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काला पहाड़ -01

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सुलतान कारनानी की सेना का सूबेदार कालाचंद राय धर्मनिष्‍ठ ब्राह्मण था। सुलतान की बेटी दुलारी ने उस पर मुग्‍ध होकर विवाह करने का फैसला लिया, लेकिन धर्म के खातिर उस ने यह प्रस्‍ताव ठुकरा दिया। लेकिन समय बदला और उसने दुलारी का हाथ थाम लिया। फिर शुरू हुई धर्मांध ब्राह्म्‍णों की कुटिलता की कहानी- इंसान को हैवान बनाने का सफर। जाने वह पहले कालाचंद राय से मोहम्‍मद फर्मूली बना और फिर बना काला पहाड़ कैसे बना?
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आप सुन रहे हैं कोई ऍम किताब का नाम है काला पहाड से लिखा है कि थोडा और किंग आरजे आशीष चैन की आवाज में हुआ है सर एक चुंबन चाहे फॅालोइंग जिले में हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में महानदी रहूँ । पहाड से निकलने वाली महानंदा नदी धीरे धीरे अटक अटक कर दक्षिण दिशा की और बढती है । ये दो राज्यों की सीमा बनाती थी । इनमें से पहला राज्य पौंडों का देश पौंडों वर्धन था । इसकी राजधानी थी महान स्थान । दूसरा देश पूछ या राजवंशियों का था जिसकी राजधानी थी पूछ गया सिलीगुडी से थोडा उपर पहाडी की तलहटी के पास नदी जलपाईगुडी को छुट्टी है और इसमें नई बाल आसान नदी मिल जाती है । यहां पहुंचकर महानंदा का स्वरूप बदलने लगता है और ये चौडे घुमावदार और कठिन मार्ग से पूर्णियां और पिता लाया पहुंचती है । यहाँ मुख्य सहायक नदियां इससे मिलती है । ये मुख्य सहायक नदियां हैं डाॅ । पिता हूँ, नागर मेची और कान काई । अब ये खाये पीए मोटे असगर का सार हूँ ले लेती है और बयान अगर जान और खतरनाक लहरों के साथ रहती है । इसके तक बाद किशनगंज और बारसोई का उद्भव हुआ और एक मुख्य व्यापारिक केंद्र बन गए । इसके बाद ये मालदा जिले से गुजरती हुई दक्षिणपूर्व की और रहती है । यहाँ इस जिले को दो बराबर हिस्सों में विभाजित कर दी है । यहाँ इससे तांग गान, पूर्णिमा और कालिंदी के बडे भाग मिलते हैं । फिर ये दीनाजपुर के अधिकांश भाग से होकर बहती है । अपने उद्गम से दो सौ छप्पन मील की यात्रा करने के बाद महानंदा अंत में गौर नामक स्थान पर गंगा से नहीं जाती है । गौड का निर्माण बारवी सभी में राजा लक्ष्मण सेन ने किया और उसका नाम अपने नाम पर लखनऊ की रखा । क्या मुख्य रूप से गुड बनाया जाता था इसलिए इसे गौड के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई और वो कभी लखनऊ की नहीं कहा गया । बख्तियार खिलजी नामक एक अफगान आक्रमणकारी ने लक्ष्मण सैन को पराजित किया और अपनी राजधानी नादिया से गौड ले गया । तेहरा सौ पचास ये भी नहीं है । एक दूसरे आक्रमणकारी शमशुद्दीन फॅसने राजधानी को फिर बदल दिया और ये राजधानी को पांडवा ले गया । सत्रह साल बाद जलालुद्दीन राजधानी को मार से रिकॉर्ड वापस ले आया । जिन मुसलमान सब सिखों ने बंगाल पर विजय प्राप्त की उनकी एक सडक राजधानी बदलना भी था । जाॅन कारा रानी ने बंगाल को जीता तब उसे गौड की प्रसिद्धि नहीं भाई कारार नी पठान था । वो काबुल के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करके अपना रास्ता बनाते हुए बंगालके नादानों तक पहुंचा था । उसने सुल्तान हुसैन शाह को पराजित किया और अपना ही असर बंगाल में स्थापित