत्वकांक्षा थी और कोई वायदा किए बगैर पिछडी जातियों के लिए चालाकी भरा संदेश था । उनका अपना आदमी इस पद पर आसीन हो सकता है । इस वंश है मददगार हुआ मोरिया के सहायक विवेक सिंह ने खाने का डिब्बा निकाला और उसमें से घर में बनी रोटी में लिपटी सब्जी अपने नेता को दिया । हमने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानों को ऊपर से देखा और हेलीकॉप्टर के शोर के बीच ही मैंने उनसे पूछा कि उन्हें लगता है या अन्य पिछडा वर्ग पार्टी के लिए वोट करेगा । मौर्य ने जवाब दिया, इस बार हमने टिकट वितरण में न्याय किया है । भाजपा ने उत्तर प्रदेश के अपने चुनावी इतिहास में पहली बार सबसे अधिक टिकट अन्य पिछडा वर्गों को दिए हैं । ये हमारे समाज को हमारी और आकर्षित करेगा । वो इससे सवर्ण जातियों के परेशान होने को लेकर चिंतित नहीं थे । नहीं, उन्हें भी डेढ सौ से अधिक टिकट दिए गए हैं । हम सभी हो एक साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं और फिर विडंबना को समझे बगैर ही मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, दूसरे दलों ने इतने सारे टिकट मुस्लिमों को दिए हैं । उन्होंने दूसरों के साथ अन्याय किया है । ये सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं था बल्कि संदेश था जिसने इन समुदायों से अपील करने में भारतीय जनता पार्टी की मदद की और यही संदेश इस बात के इर्दगिर्द केंद्रित रहा । इस सपा और बसपा ने किस तरह उनके साथ गलत व्यवहार किया तो कहते हैं, इन सभी लोगों ने किसी न किसी समय समाजवादी पार्टी को वोट दिया परंतु सिर्फ एक समुदाय ही लाभान्वित हुआ । वो अब विकल्प की तलाश कर रहे हैं । वो जानते हैं कि भाजपा किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है कि सब की पार्टी है । ये भी जोड सकते थे । वे सभी जो हिंदू है । मौर्य उस विरोधाभास को उजागर कर रहे थे तो मौजूद था और अन्य पिछडा वर्ग परिवार के भीतर और अधिक तेज हो गया था और इसका एक पुराना इतिहास रहा है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सवर्ण जाती हूँ तो और मुस्लिमों के मिले जुले गठबंधन के आधार पर परंपरागत तरीके से चुनाव जीतती रही थी । परंतु मझोले कामगारों और पिछडों ने महसूस किया । सत्ता के इस गणित में उन्हें शामिल नहीं किया गया है और वे उन्नीस सौ साठ के दशक से ही समाजवादी संगठनों की और आकर्षित होने लगे जैसा कि राजनीतिक वैज्ञानिक कॅालेजों ने दर्ज किया है । ये राम मनोहर लोहिया की राजनीति के दायरे में हुआ जिसमें जाति के आधार पर प्रतिनिधित्व और मुख्य रूप से सकारात्मक कार्यवाही यानी आरक्षण की मांग की गई थी और चरण सिंह की राजनीति इसमें किसानों की व्यापक पहचान का मुद्दा उठाया गया और किसान की पहचान के इर्द गिर्द की मांगों पर जोर दिया गया परन्तु अंत में लोहिया की राजनीतिक विचारधारा का प्रभुत्व कायम हुआ । विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की । इसमें अन्य पिछडे वर्गों के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में तो प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था । ये एक निर्णायक बोर्ड था । अन्य पिछडे वर्गों की राजनीतिक चेतना गहरी होती जा रही थी जिसने मुस्लिमों के साथ गठबंधन करके लालू प्रसाद यादव को बिहार और मुलायम सिंह को उत्तर प्रदेश में अपना नेता चुन लिया । लेकिन ये राज्य सरकारें व्यापक अन्य पिछडा वर्ग परिवार को लाभ पहुंचाने की बजाय जाती की जागीर बन कर रह गई । सरकारी नौकरियों से लेकर राजनीतिक पदों तक लालू और मुलायम दोनों के राज को यादव राज के नाम से जाना जाने लगा । जैसा कि जब फ्लो लिखते हैं ये धारणा बना दी । इस जाति ने शुरू से ही अपने लाभ के लिए अन्य पिछडे वर्गों का इस्तेमाल किया है । इस वजह से पिछडे वर्गों के भीतर भी विरोधाभास शुरू हो गया । बिहार में उदाहरण के लिए लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों ही व्यापक जनता परिवार के कमरे थे और पिछडों के सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध थे । लेकिन नीतीश कुमार तो कुर्मी थे और पूर्वी कम ताकतवर होने और यादवों की तुलना में संख्या में कम होने के बावजूद अन्य पिछडा वर्ग किए महत्वपूर्ण जाती है । उन्हें पार्टी में किनारे लगाए जाने से उनमें असंतोष था । नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से रिश्ता जोडा और उसे तैयार किया । उन्होंने अंततः समूची अति पिछडी जातियों को ही तैयार किया और अन्य पिछडा वर्ग को खंडित कर दिया । जैसा की हमने ऊपर देखा, पिछडों ने सिर्फ दो हजार पंद्रह नहीं एक साथ वोट दिया । नीतीश और लालू दशकों के बाद एक साथ आई थी । उत्तर प्रदेश में भी अंतर्विरोध तेज हो गया । हो सकता है कि अन्य पिछडा वर्ग आरक्षण पाने की लालसा पूरी करने और कांग्रेस की दादागिरी खत्म करने के अपने लक्ष्य के लिए एकजुट हो गया हो परन्तु अब यादव और गैर यादव की दरार पैदा हो गई थी । अधिकांश पिछडे समूह और में कुशवाहा लूज और अन्य समाजवादी पार्टी के दायरे दूर हो चुके थे । कुछ नहीं बस पा से उम्मीद लगा रखी थी परंतु यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी । दूसरे दलों द्वारा मुसलमानों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिए जाने और इस तरह से दूसरों के साथ न्याय नहीं करने संबंधी केशव मौर्य के भर आज से भाजपा के वैचारिक पूर्वाग्रहों का ही पता चलता है । प्रंतीय सही था । सपा और बसपा ने गैर यादव अन्य पिछडे वर्गों को लुभाने में अधिक समय नहीं लगाया और उसने भाजपा को पूरा खुला अवसर प्रदान कर दिया । बिहार में नीतीश कुमार ने इन समुदायों की नाराजगी जाहिर की थी और उनकी अपेक्षाओं पर तवज्जो दी थी । उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नेता नहीं था । चुनावी गन्ना से तीस प्रतिशत को अलग कर देना उत्तर प्रदेश में किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए आत्मघाती हो सकता है । अखिल यादव विभिन्न जातियों के बीच सपा की एक यादव पार्टी होने की छवि से बाहर निकलते हुए अपने विकास के नाम पर शब्दाडंबर के भरोसे थे । लेकिन भाजपा का मानना था की ये काम नहीं करेगा । उसने खुद को ऐसी ताकत के रूप में पेश किया तो जाती के खिलाफ खडी है जिसमें सिर्फ अपना अपना क्या और बाकी सभी की अपेक्षा की । और इसीलिए जब हम अमरोहा में हेलीकॉप्टर से उतरे तो मोर्चा ने कहा कुछ जातियां तो विशेषाधिकार वाली जातियां हो गई हैं । चुनाव उसके खिलाफ जनादेश है । भाजपा को सफलता मिली । राज्य के प्रत्येक कोने में पिछडे वर्ग के लोगों ने अपनी स्थिति मजबूत की । बुंदेलखंड को ही लें । निलंजन सरकार भानु जोशी और आशीष रंजन राजनीतिक वैज्ञानिक हैं और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के साथ हैं । उन्होंने उत्तर प्रदेश से हिंदू अखबार के लिए लिखा, झांसी के बबीना निर्वाचन क्षेत्र में उनकी मुलाकात राजभर समुदाय के एक परिवार से हुई । इनमें सभी ने दो हजार बारह के चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था । इस बार तो भाजपा को वोट देंगे । परिवार ने महसूस किया कि उन्हें उतनी आर्थिक मदद नहीं मिली जितनी सरकार ने सूखे से प्रभावित लोगों को देने का वायदा किया था परन्तु यादव को उनके हिस्से से भी कहीं अधिक पाला । मध्यम आयु के एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि सिर्फ काम करने के बारे में नहीं है । हम कोई ऐसा चाहते हैं जो हम सभी के साथ एक समान व्यवहार करें । छटता जोशी और रंजन ने निष्कर्ष निकाला, उचित हूँ या नहीं तो पूरे उत्तर प्रदेश में उनकी यानी अखिलेश यादव की पार्टी का संगठन अभी भी स्थानीय नौकरशाही, पुलिस और सामाजिक ढांचे में बडे पैमाने पर यादव प्रभुत्व से जुडा हुआ है और फिर पता हिंसा के माध्यम से शासन चला रहा है । जब ही संसाधनों को अपनी जाती की और बोल रहा है या फिर मध्यपश्चिम उत्तर प्रदेश में जायेंगे पत्रकार शिवम विज ने एक सप्ताह राजगंज में बिता एक ऐसी सीट है उन्नीस सौ चौहत्तर से ही उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने वाले दल को वोट देने में आगे रही है । ये भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का क्षेत्र था । दो हजार बारह में सपा के साथ कुछ समय बिताने के बाद पार्टी का कद्दावर लोध नेता की घर वापसी हो गई थी । हालांकि इस समय वो राजस्थान के राज्यपाल थे लेकिन उनके समुदाय के लिए इस संदेश में कोई तकलीफ नहीं थी । भाजपा उन्हें महत्व और सम्मान दे रही थी । उनका पौत्र एक अन्य सीट से चुनाव मैदान में प्रत्याशी था और भाजपा नेतृत्व ने अपनी प्रत्येक जनसभा में कानून व्यवस्था की दृष्टि से कल्याण सिंह के शासन को प्रदेश का स्टाॅल बताया । इस विडंबना को मत भूलिए कि कल्याण सिंह के शासनकाल में ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी । रिज ने लिखा, इस निर्वाचन क्षेत्र में तीन लाख के आस पास मतदाताओं में से पैंसठ हजार से अधिक लोग थे और भाजपा अकेली पार्टी थी । उसने लोग को अपना उम्मीदवार बनाया था । भाजपा के पारंपरिक सवर्ण जातियों के वो और अन्य पिछडे वर्ग के समूह हो लो । वोट के साथ जुडने से भाजपा यहाँ करीब करें अच्छी लग रही थी । विज बाद में याद करते हुए बताते हैं, कल्याण सिंह के प्रति निष्ठा और उनकी जाति का उम्मीदवार होने के अलावा यादव विरोधी भावनाएं जगजाहिर थी । वो कहते हैं, एक गांव में मुझे याद है कि मैं गैर यादव पिछडे वर्गों के एक समूह से बात कर रहा था जिसमें लोग पश्चिमी और अन्य शामिल थे । एक यादव आया और हमारी बातचीत में व्यवधान डालते हुए बहुत ही आक्रमक ऍम बोला अखिलेश, अखिलेश फिर वहाँ से चला गया । लूट समुदाय का एक व्यक्ति घूमा और अफगान बोला, किसी तरह का आचरण है कि उनकी हार का कारण बनेगा । यहाँ पूर्वांचल की और जाये जैसा टेलीग्राफ अखबार के रॉलिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने मार्च के शुरू में किया था । वाराणसी में प्रधानमंत्री द्वारा अपनाए गए गांव जयपुर में उनकी मुलाकात ग्राम प्रधान नारायण पटेल से हुई तो कुर्मी थे पटेल भाजपा की सहयोगी और अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाली छोटी पार्टी अपना दल के समर्थक थे । अनुप्रिया पटेल । मिर्जापुर से सांसद और आप केंद्र सरकार नहीं मंत्री हैं । ये गठबंधन दो हजार चौदह के चुनाव में कुछ भी मतों को प्राप्त करने की अमित शाह की रणनीति का हिस्सा है । चाहने दो हजार सत्रह के चुनाव में भी ये गठबंधन बनाए रखा था । आपके विचार आम तौर पर चुनावों के प्रति उनके दृष्टिकोण से सही है । मतों को बढाएं । पांच से दस प्रतिशत के उस अंतर को दूर करें । इसमें भाजपा को जीत से दूर रखा था । इसके लिए दूसरे दलों के नेताओं को तोडने ऐसे सहयोगी को साथ लेने की रणनीति थी जो भले ही छोटे हूँ और हम तो एक समुदाय पर उसका प्रभाव हो । उत्तर प्रदेश में ये गठबंधन स्वतंत्र अन्य पिछडे समूहों के प्रति भाजपा की संवेदनशीलता को दर्शाने की रणनीति में सही बैठता था । इसी तरह का गठबंधन राजभर समुदाय की एक छोटी सी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ भी किया गया था । पूरे फॅमिली अपनी मोटरसाइकिल पर चुनाव प्रचार कर रहे नारायण पटेल ने ठाकुर से कहा, मेरा सरोकार मोदी है और सिर्फ उन से है । देश को अभी तक ऐसा नेता नहीं मिला था और उत्तर प्रदेश को भी मोदी की जरूरत है या आप राज्य के दूसरे छोर पर करीब करीब दिल्ली की सीमा से लगे हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जांच इलाके को ही ले लीजिए । देश स्पष्ट था परन्तु क्षेत्रों की विशिष्टता ने इसे अनुकूल बनाया था । दो हजार चौदह के चुनाव में भाजपा ने मुख्य रूप से जाट वोटों के सहारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सफाया कर दिया था । इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को उम्मीद थे जाट समुदाय पार्टी में लौट आएगा । ऐसा लगता था हरियाणा में गैर जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने, अन्य पिछडे वर्ग की केंद्रीय सूची में जाटों को शामिल करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करना और उनके कद्दावर नेता चौधरी चरण सिंह के प्रति अनादर रखने की वजह से ये समुदाय नाराज था । उसके बावजूद भाजपा ने इस इलाके में सफाई कर दिया । राष्ट्रीय लोकदल के एक नेता ने बाद में सफाई देते हुए कहा, आप जानते हैं चार्ट हमारे पास लौटे हैं । दो हजार चौदह में हमें सिर्फ सात लाख गैस के आसपास मत मिले थे । सिर्फ जीरो दशमलव आठ प्रतिशत ही था । लेकिन इस बार हमें पंद्रह लाख से भी ज्यादा वोट मिले तो एक दशमलव आठ प्रतिशत है । समस्या ये हुई कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में सभी अन्य पिछडा वर्ग भाजपा के लिए एकजुट हो गए । उनके पीछे पिछडों के एकजुट होने की सीमा जो खाने वाली है इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा को प्रभावशाली वर्ग से निपटने में सक्षम होने वाले दल के रूप में देखा गया था । हमारे इलाके में सैनी और गुज्जर में महसूस किया कि भाजपा जाटों को काबू में रखेगी । जाटों ने जितना अधिक कहा कि वह इस बार आरएलडी को वोट देंगे, दूसरे उतना ही अधिक प्रतिबद्ध होकर भाजपा को वोट देंगे । अंततः भाजपा को जाटों के साथ ही सभी पिछडों के भी मत मिले । उत्तर प्रदेश के सभी बडे क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी खुद को वंचित तबकों के मसीहा के रूप में पेश करने में कामयाब रही और अंततः एक ऐसी प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरी सभी के लिए थे और जिसने विभिन्न जातियों से बनी राज्य की अकेली सबसे बडी आबादी को जीता जिसमें गैर यादव ओबीसी शामिल थे । मेरठ में सतीश प्रकाश एक दल प्रोफेसर हैं । प्रकाश कि बसपा से सहानुभूति है परंतु वो स्वतंत्र हैं । पार्टी की राजनीति के आलोचक हैं । दलित समाज में अच्छी तरह पैठ रखने वाले प्रकाश पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने समुदाय के एक महत्वपूर्ण बुद्धिजीवी के रूप में भर रहे हैं । चुनाव प्रचार के दौरान हम दोनों ने एक साथ ही हस्तिनापुर, सुरक्षित क्षेत्र है की यात्रा और बसपा प्रत्याशी योगेश वर्मा के प्रचार अभियान को देखा । प्रकाश उनकी जीत के प्रति उसी तरह आश्वस्त जैसा कि वह मायावती के लखनऊ में मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता में लौटने के प्रति थे । चुनावों के बाद हमने उनसे बात करके जानना चाहा । गडबडी कहाँ हुई है? प्रकाश ने कहा, दलितों और जाटवों के एक वर्ग ने विशेष रूप से ब्राह्मणवाद के खिलाफ लगातार आवाज उठाई और अपने लिए जगह मांगी । जब आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त हो गए तो इस जगह पर अपना एकाधिकार जमाना चाहते थे । क्या उनकी अपने समुदाय के भीतर ही कमजोर वर्गों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं थी? बसपा ने इसे नहीं समझा । हज पाने से समझा उत्तर प्रदेश में सभी सामाजिक समूहों में दलित सबसे अधिक कमजोर है और दलितों में भी छोटी और इधर उधर फैली जातियां सबसे कमजोर हैं । इनके पास संख्या शिक्षा, मध्यम वर्ग और राजनीतिक नेता नहीं