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8. स्त्री : वास्तविक इंदिरा गांधी की खोज

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इंदिरा गांधी को बड़े प्यार से लोग दुर्गा के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने भारत को सदियों में पहली बार निर्णायक जीत हासिल कराई और धौंस दिखाने वाली अमेरिकी सत्ता के आगे साहस के साथ अड़ी रहीं। वहीं, उन्हें एक खौफनाक तानाशाह के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने आपातकाल थोपा और अपनी पार्टी से लेकर अदालतों तक, संस्थानों को कमजोर किया। कई उन्हें आज के लोकतंत्र में मौजूद समस्याओं का स्रोत भी मानते हैं। उन्हें किसी भी विचार से देखें, नेताओं के लिए वे एक मजबूत राजनेता की परिभाषा के रूप में सामने आती हैं। अपनी इस संवेदनशील जीवनी में पत्रकार सागरिका घोष ने न सिर्फ एक लौह महिला और एक राजनेता की जिंदगी को सामने रखा है, बल्कि वे उन्हें एक जीती-जागती इंसान के रूप में भी पेश करती हैं। इंदिरा गांधी के बारे में पढ़ने के लिए यह अकेली किताब काफी है। writer: सागरिका घोष Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Sagarika Ghose
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स्त्री वास्तविक इंदिरा गांधी की खोज जीवन नहीं । खुशी में और काम में भी मुझे अपनी और से भरपूर दिया । इनमें से एक के बिना दूसरे का अहसास कोई कैसे कर सकता है? प्रिया श्रीमती गांधी वास्तविक इंदिरा गांधी को ढूंढने की जिज्ञासा क्या बेकार है? दोनों तरफ प्रबल अभिप्रेरणा द्वारा संतुलित होती हुई आप अंतर्विरोधों की खान थी । आपने घना और प्रेम को आहूत किया, आपने विमुख किया और आकर्षित भी किया । आपने कुछ को निराश किया और अन्य को आनंद थी । क्या आपने प्रबुद्ध हूँ और विचारकों से नियमित विचार विमर्श किया? फिर भी आप भारत को साहसिक नई बौद्धिक दिशा देने में नाकाम रही । आप खुद को परिवर्तन दूध समझती रही, मगर अपने पिता की विरासत से बुरी तरह चिपकी रहें । आप भारत को अपना परिवार जताने का दावा करती रही, फिर भी राजनीति के केंद्र में अपने ही परिवार को लाती रही । आपने आपातकाल लगाया और आप नहीं उसे हटाया भी । अपने उत्तराधिकार परंपरा वाले राजाओं को उनके विशेषाधिकारों से वंचित किया, लेकिन लोकतंत्र में उत्तराधिकार आवादी विशेषाधिकार के सिद्धांत को लागू किया । बांग्लादेश में लोकतंत्र को बचाने के लिए आपने युद्ध किया, फिर भी अपने भारत से लोकतंत्र को छीन लिया । आप का दावा था कि आप स्त्रीवादी नहीं थी फिर भी लाखों के अपनाने के लिए आधुनिक भारतीय स्त्री की छाप छोड दें । आपको सुंदरता से प्यार था और पारंपरिक कलाओं को आपने बढावा दिया । मगर राजनीति में अब तक जारी विरूपता की परिपाटी डाली आपने । आपने सिख अंगरक्षकों को ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी हटाने से इंकार कर दिया । से पता चला कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति आप कितनी शिद्दत से समर्पित थी । लेकिन आप की मौत के बाद छोडे दंगों में वही आदर्श हो गया । आप अपने जन्म के सहयोग के अलावा खुद को आम आदमी कहती थी लेकिन आप विलक्षण महिला की इसने मुख्तलिफ विरासत छोडी साल के लिए क्या आप ये पूर्वानुमान लगा पाई थी? आपके द्वारा भारतीय हस्तशिल्पों को बढावा देने से भारतीय शिल्पों को फैशन जो पुनर्जीवित मिल जाएगा? प्रधानमंत्री के रूप में आप भारतीय कला और डिजाइन को राष्ट्रीय नवीकरण हो और असमता के संघर्ष की बाहर अभिव्यक्ति मानती रही हूँ । आपने साडियो खेलता हूँ, पूरब और पश्चिम को मिलाके डिजाइन की नई अवधारणाओं विदेश में भारत उत्सव को प्रोत्साहित किया । साल उन्नीस सौ पचास के दशक नहीं कमला देवी और अन्य लोगों के द्वारा शुरू किए गए हस्तशिल्प और हथकरघा आंदोलनों को गति थे । आपने युगों पुरानी कलाओं को आधुनिक भारतीय सुरूचिपूर्ण पहचान के रूप में स्थापित करने के लिए नई अवधारणा पेश । भारतीय मेधा और भारतीय मनीषा को संरक्षित करने के लिए आप चाहते हैं प्राकृतिक दुनिया में भी फैली