किया, लेकिन उसे कौन पसंद नहीं आया । गौर से दक्षिण पूर्व में कुछ मिल तो महानंदा के तट पर एक छोटा सा गांव टांडा उसी स्थान बेहद पसंद था । उसने गांव को उजाड दिया और वहाँ अपनी पसंद और सुविधा के मुताबिक एक नगर बसाया और नगर को नया नाम देना चाहता था, लेकिन उसे टांडा नाम अच्छा लगा । इसीलिए उसके शहर का नाम नहीं बदला । उसने मस्जिदों, बाजारों और आपने सरदारों के लिए महलों का निर्माण करवाया । पहुंच वर्षों के भीतर ही श्रीनगर एक महान राजधानी बन गया और यहाँ जीवन गूंजने लगा । सुल्तान सलमान एक योद्धा और धर्मांध लगती था । वो योग, मुसलमानी राहत तथा धर्म परिवर्तन का योग था । हूँ । सुल्तान सलमान ने भी अपने तरीके से अपनी सामर्थ्य भर जागीरें प्रदान यू तो उसके मंदिरों को अपवित्र नहीं किया, लेकिन मंदिरों में पूजा पाठ को उसने कठिन अवश्य बना दिया हूँ । सुल्तान कठोर हो सकता हूँ और उसके क्रूर पंजों में उसका साम्राज्य सक रहा था । उसने अपने हरम में जवान और भर रखी थी । इनमें से कुछ से उन्होंने कहा कर लिया और कुछ से उसने निकाला नहीं किया । लेकिन इस सभी योग दिया उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे । उसके पास प्यार करने या प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने के लिए वक्त नहीं था । हरम में रहने वाली और तो मेरे से उसकी कृपादृष्टि जकिया बेगम पडते हैं । जकिया बेगम में कैसे सरकार की बेटी थी जिसने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया था । जाॅन सुंदर स्त्री नहीं । उसका स्वभाव भी बहुत मन था । अपने पति को प्यार करती थी और उसकी पाउँगा को अपने कोमल स्वभाव से तुष्ट करती थी । ऐसे ही होना चार से वो विशेष थकान महसूस करती थी, लेकिन उस नहीं उसको बेकार नहीं जाने दिया और उसके पैर भारी हो गए । दुलारी की जान के बाद सुलेमान करानी में थोडा परिवर्तन आरंभ । उसकी तरफ अनंतता कम होने लगे और उन लोगों के प्रवीन अधिक सहनशील होने लगा जो इस्लाम के अनुयायी नहीं नहीं । यहाँ तक कि उसने अपनी सेना में हिन्दुओं को भर्ती करना भी शुरू कर दिया । और भी दो वर्षों के दौरान कार आर्मी के दो पुत्र हुए । इनके नाम थे वाइॅन् दाऊद खान । सलमान के पारिवारिक जीवन में सुख शांति थी, लेकिन बाहरी दुनिया से वह संतुष्ट नहीं था । बहुत महत्वाकांक्षी था । उसके लिए बंगाल काफी नहीं था । उसने अपनी नानक भरी निगाहें दक्षिण की और कमाई और उत्तर यानी ऍम उसने उत्कल पर चढाई कर नहीं । लेकिन उत्कल के राजा मुकुल राव ने उसके आक्रमण को और सफल कर दिया और उसे टांडा की और वापस भगा दिया । सुलगवान तुम तबाह कर वापस टांडा पहुंचा । वो अपनी हार के विषय में सोच विचार करता रहा और फिर से आक्रमण करने की प्रतीक्षा करने लगा । महानंदा ने सुल्तान के भाग्य के कई उतार चढाव देखें । वह गडगडाती रही जिसे मूड व्यक्तियों के क्रियाकलापों पर हस रही हूँ । दुलारी नदी के किनारे बढ रही थी । उसका महल नदी किनारे बना था और ऊपर बने अपने कमरे से वो नदी के पानी को तीस होती रहती थी । बचपन नहीं वो भाई बंदा के तट पर ही खेलती थी । जैसे जैसे उत्तर उन्हीं होने लगी, उसके सीने पर कुमार आने लगे तो शाम को शाही बजरे में शहर करते हैं । जब सत्रह साल की हुई तब वो अपने कमरे की जालीदार खिडकियों से नदी को देखा करती थी और उसके विषय में अजीबो