है । उनकी समस्याओं को सही तरीके से पेश कर सके वो गलत हैं । जिन्होंने आगे बढने की प्रक्रिया में किसी हिस्से के बगैर ही चार दशकों तक पूरी निष्ठा के साथ कांग्रेस को वोट दिया । वो गलत है जिन्होंने मायावती को वोट दिया । परंतु वे पार्टी की मशीनरी पर जाटवों के एकाधिकार के कारण पीछे ही रह गए । वो गलत है । उन्होंने समाजवादी पार्टी के यादव को अपने शोषकों के रूप में देखा है । प्रकाश उन दलितों के संदर्भ में कह रहे थे जिनके प्रति अब अधिक ताकतवर हो चुके दलितों की जिम्मेवारी थी । दलितों को पार्टी में पीछे छोड दिया गया था । अदालत हैं इस बार भारतीय जनता पार्टी की और चले गए । बद्रीनारायण उत्तर प्रदेश के दलितों की राजनीति के एक जाने माने विचार विद्वान और फॅमिली के लेखक हैं । अप्रैल की शुरुआत में बिहार के प्रमुख बुद्धिजीवी सैबल गुप्ता द्वारा पटना में आयोजित एक सम्मेलन में नारायण ने व्याख्यान दिया । उत्तर प्रदेश में मिली विजय की गहमागहमी शहर में भी थी । अब सारी बातचीत पडोसी राज्य में जो कुछ हुआ उसी के इर्द गिर्द केंद्र है । नारायण खुद भी इस विजय के पैमाने से हत्या थे और उन्होंने उसी बात को आगे बढा कि प्रकाश नहीं मुझसे कही थी । उन्होंने बताया, उत्तर प्रदेश में दलितों में साठ से अधिक उपजातियां हैं । इनमें से कुछ का सशक्तीकरण हो गया है और इनमें जाटों भी हैं जिन्होंने राजनीतिक सप्ताह में एक बडा हिस्सा हासिल कर लिया और सरकारी नौकरियों और योजनाओं का भी लाभ प्राप्त कर लिया । शिक्षा मूलभूत बुद्धिजीवी हूँ और समुदाय के नेताओं के सृजन अपनी जाति के माध्यम से, सांस्कृतिक रूप से अपनी पहचान का दावा करके और हीरो तथा अन्य जातीय प्रति को जैसे कई कारणों से आगे निकल गए । कमजोर तब का अभी भी व्यापक रूप से प्रशिक्षित था । उनके पास अपने समुदाय को उनके समकक्ष कोई नेता नहीं थे जो उन्हें संगठित करते और अपनी पहचान को लेकर दावा करते हैं । आप जानते हैं काशीराम इन सभी समुदायों में आत्मनिर्भर होने का एहसास दिलाने के लिए उनमें से सभी के अलग से नाम लिया करते थे । मायावती ने सभी को एक साथ इकट्ठा कर दिया और उन्हें बहुत कम जगह दी । काशी राम ने ये भी कहा था जिनकी जितनी संख्या है उनकी उतनी हिस्सेदारी परन्तु क्या दलितों में भी ये नियम लागू हुआ जाटव थे जिन्होंने दलितों की सीटों का बडा हिस्सा हथिया लिया था । मेरठ में प्रकाश से सहमत थे । दूसरी सबसे बडी दल जाती वाल्मिकियों को ही ले लीजिए । जिला स्तर पर उनमें से कितने पार्टी सचिव है, एक भी नहीं । वही घटना के बारे में बताते हैं । इसके बारे में वो दावा करते हैं कि बसपा के बारे में वाल्मीकियों का कथन महत्वपूर्ण है । मायावती जब मुख्यमंत्री थी एक दलित महिला रेखा वाल्मीकि पूर्वांचल में कहीं पर एक स्कूल में दोपहर भोजन की रसोइयां थे । कुछ छात्रों ने इस पर आपत्ति की । आपको पता है कि मायावती ने क्या किया? उन्होंने वाल्मिकी को हटा दिया । इसका दूसरे स्कूलों पर भी दूरगामी असर पडा था । जरा सोचिए इससे पूरे समाज के लिए क्या संदेश गया होगा । बिहार में नीतीश कुमार ने दलितों में व्याप्त विरोधाभाष का ही सहारा लिया । इनमें पासवान को प्रबल माना जाता था । उन्हें प्रतिद्वंद्वी रामविलास पासवान के प्रति निष्ठावान माना जाता था । नीतीश कुमार ने महादलितों की एक नई श्रेणी को जान दे दिया । ये सबसे अधिक हाशिये वाले दलित थे तो दो हजार दस और दो हजार पंद्रह के चुनावों में बडी संख्या में उनके साथ जुड गए थे । और भाजपा ने इस समझ लिया था उत्तर प्रदेश में भी यही विरोधावासी मौजूद है । अमित शाह ने एक बार फिर ये दिखा दिया । वो उत्तर भारत में राज्य में पहले से ही गहरी जडें जमाए नेताओं से कहीं अच्छे समाजशास्त्री क्यों हैं? उन्होंने इन विरोधाभासों को पहचान दी और इसे तेज किया और वर्ग में सबसे अधिक प्रभुत्ववाले समूह के खडा सभी को संगठित किया । नारायण पर पेश करते हैं राशि राम में जो जाटों के लिए क्या आरएसएस और भाजपा ने वही शेष दलितों के लिए क्या वे समुदाय को अपने नेता तैयार करने में मदद कर रहे हैं? वो अपनी जाति के इतिहास को संकलित करने में मदद कर रहे हैं तो उनके समुदाय के हीरो का पता लगा रहे हैं । वो उनके उत्सवों को जांच करके उन्हें मना रहे हैं, दलित बस्तियों के निकट चाचाओं का आयोजन कर रहे हैं और गैर यादव पिछडों की तरह ही इसमें भी उत्पीडन किए जाने का संदेश है । तुलनात्मक दृष्टि से वंचित किए जाने के एहसास को पढाया गया । देखो जाटों को क्या मिला? देखो तुम लोगों को क्या मिला? क्यों बसपा से चिपके हुए हो? नारायण को लगता है ये तो सिर्फ शुरुआत है और भाजपा ने अभी ऊपरी सतह को ही लेना है और दस के आस पास दलित जातियों में ही पैठ बनाई है । कल्पना कीजिए यदि धीरे धीरे वे दूसरों के साथ भी ऐसा ही करेंगे तो क्या होगा? वहाँ पूरी तरह से खालीपन है पर बीस के आंकडे निर्वाचन आयोग द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले मतदान केंद्र का विवरण के अभाव में जनसांख्यिकी का विवरण प्राप्त कर रहा हूँ । और ये पता