पर्यावरण के संरक्षण, पशु अभयारण्यों को प्रोत्साहन और वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति आपकी चिंता । भारत की विरासत के समूचे संसार को संजो कर रखना ही उनकी आत्मिक शक्ति और विश्व में विशिष्टता का सोचा था । आपने भारत की स्त्रियों के लिए क्या विरासत छोडी? आपने इस विवाद होने से पढाई से इनकार इसलिए किया क्योंकि आपको डर था कि कहीं आप हाशिये पर पडे जनाने डिब्बे में फस कर में रह जाए जबकि आपकी महत्वाकांक्षाएं तो निश्चित रूप में मुख्यधारा से संबंधित थी । आपने आधुनिक स्त्रीवादी उपलब्धि के आदर्श को स्थापित किया जिससे हजारों प्रोत्साहित हुए । अनेक महिला पुरुषों ने आपके उदाहरण को अनजाने में ही अपनाया और जीवन में आगे बढे । इंदिरा का विचार आज के भारत में भी आधुनिक महिलाओं को प्रभाषित कर रहा है । आपने कहा था महात्मा गांधी ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महिलाओं के राजनीतिक अस्तित्व के बारे में भी सोचा और पहली ऐसी स्थिति थी । उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत को ये दिखाया कि भारतीय स्त्री क्या कुछ हासिल कर सकती थी और कितने गर्वोन्नत दृढ तरीके से वो अपना सिर्फ उपलब्धि बडा अनुभवी लोगों के बीच देश और विदेश में भी ऊंचा रख सकती थी । कटे बालों वाली साडी धारी सार्वजनिक रूप में सक्रिय महिला दिन की झलक हम आज अनिका ने खाद्य आपको वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों में इंदिरा के आदर्श से कोई ना कोई प्रेरणा लेते हुए देखते हैं । स्त्रियाॅ पीडन आज भी व्यापक रूप में जारी है । लेकिन कोई सक्रिय महिला मामूली ही सही मगर आजादी की जो सांस ले पाती है और भारतीय समाज के कमोबेश चिन्हित क्षेत्रों में ही सम्मानित पेशेवर की तरह स्वीकार की जाती है, उसमें आपके प्रति बने रहने का बहुत बडा योगदान है । इंदिरा के आदर्श नहीं, भारत की स्त्रियों को अपने पर गर्व करने का मौका दिया । ऐसे विषम समाज में, जहाँ आप शक्तिशाली मर्दवाद ियों से उत्पीडित और उनकी विजेता दोनों ही भूमिकाओं में रही तथा गांवों और कस्बों में आप आज भी शक्ति की अवतार के रूप में पहचानी जाती हैं, आप ने कांग्रेस पार्टी को में तोडकर उसका नाश कर दिया । लेकिन उसके साथ ही अपूर्वा पैमाने पर आपने लोकतांत्रिक शक्तियों को जगा दिया । आपने भारतीय जनता को ऐसा जागरूक किया जैसा आपसे पहले कोई भी अन्य राजनेता नहीं कर पाया था । फिर आपसी जागरूकता की शिकार बनी क्योंकि इसमें हम तथा आपकी तरह की राजनीति को खारिज कर दिया । अपने पिता से आप इतने अधिक बहन में कैसे हो गई? उनकी सबसे प्रकार रक्षक के रूप में स्वयं को आंकने के बावजूद आप उनकी राजनीति से लगभग पूरी तरह कैसे कट गई? जब घर के प्रबंधन अथवा समूह, स्वागत कार्यक्रमों एवं राजकीय भोजों के आयोजन की नौबत आती थी, आपके मिजाज नहीं, अत्यधिक सुरूचि और नाजुकता और लक्षित होती थी । लेकिन जब आप सडक की राजनीति करती थी तो आपका ये परिष्ठ रवैया कहाँ गायब हो जाता था? ऐसा इसलिए था कि आपके चारों और जो छुद्र व्यक्ति थे, उनके लिए आप में मन ही मन वितृष्णा भरी हुई थी । आप उन्हें सामान्य सम्मान का भी हकदार नहीं समझती थी । क्या रूढीवादी अभी जाते में फंसी लोकवादी थी? इनके नजदीक के लोगों के अलावा अन्य सभी को सामान्य समझने के बजाय उन्हें अपनी मर्जी से चला नहीं अथवा उनकी आकांक्षाओं पर हावी होने को ही ठीक माना जाता था । आप पारिवारिक संबंधों का मूल्य गहराई तक समझती थी और अपने घर, बेटों, पुत्रवधुओं और पोते पोतियों में बहुत खुश रहती थी । आप कहेंगी । मेरा जीवन इतने अधिक उतार चढाव और घटनाओं से लबालब रहा है । लेकिन मैं ये कहना चाहूंगी सबसे खुबसूरत लगभग मुझे तभी लगा जब मैंने अपने पहले बच्चे को अपनी गोद में लिया । लेकिन क्या आपने कभी रुककर ये सोचा कि राजनीति में परिवार की क्या भूमिका होनी चाहिए? अपने पिता के विपरीत क्या आप अपनी माता की भूमिका को अपनी राजनीतिक किया और नेता की भूमिका से अलग नहीं रख पाईं? वंशवादी उत्तराधिकार आपकी सोच में गहरा पैदा हुआ था । अपने पिता के