गरीब कल्पनाएं करती । उसे इस बात का ऐसा ही नहीं हो पाया की कब उन नदी का एक अंग बन गई और कब नहीं उसका अन बन गई यू उसका बचपन कभी दुखी नहीं रहा लेकिन वो एक एक आपकी बच्ची थी । ये भी सच है कि वो अपने बाप की चहेती दें । सुलेमा उसे बहुत प्यार करता था । उसके बाद में भी उसकी आती बिगाड दी थी । इन सब के बावजूद भी वो एक आपकी बच्ची थी और उसको जब एकाकीपन असहनीय हो जाता था तो वो नदी से बातें करने लगती थी । यू नदी खडखडाहट के अलावा भी आवास नहीं करती थी लेकिन वो अनजान आवाजें सुनती और उसे अपने अंदर और संसार में शांति का अनुभव होता था । ये देना उत्तर नेस्तर बदूरिया राज्य से चमकीली आंखों वाला खूबसूरत पलवान बोया ब्राहमण युवक टांडा आया । इस वक्त का नाम नयन चन्द्राय बहादुरी था । उस तूफान की सेना में भर्ती हुआ और अपनी बहादुरी और अन्य कामों से सेना का फौजदार बन गया । उसके साथ उसकी पत्नी वंदना देवी और उनका पुत्र कालाचंद राय भी टांडा आए । इन सत्रह सालों के दौरान महानंदा ने बहुत से परिवर्तन देखिए । सलमान कार्निक काफी मोटा हो गया था और उसका फौजिदा मैन चन्द्राय बहादुरी की मृत्यु हो गई थी । उसकी जगह उसका उत्तर काला चन्द्राय सोमपान की सेना में एक सिपाही की तरह भर्ती हुआ और अपने पिता ही की भांति निरंतर तरक्की करता चला गया । ऍम चन्द्राय की मृत्यु हुई है तब उसकी विधवा उसके साथ सती होना चाहती थी । लेकिन उसके पिता जान इंद्रनाथ बहादुरी ने उसे स्वति नहीं होने दिया । उसके पिता ने कहा तुम्हें अपने पुत्र कालाचंद के लिए जिन्दा रहना है । विवश होकर परिस्थितियों को देखते हुए उसके पिता की इच्छा मानने वो सब शहर थे और भगवान शिव के भक्त । लेकिन बीच में ही ज्ञानेंद्र तो वैष्णव हो गए और भगवान विष्णु की पूजा करने लगे । ज्ञानेंद्र नाथ ने कालाचंद को भी किसी नए संप्रदाय में प्रशिक्षित करने का जिम्मा लिया । कालाचंद की शिक्षा ब्राह्मणवादी साधना में हुई है । उसने वेद पुराणों का अध्ययन किया । हमने में शास्त्रार्थ में हिस्सा लिया और पूजा तथा बलिदानों का आयोजन किया । यूँ तो उसकी आयु कम थी लेकिन वो एक विद्वान व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हो गया । उसके सहधर्मी कहाँ करते? उसके युवा शरीर में वृद्ध और क्या नहीं मस्तिष्क है । जब कालाचंद सोलह वर्ष का हुआ तब ज्ञानेंद्र नाथ ने निश्चय किया कि अब लडकी की शादी करने का समय आ गया है । आपको बता दिया गया वहाँ उसने अपने पुराने नेत्र राधा मोहन लाहडी से भेंट की । लकडी की दो विवाहयोग्य पुत्रियां और उसे लडकियों के लिए उचित वार नहीं मिल रहा था । इन दोनों बहनों की शादी उसके काला जम से करने का निर्णय लिया । काला चम ऐसे बेहूदा प्रस्ताव का भी विरोध करने की बात नहीं सोच सकता था क्योंकि वो अपने नाना की हर आज्ञा का पालन करता हूँ है । जिस उम्र में अधिकांश लोग संसार में अपने लिए स्थान बनाने की चेष्टा करते हैं उस आयु में कालाचंद की शादी रूपाली और रुपानी के साथ हो गई । कालाचंद दो वर्ष तक भदोरिया में रहा हूँ और अपने ससुर के पास दत्त का आनंद उठाया । पुल लंबा छरहरा और ऍम होता था । उसकी आंखें लडकियों की तरह बडी बडी और काली नहीं उसके हो धनुष की तरह नहीं । उसका पूरा था सिर पर गर्दन तक लंबे लंबे बाल दुनिया के लोग काला चली से बॉस नहीं करते थे । अठारह वर्ष की आयु