लगाना संभव ही नहीं है कि किस जाति और समुदाय ने किसे वोट दिया है और गैर यादव पिछडों से इतर गैरजाटव दलित उत्तर प्रदेश में सभी समुदायों में सबसे अधिक चुप्पी साधने वाले हैं तो उनसे किसी भी तरह का साक्ष्य निकलवाना भी कठिन है । भाजपा दलितों के लिए सुरक्षित अधिकांश सीटों पर विजयी रही और अब तो ये भी सुरक्षित सीटों के लिए कोई पैमाना नहीं था क्योंकि सारे उम्मीदवार गलत है और ऐसी स्थिति में गैर गलत मत महत्वपूर्ण हो जाते हैं । लेकिन हम जो जानते हैं वो ये है भाजपा का दिल्ली में नीतिगत स्तर और चुनावों में जमीनी स्तर पर दलितों के बारे में ध्यान केंद्रित कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बाबा साहेब आंबेडकर की विरासत, परसो अम्बेडकर के जीवन से जुडे दिनों पर केंद्र सरकार के समारोह, उनके जीवन से जुडे पांच स्थानों को बढावा देने पर उसका जो सरकार के डिजिटल भुगतान ऐप का नाम भीम रखकर प्रधानमंत्री का अंबेडकर को समकालीन जीवंतता प्रदान करने का प्रयास और गलत उद्यमियों को प्रोत्साहन देना किसी राजनीतिक उपक्रम का हिस्सा है । विपक्ष को उम्मीद थी रोहित वेमुला की आत्महत्या और उन की घटना भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी । उसने अनेक अंबेडकरी कार्य करता हूँ, विषेशकर छात्रों को उत्तेजित नहीं किया परन्तु ये वे लोग थे जो किसी भी स्थिति में बढ सपा को ही वोट देते । ये सब अपेक्षाकृत वंचित दलितों को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का सहयोग करने से रोक नहीं सके । इसका तत्पर ये नहीं है कि वे पूरी तरह दूसरी और चले जाएंगे । नहीं, इसका मतलब ये है कि भाजपा का प्रतिरोध खत्म हो जाएगा । निश्चित ही भाजपा के सत्ता में आने के बाद सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच हुई झडप और इस वजह से कई हफ्ते तक तनाव व्याप्त रहने की घटना ने पार्टी के खिलाफ दलितों विषेशकर चाट क्यों कि संगठित होने की क्षमता को दर्शाया । परन्तु भाजपा की इतने बडे पैमाने पर जीतने ये संकेत तो दिया है देश के निर्धनतम राज्य के सबसे अधिक वंचित समुदायों और भारत के सर्वाधिक वंचितों में से एक वर्ग नहीं, उस पार्टी को वोट दिया, प्रभावशाली जातियों से जुडी हुई पार्टी रही है, इस समर्थन के प्रति आभार व्यक्त कर नहीं और इसके और अधिक बडे पैमाने पर एकजुट होने की उम्मीद में भाजपा ने देश के अगले राष्ट्रपति पद के लिए उत्तर प्रदेश के ही गैरजाट आ उतर रामनाथ कोविंद को नामक करने का फैसला किया । ये समझने के लिए की क्या नई भाजपा सबको एक साथ रखेगी और क्या उसका बहुजातीय प्रयोग सफल होगा? जरूरी है अतीत पर नजर डाली जाए । दो हजार सत्रह या दो हजार चौदह ऐसे पहले मौके नहीं थे । भाजपा ने इन जातियों को लिखाया था वन डर बिल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के तारीख हासिल नहीं भाजपा के सामाजिक आधार का दायरा बढाने के प्रयास पर एक बहुत ही शानदार पूछता हूँ डिलीट पार्टी ओवर वोटर्स हाउ सोशल सर्विसेज ॅ इंडिया लिखी है । उन्होंने सबसे का आकलन करने के लिए तीन बिंदुओं को रेखांकित किया । क्या अब जाते वक्त पार्टी के समर्थन का मुख्य आधार है? आपने हैं उस की आंतरिक संरचना, मतदाताओं के समर्थन का तरीका और नीतिगत रूपरेखा हिमाचल तरफ देते हैं । इन तीनों ही बिंदुओं पर भाजपा ने हमेशा अब जब से राजनीति के इन सभी बिंदुओं को प्रदर्शित किया है, लेकिन भाजपा ने उन्नीस सौ अस्सी के दशक के हम और उन्नीस सौ नब्बे के दशक के प्रारंभ में धीरे धीरे ये महसूस करना शुरू कर दिया था तो उसे दूसरे समुदायों का दिल जीतने के लिए और काम करना होगा । इस प्रयास को गति प्रदान करने वाले व्यक्ति एक समय सबसे अधिक ताकतवर पार्टी के महासचिव गोविंदाचार्य थे, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मतभेद की वजह से सितंबर दो हजार में पार्टी से बाहर होने के साथ ही सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया । बातचीत के दौरान ही गोविंदाचार्य पार्टी में आए बदलाव पर चर्चा करते हैं । हम ने उम्मीद सौ अस्सी के दशक के मध्य में महसूस किया कि यहाँ कुछ कुछ जाए है । उस समय दो बातें हुई थी मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण की घटना हुई थी । इसमें सैकडों दलितों ने इस्लाम धर्म कबूल किया था और फिर शाहबानों का फैसला आया । हिंदुओं की भावना आहत हुई । उन्होंने तर्क दिया कि उस समय अल्पसंख्यकवाद राजनीति का केंद्र बन गया । बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सक्रिय हुई । उन्होंने इस पॅाल में नमाज पढने की अनुमति मांगना शुरू कर दिया । सबने हिंदू की भावनाओं को आहत करने में योगदान दिया । ध्यान रखना भी जरूरी है कि हिन्दू भावना आहत होने के बाद स्वतः ही नहीं थी बल्कि भाजपा और विश्व हिंदू परिषद द्वारा सदियों से किए गए अन्याय की बात लोगों के दिमाग में बिठाने के लिए सदत किए गए प्रचार और संगठनात्मक कार्यों से हुआ । यही नहीं, ऐतिहासिक न्याय की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसके प्रतीक स्वरूप अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग की गई और फिर कुछ ही सालों के भीतर रामजन्मभूमि आंदोलन तेज हो गया । अब एक व्यापक हिंदुत्व की छाया थी और फिर इस और पिछडे समुदाय के लोग भी आकर्षित होने लगे । उन्होंने वापस लौटना शुरू कर दिया । कुर्मी और कोई भी जैसे समूह उम्मीद सौ साठ के दशक में भाजपा के पुराने अवतार भारतीय जनसंघ की और मुड गए थे । हम तो पार्टी उनका समर्थन बरकरार नहीं रख सकी । गोविंदाचार्य तर्क देते हैं, ये हिंदुत्व ही था जिसने सभी जातियों में हिन्दू एकता की रूपरेखा पेश की । ध्यान दीजिए । मोदी शाह करीब तीन दशक बाद यही करने का प्रयास कर रहे थे । बी पी सिंह की सरकार में उन्नीस सौ उन्यासी में समाजवादियों, मार्क्सवादियों के साथ भाजपा के गठबंधन ने इसमें मदद की । गोविंदाचार्य स्वीकार करते हैं । इसमें पिछडे समुदायों की नजर में हमारी स्वीकार्यता को बढा दिया था । पार्टी की एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है में समाजवादियों के साथ गठबंधन ने पार्टी को पहली बार सत्ता तक पहुंचाया । उन्नीस सौ सत्तर के दशक के मध्य में जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में हिस्सा लेने और जनता पार्टी में विलय ने पार्टी को सबसे पहली व्यापक स्वीकार्यता दिलाएंगे और उन्नीस सौ अस्सी के दशक के आखिर में उन समूहों के साथ राष्ट्रीय मोर्चा का हिस्सा बनी जिनका मध्यम जाती के कामगारों और पिछडी जातियों में जनाधार था । इसने इन समुदायों के बीच भाजपा का द्वार खोल दिया था परंतु एक समस्या नहीं है । विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब अन्य पिछडे वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया, भाजपा पशोपेश में पड गई । भाजपा इसका विरोध करते हुए नजर नहीं आ सकती थी । नहीं उसने इसे अंगीकार किया क्योंकि आशा करके उसे सवर्ण जातियों का समर्थन करवाना पडता है । वो मंडल को बेअसर करने के लिए एक बार फिर हिंदुत्व कार्ड मंदिर मुद्दे पर वापस गई और ऐसा करने के लिए उसने पिछले चेहरों का इस्तेमाल किया । एल के आडवाणी की रथयात्रा पूरे चरम पर थी परंतु क्षेत्रीय स्तर पर मैदान में इसके प्रमुख चेहरे कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार काम पर थे । ये मैं सहयोग नहीं था । तीनों ही पिछले समुदायों चाहते थे । सिंह और भारतीय लोग और कटियार कुर्मी थे कि भाजपा के विस्तार का स्वर्णकाल था । इस दौर के बारे में बिहार से भाजपा के एक वरिष्ठ नेता हूँ और अब एक प्रभावशाली केन्द्रीय मंत्री ने दो हजार चौदह के चुनावों की तैयारी के दौरान मुझे कहा था । हिंदुत्व सबसे अधिक सफल उस समय होता है जब उसका चेहरा अन्य पिछले वर्ष होता है । उन्नीस सौ नब्बे के दशक पर गौर कीजिए । गोविंदाचार्य ने इस बदलाव को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इसे सोशल इंजीनियरिंग के नाम से जाना गया परंतु वो जोर देते हुए कहते हैं, ये इस अनुमान के लिए उपयुक्त शब्द नहीं है । इस समुदायों को प्रक्रम तरीके से संख्यक किया जा सकता है परन्तु शब्दावली से इतर सही मायने में जनाधार के अनुसार का प्रस्ताव था और इस प्रक्रिया नहीं । गोविंदाचार्य ने भाजपा के लिए अपने चर्चित सलाह के अंदाज में कहा, आवश्यकता चार चरित्र और चेहरा बदलने की है । इसका तात्पर्य क्या है? जब मैंने चान के बारे में कहा तो मेरा साथ कर रहे हैं । हमारी शैली बदलने की आवश्यकता से पहले हम अपनी सारी सभाएं शाम को करते थे । बनिया समाज के लोग उस समय तक स्थानीय बाजार में अपना काम खत्म कर लेते थे और वहाँ आने के लिए उनके पास पर्याप्त समय था । मैंने तर्क दिया, यदि हम चाहते हैं कि हमारी सभाओं में ग्रामीण इलाकों के भी लोग आए तो हमें ये जनसभाएं दिन में आयोजित करनी होंगी और जब विभिन्न जातियों के लोग ग्रामीण इलाकों से इन सभाओं में आए तो उनके लिए महत्वपूर्ण था की उन्होंने एक चेहरा ऐसा देखा । इसे वो पहचान सकते थे और जो उनके अपने समुदाय से आए लोगों में था । महत्वपूर्ण ये था की विभिन्न जातियों के लोगों ने मंच पर अपने परिचित चेहरों को देखा । उन्हें भाषण देते हुए देखा । उन्होंने देखा कि उन्हें सम्मान दिया जा रहा है । यही वो कदम था । लोग महसूस कर सकें कि वे इसका हिस्सा है । यादवों के मामलों में शहरों के महत्व को देखा जा सकता है । हिंदुत्व कार्यक्रम के साथ उन्हें पहचाना जा सकता है । निश्चित यादव बिहार के भागलपुर दंगों सहित अनेक मौकों पर मुस्लिम समुदाय से टकराव होने पर अवसर ही सबसे आगे थे । दो चार याद करते हैं कि समुदाय के लोग उनके पास आए थे । उन्होंने कहा कि गौरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है । जब हमने मथुरा को मंदिर आंदोलन में छोडा था तो उन्हें आभास हुआ कि हम अपने एजेंडे में भगवान कृष्ण जिन्होंने अपने वंश का मानते हैं वो भी इसमें स्थान दे रहे हैं । शुद्ध शाकाहारी थे लेकिन उनके पास उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद सरीके नेता थे और इसीलिए इस मुद्दे पर उनका