डिप्टी अपने राजनीति में वंशवाद पर कभी भी उंगली नहीं उठाई । आपके पक्ष में ये कहा जा सकता था आप भीषण कठिनाइयों से लोहा ले रही थी और आपको नेहरू की तरह अभूतपूर्व अधिकार हासिल होने का लाभ नहीं था । शायद आपके परिवार के अलावा आप और किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकती थी । आपने बेहद उथल पुथल वाले रक्तरंजित काल में शासन किया । यहाँ भारत के हर एक कोने में संघर्ष फिर उठा रहे थे । इसलिए क्या आपने जीवन के छोटे छोटे आनंद में ही खुश होना सीख लिया था? टाइम्स की शब्द पहेली, छुट्टियों के दिन किमोनो तथा बंगाली शैली की साडी पहनना, पालतू कुत्तों से खेलना और पोते पोतियों को पौधों और फूलों की जानकारी देना वो आपके लिए सबसे अधिक निश्चिंत लगे होते थे । जब नहीं छुपा कर रखी गई फसल इंदिरा गांधी प्रकट हो जाती थी इंदिरा गांधी के शब्द अध्यात्म का अर्थ है व्यक्ति के भीतरी संसाधनों को पुष्ट करना और व्यक्तिगत अनुभवों की श्रृंखला को विस्तृत बनाना । खुशी और गम को निष्प्रभाव से बराबर झेलने की क्षमता पैदा कर रहा हूँ । किसी नए युग के गुरु के उद्बोधनों जैसा लगता है जीवन में शांति हासिल करने के उपाय के रूप में बताए जाते हैं । लेकिन सच यह है कि बहुत गहरे तक पर मूलतः धार्मिक थी । सोनिया गांधी के अनुसार अपनी माँ से उन्होंने अध्यात्म का गहरा सबक सीखा था, जिसके कारण वे दुख को भी अत्यंत धैर्यपूर्वक बर्दाश्त कर जाती थी । जगदीश शुक्ला कहते हैं, इंदिरा गांधी को लोग इसी रूप में जानते हैं । ये हमेशा धर्मनिरपेक्ष रही लेकिन वी धार्मिक आस्था में भी लिप्त थी । जगदीश के पिता जी । पी शुक्ला रायबरेली में इंदिरा गांधी के दफ्तर में काम करते थे । शुक्ला याद करते हैं कि वे जब भी रायबरेली आती थी तो हमेशा बालेश्वर मंदिर और देवी के मंदिर में दर्शन करने जरूर आती थी । रायबरेली में दो मंजिला कांग्रेस कार्यालय पर अब ताई जमीन है और वह निर्जन है । लेकिन दालान में स्थित छोटी से पूजा कक्ष में देवी देवताओं की रंग बिरंगी मूर्तियां और दीवारों पर सती आदि पवित्र प्रतीक अंकित हैं । निकले में चन्दन के गणपति इंदिरा गांधी के समय से ही विराजमान है । खुल्ला कहते हैं यहाँ आकर हमेशा ही थोडी पूजा क्या करती थी तो दीया जलाकर मूर्ति के चरणों में फूल चढाती थी । उन्हें ये बखूबी पता था पूजा में क्या और कैसे करना चाहिए । श्रीनगर की अपनी अंतिम यात्रा में हो पवित्रा शंकराचार्य पर्वत की चढाई करके छोटी परिस्थिति मंदिर में दर्शन करने गई थी । उन्होंने आजीवन कश्मीर आना जाना जारी रखा । मानव वहाँ की हवा को पीकर उदास जब भारतों को भूलकर स्थिरता और आराम महसूस करती थी । अपने इस दौरे में उन्होंने शारिका देवी के मंदिर और सूफी दरगाह जाकर भी दर्शन किये थे जहाँ उनके कश्मीरी पंडित पूर्वज पूजा किया करते थे । बसंत लक्ष्मण जो भी उनके आश्रम में जाकर हमेशा दर्शन कर दी थी, इनका याद करती हैं । मेरी सास अत्यंत धार्मिक थी लेकिन इस बात को छुपाया करती थी । नेहरूवादी तर्कशील धर्मनिरपेक्षता में धर्म नितांत अवांछनीय था । नेहरू स्वयं निरीश्वरवादी थे और उनकी बेटी उन्नीस सौ तीस में इंग्लैंड में विद्यार्थी थी । तभी क्रांतिकारी युवा उत्साहपूर्वक हूँ । विप्लवी समाजवाद की और आकर्षित हो रहे थे । वैसी क्रांतिकारी थी, जिनके जीवन का मिशन मिस रूप में स्थापित हुआ । वे भविष्योन्मुख प्रगतिशील भारत का निर्माण करेंगे । धर्मनिरपेक्षता की ये सिपाही खुले आम ये कभी भी स्वीकार नहीं कर पाई । अखबार जता नहीं पाई । उनके मन में धार्मिक आस्था और अंधविश्वास कितनी गहराई तक बैठे हुए थे । साल उन्नीस सौ इकहत्तर में उनकी बडी प्रशंसा हुई जब उन्होंने टेलीविजन पर इंटरव्यू करने वाले व्यक्ति से कहा, भगवान में उनकी कोई आस्था नहीं थी । उन्होंने प्रधानमंत्री पद की उम्मीद में पहली बार शपथ ली तो उन्होंने किश्वर के नाम पर शपथ लेने से इंकार कर दिया । इसके बावजूद पिच्चू की कमला नेहरू की भी बेटी थी, जिन्होंने सच्चरित्र की अवधारणा से मजबूत होकर रामकृष्ण मिशन आनंद मई माँ की शरण ले ली थी और अपने