में उसने निश्चित किया उसके लिए केवल एक ही है और अच्छा है सेना में भर्ती होना । हर कोई चाहता था कि काला जम पुरोहित बनेंगे लेकिन उसे बलिदानों, यज्ञो और अनंत शास्त्रार्थ में कोई दिलचस्पी नहीं तो युद्ध पसंद करता था और उसे इसमें बेहद बजाता था । उसने टांडा की यात्रा के कारार नहीं उसके पिता का आदर किया करता था । इसलिए उसने कालाचंद को अपनी फौज में ले लिया । तेईस वर्ष की आयु में वो पिता की ही भर्ती सेना का फौजदार बन गया । कालाचंद के फौज में भर्ती हो जाने की वजह से उसका परिवार परेशानी का अनुभव करता हूँ, लेकिन जब साधारण सिपाही से फोर हजार हो गया तो उसका परिवार प्रसन्न हो गया । राधा मोहन लाहडी ने अपनी दोनों पुत्रियों को टांडा भेज दिया ताकि वो अपने पति की सेवा कर सके । उनके साथ इंदूबाला देवी भी आई । इंदूबाला देवी कालाचंद की माँ की चाची थी वो अधेड उम्र की शालीन और सदा मुस्कराते रहने वाली महिला नहीं काला जब भी अपने जीवन से प्रश्न जिन वर्षों में सुलेमान कार आर्मी ने टांडा नगर का निर्माण क्या हिंदुओं ने भी महानंदा के तट पर एक घाट का निर्माण करवाया? हर सुबह हिंदुस् घाट पर स्नान करने आते नहीं । दुलारी हर सुबह इस दृश्य को देखा करती थी । ऍम वास्तव में विचित्र जीव थे । ये लोग अपने स्नान और पूजा के विषय में बहुत अधिक तुनक मिजाज होते थे और जाती तथा छुआछूत के विषय में इनकी धारणाएं अनोखी ही होती थी । कभी कभी वो भ्रमरों के कुछ पांच रनों से कौन हो जाती थी । लेकिन इन सब चीजों से राय उसका मनोरंजन ही होता है । वो सोचा करती है कि इनके देवता असम के हैं जो छोटे छोटे मंदिरों की मूर्तियों में रहते हैं । जिनका निर्माण इन लोगों ने किया है उसी की बात में चित्र लगती थी उसके पिता नहीं क्योंकि एक्टर मुसलमान था । इन मंदिरों का निर्माण होने दिया लेकिन थोडा भी जानती थी उसका पिता एक भला व्यक्ति है । वो हिंदुओं की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता हूँ । धीरे धीरे दुलारी का ये मनोरंजन दिलचस्पी में बदल गया । अब मुझे जानना चाहती थी कि ये ब्राहमण इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हैं । उसने पंडितों को अपने पास बनवाया है और उनसे उनकी जाति प्रधान के विषय में बातचीत की और उनके उद्देश्यों को चुना । उसी की जान कर आश्चर्य हुआ कि ये ब्राहमण भी उतना ही दरबान है जितने की मुसलमान । धर्मान्धता के योग में भी वो अन्य धर्मों को सहिष्णुता की दृष्टि से देखती थी । उसे ये जानकर क्रोध आ गया कि पंडितों ने उसके महल में आने के बाद अपना शुद्धिकरण किया क्योंकि वो एक मुसलमान के घर में आकर उससे बातचीत करके अशुद्ध हो गए । लेकिन उसका क्रोध शीघ्र ही समाप्त हो गया । उसकी माँ को ये सब पसंद नहीं था । उसके माँ ने कहा तुलाडीह तो मुसीबत में पड जाएगी तो मैं उनसे कैसी का है? अरे यही अम्मीजान की हम सब मनुष्य हैं और एक साथ आचरन करेंगे । चाहे हम हिंदू हूँ, क्या मुसलमान तुम्हारे पास जाने से पसंद नहीं करेंगे? अभी जा अब बावजूद कोई के सब मालूम है और फिर इसमें बुराई भी क्या है? आपकी अब अभी तो हिन्दू थे जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया था । मेरे विचार से ये सब बेकार की बातें हैं । तुम्हारी अपनी जा इसमें डर की कोई बात नहीं है । आप जानती हैं हिंदू माँ भी अपनी संतान