भावनात्मक लगा । पार्टी के प्रति उनके राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं हुआ । भारतीय जनता पार्टी समुदाय में अपनी जगह बनाने में असफल थी क्योंकि पूछ पद के चेहरे पेश नहीं कर सके लेकिन असर किया था । हिन्दू जाति व्यवस्था का शिकार होने के बावजूद पिछडे समुदाय हिंदू राजनीतिक वाले की और आकर्षित हुए हैं । गोविंदाचार्य ने दो बातों का उल्लेख किया अल्पसंख्यकवादी जिसने हिन्दुओं को एकजुट किया और प्रतिनिधित्व लौटकर हम फिर चेहरे की उपस्थिति पर आ गई । मैं हमेशा सजग थे । उनका सहयोग मुख्य रूप से प्रतिनिधित्व पर आधारित है । पार्टी के चरित्र में बदलाव लाना आसान नहीं था और बहुजातीय गठबंधन तैयार करना भी आसान नहीं था । मंडल ने बहुत तेजी से समाज और संगठनों का जातीय आधार पर ध्रुवीकरण कर दिया था । सवर्ण जातियों में अपेक्षाकृत अपने अवसरों को गंवाने को लेकर असंतोष ऍम पिछडी जातियों का सशक्तिकरण हुआ था और से लेकर सवर्ण जातियों में व्याप्त असंतोष को उन्होंने अपने अधिकारों से उन्हें वंचित करने की चाल के रूप में लिया । संघ और भाजपा हूँ दोनों में ही ये विरोधाभास उभर कर सामने आया । हाँ, चल लिखते हैं भाजपा ने विशुद्ध चुनावी बाध्यताओं की वजह से काफी लंबे समय के संशय के बाद बहुत ही अनिच्छा के साथ अन्य पिछडे वर्गों को आरक्षण का लाभ देना स्वीकार किया । जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा इसलिए भी पार्टी को लेकर परेशान था क्योंकि ये उसे दूसरे तमाम दलों से अलग कर रहा था । और उसके विरोधी इसे आसानी से आपने अभिजात्य आधार हो वो प्राथमिकता देने वाले हिंदू राष्ट्रवाद के एक और उदाहरण के रूप में पेश कर रहे थे । अंततः भाजपा ने जब अन्य पिछडे वर्गों के लिए आरक्षण को सशर्त समर्थन देने का फैसला किया तो ये उसके लिए अपनी भ्रमण बनिया की छवि से निकलने के लिए बहुत ही कम और बहुत देर से लिया गया निर्णय था । यहाँ तक कि हिंदू कार्ड भी पर्याप्त नहीं था । अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के तुरंत बाद उन्नीस सौ तिरानवे में हुए चुनावों में भी भाजपा उत्तर प्रदेश में अकेले बहुमत हासिल करने में असमर्थ रही । उस की बजाय पिछडे और दलितों का प्रतिनिधित्व कर रही सपा और बसपा ने हाथ मिलाकर गठबंधन बना लिया । आपने संधि भाजपा ने सवर्ण जातियों का समर्थन हासिल कर लिया था परन्तु ये निचली जातियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं था जो अपने नेताओं और दलों के साथ सशक्तिकरण का एहसास महसूस कर रहे थे । गोविंदाचार्य को भी विवादों की वजह से उन्नीस सौ तिरानवे में तमिलनाडु भेज दिया गया था । वो जब दिल्ली से जा रहे थे तो पार्टी के अन्य पिछडे वर्ग और दल समाज के कई सदस्य उनके पास आए और कहा आप जा रहे हैं माना क्या होगा गहरे सामने रंग के गोविंदाचार्य लगभग पच्चीस साल बाद कहते हैं उन्होंने महसूस किया कि मैं उनके अपने समुदाय का है शायद मेरे रंग रूप को देखकर । लेकिन भाजपा भी ये जानती थी कि यदि उसने विस्तार नहीं किया तो उसका विकास नहीं होगा क्रिस्टो फॅालो इसे भाजपा की अनिच्छा और अप्रत्यक्ष मंडलीकरण का दौर कहते हैं इसने गठबंधन का रास्ता चुनाव उदाहरण के लिए बिहार में समता पार्टी उन्नीस सौ नवासी से उम्मीद सौ अठारह के दौरान हिंदी क्षेत्र से अन्य पिछडे वर्ग के सांसदों में पार्टी की भागीदारी सोलह से बढकर बीस प्रतिशत हो गई थी जबकि सवर्ण जाति के सांसदों का अनुपात दशमलव तीन प्रतिशत से घटकर बयालीस दशमलव चार प्रतिशत रह गया था । अकेले उत्तर प्रदेश में ही अन्य पिछडे वर्ग के विधायको में उसकी हिस्सेदारी विश्व कराने में उन्नीस सौ छियानवे में अठारह प्रतिशत से बढकर बाईस प्रतिशत हो गई । नहीं हासिल भाजपा के सामाजिक आधार के विस्तार में सहयोग करने वाले एक और तरीके की और इशारा करते हैं । पार्टी के अपने मूल आधार के हितों को नुकसान पहुंचाए बगैर ही चुनावी सफलता के लिए जरूरी थी । मेरा मुख्य तर्क ये है कि राजनीति से प्रेरित भाजपा से संबद्ध संगठनों द्वारा निजी स्तर पर जनता की भलाई के लिए किए गए कार्य गरीब जनता के बीच अप्रत्याशित रूप से सफल साबित हुए हैं । दूसरे शब्दों में संघ के संगठनों के शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराने जैसे कल्याणकारी कार्यों ने भाजपा को चुनावी लाभ प्राप्त करने में मदद की । हासिल का शोध मुख्य रूप से दलितों और आदिवासियों के इर्द गिर्द केंद्रित था । महम तो सामाजिक विस्तार के लिए पार्टी द्वारा अपनाई गई रणनीति के बारे में एक महत्वपूर्ण जानकारी है । हालांकि राजनीतिक विरोधाभास अभी भी बरकरार थे हैं । उत्तर प्रदेश में सवर्ण जाति और गैर यादव पिछडों के गठबंधन में उन्नीस सौ नब्बे के दौरान ही दरार चौडी हो गई थी । भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी नहीं गोविंदाचार्य पर सीधा हमला बोलते हुए कहा था, मेरी पार्टी को अपना चरित्र विचार बदलने हैं । इसका मतलब है पार्टी इस लायक नहीं है । उन्होंने ये भी कहा, सामाजिक समरसता के नाम पर कौन सा सामाजिक