अंतिम दिनों में पूर्ण ब्रह्मचारिणी हो गई थी तथा साध्वी जैसी पवित्रता पर जोर देने लगी थी । इंदिरा के लिए अपनी माँ की आस्था को अपनाना प्रेम वर्ष हुआ किसी खाली होने को भरने के लिए, उस स्थिति से जुडने के लिए जिसे वो बेहद भावनात्मक और जबरदस्त संरक्षणवादी रवैये से प्यार करती थी और जिसे मात्र अठारह वर्ष की उम्र में हो बैठी थी । कमला नेहरू ने रामकृष्ण मिशन के किन स्वामी जी से दीक्षा ले ली थी और उन्ही स्वामी जी की शरण में रोज गांधी की मृत्यु के दुख में डूबी इंदिरा भी गई थी । उन्होंने धार्मिक संघर्ष से उपजे भयानक परिणामों को छे लाख था । बंटवारे की विभीषिका तथा महात्मा की हत्या के सदमे को झेला था । लेकिन धर्म की विनाशकारी शक्तियों को देखने के बावजूद वो अपने पिता की तरह नास्तिक नहीं थी । उन्नीस सौ के चुनाव में अपनी पराजय के बाद के वर्षों में इंदिरा नहीं वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर में अनुष्ठान किए थे । उन्होंने वहाँ अन्नपूर्णा और संकट मोचन मंदिरों में भी दर्शन किये थे । मध्यप्रदेश में सपना जिले में उन्होंने कमलानाथ मंदिर और राम सीता, हनुमान, हम सती अनुसुइया के मंदिरों में भी दर्शन किये थे । सतना में वे जानकीकुंड सरोवर के दर्शन करने भी गई थी । यहाँ पुराणों के अनुसार कभी सीता नहाया करती थी । उन्होंने हेलीकॉप्टर से वैष्णो देवी की भी यात्रा की थी और हेलीपैड से मंदिर तक दो किलोमीटर की यात्रा पैदल की थी । उन्होंने अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढाई थी और देश के कल्याण के लिए इबादत कीजिए । उन्होंने अम्बा जी के मंदिर में आंख मूंद का ध्यान किया था और शासन प्रणाम की मुद्रा में एक मिनट तक दंडवत भी किया था । साल उन्नीस सौ अस्सी के दशक जब उन्हें परेशानियों ने घेर लिया तो वे घर में अनुष्ठान और अंधविश्वासपूर्ण आयोजन करने लगी थी । उन्होंने गर्भवती मेनका को सूर्यग्रहण नहीं देखने दिया और उनके जन्मदिन पर संजय की मृत्यु के बाद राम की तस्वीर के आगे पूजा की थी । जय करने याद किया था यह देखकर आश्चर्य होता था की वो किस कदर रूढिवादी धर्म के वशीभूत हो गई थी । अपनी तथा अपने परिवार के लिए संरक्षण की चाहत नहीं आस्था की ओर मुड जाना उनका सिर्फ नहीं रूझान नहीं था । वो भारतीय मनीषा को अपनाना चाहती थी क्योंकि संतोकी, वाणियां, महा गाथाओं की शिक्षाएं उनकी सभ्यतामूलक विरासत में शामिल थे और वही भारतीय अस्मिता के विशिष्ट प्रतीक थे । लोगों से जुडाव के माध्यम भी थे । उन्होंने कहा था, रामायण और वहाँ भारत की राधा आएँ किसी खुले विश्वविद्यालय के समान है जिनसे हमारी जनता को सही और गलत प्रावधान होता है और वह धारण उनके भीतर समझाते हैं जिनसे में आसानी से जुड सके तथा जिनसे उनकी नैतिक क्षेत्र का विस्तार होता है । डॉक्टर माथुर लिखते हैं, प्रधानमंत्री धार्मिक मिजाज कि और परंपरावादी थे तथा आनंद वही माँ द्वारा दी गई रुद्राक्ष की माला हमेशा गले में पहनती थी । उनको योगासन स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी निर्देशित करते थे । अलग की रिजल्ट दूध पीकर जोर से डकार लेते थे तो वितृष्णा होती थी । ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद छोड मंदिर को देखने गए । इंदिरा ने अपने साथ गए लोगों के लिए दो दर्जन टोपियां मंगाई थी । तब सबके सिर्फ समुचित रूप से ढके हूँ और खाली रोमांस ए नाडा के हो । घर में उनके पूजा कक्ष में भी ईश्वर अनेक रूप में मौजूद थे । वहाँ किस्सा बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस और पांडीचेरी की माँ प्रदर्शन ऍम पीतल की तश्तरी रहते थे । भारत की मनीषा और धार्मिकता सामूहिक साझे पवित्र सोच से ही निकली थी और फॅमिली में मौजूद थे जिन्हें उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित और प्रदर्शन किया । उन्होंने ये महसूस कर लिया था कि भारत की कलात्मक ऍम परंपरा पवित्रता के धरातल से ही उत्पन्न हो कर विकसित हुई थी । उन्होंने भारतीय संस्कृति को पश्चिम में प्रदर्शित करने के लिए भारत उत्सवों का आयोजन किया । यहाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिष्ठित संग्रहालयों और दीर्घाओं में भारतीय कला कि आध्यात्मिक बडों को प्रदर्शित किया गया । कार्य घर, संगीतज्ञ, पता चल प्रकार की रचनात्मक खोज पड । इतना जोर दरअसल व्यक्त की और जाने वाली रहा की खोज थी तथा उन्होंने पवित्रता और सुर्खियों में अंतर्निहित संबंध हो समझ लिया था । वैदिक मंत्र भी धार्मिकता के साथ ही साथ कलात्मकता का उद्घोष थे । उपनिवेशवाद के सलाह में गुम हो जाने से भारतीय मनीषा को बचाने और संरक्षित करने की भावना, धार्मिक प्रवृत्ति तथा सुरूचिपूर्ण रुख दोनों का ही प्रतीक थी । कलाओं के माध्यम से भी स्वयं भी भारत की उधर खोज कर रही थी । ऐसी खोज इसे वो दुनिया से बांटना चाहती थी । पूछती थी कल से कोई क्या लेना चाहता है । कुछ घंटों का सुख अथवा ऐसा अनुभव जो समयातीत है और जिस से व्यक्ति की अंतरात्मा प्रभावित होती है, विकला के बारे में वो सब कुछ कह सकती थी जो धर्म के बारे में खुलकर नहीं कह सकती थी । काला दरअसल करा सकती है और विरासत ही धर्म था और उनका लक्ष्य प्राचीन विरासत के साथ आधुनिक देश का गर्वोन्नत संरक्षण करना था । हो चुकी मन की गहराई में धार्मिक थी । इसलिए कश्मीर और पंजाब की तरह राजनीतिक अभियानों में धर्म और धार्मिक मंचों के प्रयोग से उन्हें परहेज नहीं था । इंदिरा गांधी की धार्मिकता आध्यात्मिक अथवा पर लोग की चाहत से ओतप्रोत होकर सांस्कृतिक और अनुष्ठान परस्थिति । विधर्म की शरण ने दरअसल राजनीति में सभा के लाने वाले अंधविश्वासी उपकरण की खोज में गई थी । अपनी माता से वो भले ही कितनी भी प्रेरित है मगर पवित्र जीवन के प्रति उनके मन में कमला नेहरू जैसा कोई भी आग्रह नहीं था । उनके लिए धर्म मात्र संस्कृति का विस्तार था । इसे कडा हम साथ सजा की शैलियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया था । बसंत पंचमी पर वह पीली साडी पहना करती हैं और आपने मालिको घर में पीले फूलों की सजावट करने को कहती थी । नेहरू के अंतिम संस्कार के समय उन्होंने ये खास ख्याल रखा कि वहाँ से बेहद संगीत में कीर्तन भजन ही कराए जाएं । सान उन्नीस सौ अडतालीस में जब उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वह तीन मूर्ति भवन में सुबह सुबह ही प्रवेश करें तो नेहरू ने विजय लक्ष्मी पंडित को पत्र में उसका विवरण लिखा । समय का निर्णय हिंदू के अचानक हुए आग्रह के कारण यहां शुभ महूरत में आया जाए किया गया था । उत्तरकाशी स्थित कोई साधु सज्जन शायद मेरे पेशे में दिलचस्पी रखते थे । उन्होंने शुभ मुहूर्त का पैगाम भेजा था । हिन्दू लगा की विधि का उल्लंघन करना अविवेकपूर्ण होगा । यहाँ पर क्या वो वैज्ञानिक मिजाज के पैत्रक आदर्शों पर खरी नहीं उतर पाई? नेहरू का लहजा भले ही स्नेहपूर्ण हो, मगर उसमें मखौल का हल्का सा फट हुई है । इंदिरा की धर्मनिरपेक्षता में कमी थी, इसका कारण ये नहीं था । उनकी इसमें आस्था नहीं थी, बल्कि इसकी वजह यह थी वे अपने सार्वजनिक और निजी जीवन को आत्मसात अथवा उनमें तालमेल नहीं बैठा पा रही थी । धार्मिकता पूर्ण निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में धर्म से दूरी बनाने के संवैधानिक कर्तव्य के बीच डाॅ हो रहा था । कुछ दूर करने में नाकाम और उनके बीच संतुलन नहीं बैठा पा रही थी । एक तरफ अपने निजी दर्शन और दूसरी तरह व्यावहारिक शासन की आवश्यकताओं से पैदा हुए तो सेहत के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही थी । भारत के सभी पंथों को अपनाने के लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की । फिर भी ये बिना जाने की उसकी कैसी कीमत चुकानी पडेगी । उन्होंने राजनीतिक रणनीति के तहत एक धर्म को दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल किया । धर्म से मुंह चुराते हुए, फिर भी उस की और आकर्षित होते हुए और ऊंचे पदों पर मुसलमानों को नियुक्त करने के अलावा धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक रूप में पालन करने की समझ पैदा न कर पाने के फिर में इंदिरा नहीं कांग्रेस को बहुमत