को उसी तरह प्यार करती हैं जिससे आप मुझे मातृत्व दो सारे संसार का धर्म है । माँ ने अपना सिर अविश्वास और वैसे हिला सुरारी ऐसी बातें सोचना खतरनाक है । तुम इन बातों पर मुझसे बहस मत करो, उसकी दासियाँ उसके चारों तरफ इकट्ठी हो गई हैं । आपकी दासियाँ बातूनी, खूबसूरत और जिंदादिल थी और इनमें से उसका नाम थे गुलशन । रबिया पर भी कुदसिया बुनने, रिहाना और न जाने कितनी कौशल ने कहा शहजादी हमें आपके बारे भी डर है । अब बहुत अजीबो गरीब बातें करती है । दुलारी धीरे समझ करा दें उसके हर बात का जवाब हमेशा ऐसी मुस्कान ही होती थी । अपनी जालीदार खिडकी से बाहर देखते ही उसे ब्रामण स्नान करते दिखाई पडेगी और वही समझ गई । ये लोग इतनी देर तक स्थान क्यों करते हैं? सूरज पर पानी क्यों चढाते हैं? पद्मासन लगाकर देवताओं का ध्यान क्यों करते हैं? फिर इकाई वो सीधी बैठ गए और उसके चेहरे पर एक न काफी चढ गई । काला चन्द्राय बहादुरी शाही अंदाज से चलते हुए घाट पर आया । वो भी भ्रामरों की सामान्य वेशभूषा में था । उसने एक सफेद धोती पहन रखी थी । उसका उपविभाग नंदा था और कंधे पर जनेऊ पडा हुआ था । उसके शरीर की पेशियां भी वैसे ही गतिमान थी जैसे कि महानंदा की लहरें उसके बाद उसके कंधों पर लटक रहे थे । उसके ऊपर बडी बडी मुझे और वो शाम और पवित्र लग रहा था और उसकी आंखों में सपने कह रहे थे । वो शक्ति खिडकी से देख रही हूँ । उसने अब तक तट पर जितने भी पुरुष देखे थे, उनमें सबसे अधिक सुंदर काला चल नहीं था । दूसरा खुल रही थी और से बेचैनी हो रही थी । उसके हाथ काम रहे थे । हो चुका ना और बदन में छह चोरी से उठने लगी । ऍम क्यों क्या हो रहा है कोई बीस दस की दूरी पर लगभग दस सैनिक खडे थे । वो पूजा में व्यस्त कालाचंद को आदर के साथ देख रहे थे । जब उसने पूजा पूरी कर ली और वह वापस लौटने लगा तो सैनिक उसके पीछे पीछे चलने लगे । उसकी आंखों से ओझल हो जाए इसीलिए दुलारी में एक बार भी बदल नहीं झपकाई । जब कालाचंद आंखों से ओझल हो गया तो तुम्हारी ठक्कर बेहोश हो । कालाचंद को देखने से चोट हो हुआ था । वो समाप्त हो गया और वो कमजोरी का अनुभव करने लगी थी । कौन है, कहाँ से आया है, कहाँ रहता है, क्या करता है? सैनिक उसके पीछे पीछे आदर के साथ यू चलते हैं । ऐसे अनेको प्रश्न के मन में उठ रहे थे । उसके मन में घबराहट हो रही थी । उस आश्चर्य हो रहा था कि उसे ऐसा क्यों हो रहा है । उसने फिर खिडकी से बाहर झांका पर वहाँ कोई नहीं था । उसे निराशा और दुख हुआ । अगले दिन खिडकी के पास बैठकर वो उसके आने की प्रतीक्षा करने लगे हैं और वो आया नहीं । उसके बाद हर बार जब वो आता तो उसकी दशा ऐसी ही हो जाती है । अब उसे हो, उस देखना उसके लिए अनिवार्य सा हो गया था ।

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सुलतान कारनानी की सेना का सूबेदार कालाचंद राय धर्मनिष्‍ठ ब्राह्मण था। सुलतान की बेटी दुलारी ने उस पर मुग्‍ध होकर विवाह करने का फैसला लिया, लेकिन धर्म के खातिर उस ने यह प्रस्‍ताव ठुकरा दिया। लेकिन समय बदला और उसने दुलारी का हाथ थाम लिया। फिर शुरू हुई धर्मांध ब्राह्म्‍णों की कुटिलता की कहानी- इंसान को हैवान बनाने का सफर। जाने वह पहले कालाचंद राय से मोहम्‍मद फर्मूली बना और फिर बना काला पहाड़ कैसे बना?
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