न्याय लाया गया है कि शायद महज एक सहयोग नहीं था कि वह भ्रमण थे । अटल बिहारी वाजपेयी भी कल्याण सिंह के साथ सहित नहीं थे । इसमें कोई संदेह नहीं कि वाजपेयी अखिल भारतीय स्तर के नेता थे जिन्होंने समुदायों और क्षेत्रों को आगे बढाया । परमप्रिय ध्यान रखना जरूरी है कि वे रावण थे और उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में उनका दखल था । उत्तर प्रदेश भाजपा में उनके समर्थकों राजनाथ सिंह, फूलराज मिश्र और लाल जी टंडन ने कल्याण सिंह, जिन्होंने विवादों के उनके इस मामले में मदद नहीं की, के खिलाफ राजनीतिक माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी । परमप्रिय सिर्फ व्यक्तित्वों का मामला नहीं था । एक साधारण बात ये थी कि भाजपा का सवर्ण जाति का आधार एक पिछडे नेता के नेतृत्व की और झुकने को पूरी तरह तैयार नहीं था । गोविंदाचार्य बताते हैं तो फिर से एकजुट होने लगी थी । पहला उपयुक्त अवसर मिलते ही किसी ने भी कल्याण सिंह को हटाने में संकोच नहीं किया । सिंह को उनके उत्तराधिकारी चुनने की जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने राम प्रकाश गुप्ता जैसे एक गैर राजनीतिक व्यक्ति को चुनाव । लेकिन ये भी गुप्ता को किनारे लगाए जाने से पहले सिर्फ कुछ समय की ही बात थी और फिर राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री पद ग्रहण कर दिया । इस तरह भाजपा के पास एक बार फिर समन जाति का वर्चस्व हो गया । पार्टी अध्यक्ष के पद पर कलराज मिश्रा एक भ्रमण और राजनाथ सिंह ठाकुर थे । अन्य पिछडे वर्गों ने अपमानित महसूस किया और वो पार्टी से दूर चले गए । सपा और बसपा के बीच इस मुद्दे पर सात झूलते रहे । उन में से कौन सी पार्टी उन्हें प्रतिनिधित्व देने की पेशकश करती है । भाजपा ने दो हजार में ये राज्य गवा दिया और दो हजार चार के लोकसभा चुनाव में भी उसका बहुत खराब प्रदर्शन रहा और एक बार जब उन्होंने ये पाया कि वह जीतने वाला घोडा नहीं है तो उन्होंने भी विकल्प तलाशना शुरू कर दिया । हार का ये सिलसिला दो हजार, सात, दो हजार नौ और दो हजार बारह में भी जारी रहा । भाजपा का सामाजिक गठबंधन चरमरा गया था और सभी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के बाद और अपने हाथ में लेंगे । उन्होंने सामाजिक विस्तार के लिए जोरदार प्रयास किए । उन्होंने सवर्ण जाति के नेताओं को किनारे किया और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जिससे वे विद्रोह नहीं करेंगे । उन्होंने संगठन की संरचना में बदलाव शुरू कर दिया । उन्होंने कम प्रभाव वाले समुदायों को प्रतिनिधित्व और सम्मान दिया । उन्होंने अधिक प्रभाव वाले अन्य पिछडे वर्ग और दलित समूहों के खिलाफ उन लोगों के बीच पनप रहे असंतोष पर काबू पाया तो सोच रहे थे कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया है । उन्होंने बडी संख्या में अन्य पिछडे वर्ग के लोगों को पार्टी का टिकट दिया और भाजपा को हिंदू एकता को लेकर सभी जातियों में पहले से कहीं अधिक सफलता प्राप्त करने में मदद की । क्या वे अपने पुराने और नए समर्थकों को साथ लेकर चलने में सफल होंगे? निश्चित ही संतुलन बनाये रखना कठिन होगा । फिलहाल असली सत्ता और पदों के मामले में भाजपा ये सावधानी बरत रही है । अपने पुराने समर्थक पैरी नहीं बने । उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल में सवर्ण जातियों के प्रतिनिधित्व की अधिक संख्या यही दर्शाती है । पार्टी के मूल आधार को हराया नहीं गया है । योगी आदित्यनाथ स्वयं ठाकुर है, उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा रावण है प्रदेश अध्यक्ष जो खुद मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद लगाए थे वो भी उपमुख्यमंत्री बनाकर पिछडों को संकेत देने के साथ उनकी भूमिका का सम्मान किया गया है । योगी आदित्यनाथ के पद ग्रहण करने के कुछ महीनों के भीतर ही लखनऊ में ये चर्चा थी कि भाजपा की इस जीत ने किसी तरह से प्रदेश में ठाकुर राजा गया है । वे विरोधाभास, शासन और प्रशासन में नजर आएंगे । भाजपा का भविष्य सी होगा कि वह इससे किस तरह निपटती है । लेकिन अभी तो उत्तर प्रदेश ने अमित शाह की समाज को समझने, विरोधाभाषों की पहचान करने और इनका दोहन करने की उल्लेखनीय क्षमता दिखाई है । इसने भाजपा को अपने ही गढ में सिर्फ प्रभुत्वशाली सामाजिक समूहों के पार्टी से काम ताकतवार और अधिक प्रभावशाली राजनीतिक जातियों के खिलाफ संघर्षरत पार्टी में परिवर्तित होने के प्रयासों को भी रेखांकित किया है । भाजपा आज चुनाव जीती है तो नई भाजपा की वजह से क्योंकि एक समावेशी हिंदू पार्टी है, नई भाजपा कितनी दूर तक चलेगी, ये इसके पित्र संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ उसके रिश्तों पर निर्भर करेगा ।

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Kaise Jitati Hai Bhajpa writer: प्रशांत झा Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Prashant Jha
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