धर्मनिरपेक्षता के घर तो मेरा खेल दिया । इसमें वो हिन्दू कार्ड और मुस्लमान कार्ड को बारी बारी से आजमाने लगी । कांग्रेस आज तक ऐसा दल बना हुआ है जो धार्मिक होने पर धर्मनिरपेक्ष राज्य के कामकाज की आधुनिक प्रणाली अथवा राजनीतिक दर्शन में धर्म के मानववादी समावेशी मूल्यों को अपनाने में नाकाम रहा है । उन्होंने किसी साक्षात्कार में कहा था, हमारी संस्कृति और समाज भी धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है । हमारी राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है । हमारी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से बैर करना नहीं है । इसका अर्थ है सभी धर्मों को समान मान्यता मिलेगी । किसी स्थान पे, धर्म अथवा धर्म द्वारा अधिकृत सरकार का विचार हमारे यहाँ निश्चित है । इसके बावजूद स्वाद को परिभाषित करने में उन की विफलता के कारण कांग्रेस आज भी धर्मनिरपेक्षता की खाई से बाहर आने को सिर्फ आ रही है और सभी धर्मों के लिए आधुनिक तापूर्ण प्रगतिशील शक्ति के रूप में उभर पाने में विफल सिद्ध हो रही है । उन्होंने आरएसएस से पैदा होने वाले खतरों को लगातार इंगित किया फिर भी स्वयं हिंदू राजनीति करने से बाज नहीं आई । इसका प्रमाण हम ने उम्मीद सौ अस्सी के दशक में सांप्रदायिक दंगों और पंजाब संकट से निपटने की उनकी शैली के दौरान देखा है । इससे उनके समूचे राजनीतिक जीवन के दौरान बढती हिंदू राजनीतिक लामबंदी से पैदा हुई विचारधारात्मक चुनौती के विरुद्ध आंतरिक प्रतिबद्धता की कमी और उसके प्रति असहायता का भाव निरूपित हुआ है । मॉर्निंग कहते हैं, उनमें भारतीय का कूट कूट कर भरी थी, लेकिन मैं अपने पिता से अधिक पश्चिमी रंग ढंग में ढली हुई थी । उन्होंने मात्र आठ वर्ष की उम्र में स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में अकेले अपनी रहा ढूंढ ली थी । उन्होंने स्विट्जरलैंड ने स्कीम की और पेरिस में प्रेम क्या धारा प्रभाव फ्रेंच ऐसा बोली, लैटिन भाषा पढनी सीखी । फ्रेंड्स के दौरान लंदन की खाक छानी । इंग्लैंड में स्कूल की पढाई की । उनके अंतरंग मित्रों में अमेरिकी डोरोथी नार्मन शामिल थी । अपनी इटालवी बहुत से उनका जुडाव अपनी भारतीय बहु के मुकाबले कहीं अधिक था । उनकी खून पीती, पश्चिम के अंधविरोध से परहेज महाशक्तियों के सामने बेइज्जत अपनी बात कहने और नव उपनिवेश आवास के विरुद्ध संघर्ष में भारत को सबसे आगे रखने आदि पर आधारित थी । बावजूद इसके उनकी बौद्धिक प्रेरणा में अधिकांश योगदान पश्चिमी जगत का ही था । अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में ओपेरा और थियेटर देखने जाना उनके लिए किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं था । साल उन्नीस सौ इक्यासी में अपनी पेरिस यात्रा के दौरान उन्होंने जॉर्ज आॅटो सेंटर जाकर वास्तुविदों और विचारकों से मिलने पर खास जोर दिया । उसी दौरे में पेरिस के किसी रेस्टोरेंट में घुसी और वहां मौजूद अन्य मेहमानों का उन्होंने झुककर अभिवादन और मुस्कराकर स्वागत किया तथा सटीक फ्रेंच दिशा में अपने खाने की वस्तुओं का चुनाव किया । भारत उत्सव के आयोजन के दौरान लंदन में उन्होंने ऍम पैरा की नई संरचनाओं का मनोयोग से आनंद लिया । विनियोग फिल हार्मोनिक और सिस्टर कि संगीत संध्याओं में शामिल हुई । रॉयल पहले में रोडोल्फ न्यूरो वेव का नृत्य देखा और जुकिनी के लाभों हमको सुनने के लिए न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन ओपेरा मैं गई डॉक्टर जवाब हो और ब्लैक ब्यूटी उनकी पसंदीदा फिल्म थी । इंदिरा के व्यक्तित्व में उनका विशिष्ट अंदाज हमेशा चलता था । नुकसान तिरेपन में अपने पिता के साथ सोवियत संघ के दौरे पर उन्होंने महंगे मिंग कोर्ट में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई तथा पर कूट और साडी के खास तालमेल की छाप छोडी । उन्हें मधुबनी पेंटिंग और प्राचीन कलात्मक पंचवी साडियो से लगा था । बसंत पंचमी और क्रिसमस उत्साह से मनाती थी । उन्होंने अपनी निजी संस्कृति में भारतीय कराओ को तो शामिल किया ही था मगर उसमें यूरोपीय परिष्कृत शानशौकत की सुगंध दी थी । छुट्टी कहते हैं उनके घर की साथ सजा यूरोपीय शैली की थी । किताबों का अंबार भारतीय हस्तशिल्प लेकिन पश्चिमी शैली का न्यूनतम करनी चाहिए, दिखाने वाला हूँ और विचार में खुद को उच्च संस्कृति का संरक्षक समझती थी । वे पश्चिमी प्रबुद्ध वर्ग से संबंधों और विचार विमर्श में गर्व महसूस करती थी तथा संस्कृति एवं विचारों के क्षेत्र में नई खोज और नए प्रयोगों को समझने में उनकी विशेष दिलचस्पी थी । इसीलिए उन्होंने वास्तवित और विचारक पाक मिनिस्टर फुलर को व्याख्यान देने के लिए भारत ने निमंत्रित किया था । जब भी विदेशी नगरों का दौरा करती थी, हमेशा बौद्धिक वर्ग से बैठक किया करती थी । उन्होंने कहा था, अमेरिका की अपनी यात्राओं से मुझे हमेशा सोचने की नई दृष्टि मिले, वहाँ इतनी अधिक गतिशीलता है । बहुतायत में नए विचार, नई खोज, हर एक क्षेत्र में वास्तुशास्त्र, नृत्य, संगीत आदि में शिल्पों को पुनर्जीवित करने में सक्रिय और दस प्रकार की संस्थापक लैला तैयब जी कहती हैं, भारतीय शिल्पों को जब पुनर्जीवित करने की मुहिम चली तो युवती थी, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने दुनिया के सामने भारतीय शिल्पों को प्रोत्साहित किया । जिस जमाने में घरों की साथ सजा में मखमल और झाडफानूस का प्रयोग हो रहा था तब भी उनके घर में हमेशा खूबसूरत हस्तशिल्प ही सजे रहते थे । विदेशों में भारत उत्सव इंदिरा गांधी की महत्वपूर्ण विरासत है । उनसे भारत की लोकशक्ति के प्रसार में उन्हें होने वाले गर्व का अनुमान लगता है । दुनिया को भारत की कलाओं से रूबरू कराने के पीछे भारत की मेधा को जीवित रखने, उसे मजबूत बनाने और पुनर्जीवित करने की उनकी शैली थी । वो इस बात के लिए दृढसंकल्प की पीढियों से उप महादीप में रजत खूबसूरती को दुनिया के सामने स्थानीय लोग शगल के बजाय शक्तिशाली उच्च परंपरा के रूप में प्रदर्शित किया जाए । भारतीय होने में गर्व महसूस करने की उनकी खानदानी परंपरा थी । इसलिए यूरोप और अमेरिका के संगीत थियेटर और व्यंजनों का उन्होंने भले ही कितना आनंद उठाया हो, घरेलू और विदेशी धरती पर अपनी अस्मिता की निजी अभिव्यक्ति उनके लिए हथकरघे पर बनी साडिया ही थी । अपनी तमाम विविध शैलियों और रंगों से युक्त साडिया उनके लिए सिर्फ अपने विशिष्ट अंदाज की निजी अभिव्यक्ति ही नहीं थी, बल्कि भारत के इतिहास को लपेट का परिधान राजनीतिक प्रति और सुरुचिपूर्ण संकेत दोनों थे उनके व्यक्तित्व में क्योंकि पूरब और पश्चिम आसानी से रखे बच्चे थे । इसलिए उन्होंने कटे बालों वाली मगर हथकरघे पर बने कपडे पहनने वाली आधुनिक स्त्री की पहचान स्थापित की । जिसमें सजीला, केशविन्यास, अमून, मर्दानी, कलाई, घडी के अलावा कोई गहना अथवा सजने संवरने का और कोई मध्यम नहीं अपनाती थीं । नाम बस तभी कभी ऊंची एडी के जूते पहन लिया करती है । पेंशन युक्त विशिष्ट हथकरघा वस्त्र पहनना ही वो अधिक पसंद करती थी । उन्हें धरती के शौक, रन जैसे नारंगी, लाल घुसर और गाडी अथवा हल्के रंग पसंद थे । उनके लालित्य में कोई तामझाम नहीं था फिर भी हमेशा वो अपनी छाप छोडती थी । वो कहा करती थी मुझे उछाल रही ना पसंद हैं, चाहे कपडों में हूँ अथवा नहीं हो । मुझे हमेशा सादा शैली के वस्त्र पसंद हैं । नयनतारा सहगल याद करती हैं कि वे दोनों वो पत्रिका में प्रस्तुत फैशन पर अचंभा चल जाती है । मगर साथ ही वो ये भी याद करती हैं । इंदिरा को दिखावा और ऐश्वर्या प्रदर्शन इस कदर ना पसंद था । उनकी निजी शैली न्यूनतम जरूरतों वाली थी मगर उसमें भी बहुत शिद्दत से आगे जा के वंश की अभिव्यक्ति लगती थी । उनके घर में भी पूरब और पश्चिम का स्वाभाविक संगम दिखता था । उन्होंने अपनी बहू मेनका को जहाँ भी को मानिकशा से गार्डन ब्ल्यू पकाना सीखने के लिए भेजा वहीं दूसरी बहुत सोनिया को ऊषा भगत से हिंदुस्तानी व्यंजन बनाना सीखने को कहा, जिन्हें घरेलू सेवक करंट बहुरानी पुकारते थे । यहाँ पश्चिमी सभ्यता का गांधीवादी बहिष्कार कहीं नहीं था और उनके विशिष्ट भारतीय लंगोटी अथवा गरीबों की पोशाक पहने में भी कतई दिलचस्पी नहीं थी । उन्होंने महात्मा के अनुयायियों के ढंग पर हमेशा गुस्सा जताया था । उन्होंने अपने पिता को लिखा था, इन तथाकथित गांधीवादियों की दिखावटी अच्छाई से मैं आज इस आ गई है । मेरी उम्र में अनेक लोगों को गांधी को समझने में दिक्कत आती है । हम उनके प्रिय सिद्धांतों के प्रति अधीर थे और राजनीति में रहस्यवाद के घालमेल के लिए उनसे लडते थे । वे महात्मा की राह अपनाने के लिए निर्धन फकीर की छवि अपनाने को कतई तैयार रही थी । उसके बजाय इंदिरा गांधी का पूरा पश्चिम का संगम उच्च संस्कृतियों का मिलन था । जनता सरकार द्वारा उन्नीस सौ अठहत्तर भी बंदी बनाए जाने पर उनकी कल्पना भी तो वन से जांगली । अपनी कोठारी की खिडकी की सलाखों को गिनते हुए उन्होंने खुद से संगीत बनाने वाले के शब्द तो आए थे, मैं भाग्य को उसके गले से पढ लूंगा । वो कभी भी मुझ पर समूचा कब्जा नहीं कर सकेगा । जब किसी जर्मन विद्यार्थी ने उनसे उनके पसंदीदा गाने का नाम लेने को कहा । वो ले सकता टैगोर की ओर खींच गई और बडे ही मनोयोग से उन्होंने खुद की एकला चलो रे का अनुमानन करके उसे सुनाया । अंबिका सोनी याद करती हैं, उन्हें फूहडपन पसंद नहीं था, पढाई में चुनाव प्रचार कर रही हूँ अथवा विदेश में हूँ । उनके कपडों पर सिलवट नहीं होनी चाहिए । वो कहती थी, राजनीति में होने का मतलब ये तो नहीं है । क्या आप अपनी पसंद के अनुरूप जीना सके? उषा भगत याद करती हैं । उनकी साडीयां और अन्य समानार्थी बहुत सोच समझकर तय किए जाते थे और चार्ड के विभिन्न खानों में भरे जाते थे । इंदिरा कभी भी ढीलीढाली नहीं रही और हमेशा ढंग के कपडों से सुसज्जित और तरोताजा चेहरे मोहरे के साथ दिखाई देती थी । वे अपनी साथ सजा का मनोयोग से ध्यान रखती थी और हल्का फुल्का मेकप और पारदर्शी नेलपॉलिश का प्रयोग करती थी । अभी बोलना याद करते हैं । वे अपनी त्वचा पर अनेक किस्म की क्रीम और लोशन लगती थी तथा अपने हाथों और पांवों का खूब ख्याल रखती थी । अपने सुन्दर होने पर उन्हें बडा करता था । मैंने उन्हें जब नंगे पांव देखा तो उनके पावों की प्रचार भी इतनी पारदर्शी थी उसमें से नीली नसें झलक रही थी । जिन दिनों में दफ्तर नहीं जाती थी तो उन्हें बंगाली शैली में साडी पहनना पसंद था । कुशलतापूर्वक स्कीम तो करती ही थी धारा प्रभाव हिंदुस्तानी बोलने के साथ ही उद्विग्न होने पर गायत्री मंत्र भी अपने वाली परिष्कृत शख्सियत को आजमगढ में खुले आसमान के नीचे सोने से भी परेश नहीं था । बीथोवन और टैगोर स्कीइंग और गायत्री मंत्र, हथकरघा वस्त्र और कैवियार रात दरबारी और सिर्फ सिंफनी सहित दुनिया की दोनों ही संस्कृतियों की पार्टी थे । उनका हिंदुस्तानी मिजाज उनके परिधान और निजी संस्कृति में और विदेश में बेहद आसानी से ढल जाने में पश्चिमी शो रखता था ये पूछने पर लेकिन पुस्तकों का प्रभाव उनके जीवन पर सबसे अधिक पडा, उन्होंने रामायण, महाभारत, फॅस इन वंडरलैंड और तू लुकिंग ग्लाॅस तथा फॅस के नाम गिराए । उनके निकटतम मित्रों में शामिल एक व्यक्ति को लगता है इनका रामायण और महाभारत की और रूझान जीवन के आखिरी काल में ही हुआ और अनेक लिहाज से तेज राष्ट्रीय कब होती है । लंदन में भारत उत्सव साल उन्नीस सौ बयासी में खूब धूम धाम से आयोजित किया गया । ऐसा सुब्बुलक्ष्मी ने रॉयल फेस्टिवल हॉल में कान प्रस्तुति और रविशंकर ने सत्तर बजाया । अंत में जो बन मेहता संचालित लंदन । फिलहार मैनिक और स्टापर ऊंचे होने वाले अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए भारत का राष्ट्रगान बजाया गया । ऑर्केस्ट्रा जब जन गण मन की धुन निकाल रहा था और प्रिंस ऑफ वेल्स उसके सम्मान में सावधान मुद्रा में खडे थे, तभी पुपुल जयकर ने कनखी से देखा तो आंसुओं से डबडबाई आने के बावजूद इंदिरा गांधी की आर्थिक चमक रही थी । इंदिरा ने कभी याद किया था, युवाओं को तो याद नहीं, मगर विदेशी शासन की सबसे बुरी बात थी लगातार अपमान । ये सब कुछ दुखद था । यहाँ अपने देश में ही लगातार अपमानित होते थे । इंग्लैंड के युवराज की उपस्थिति में भारतीय संगीत तक के द्वारा अपनी मातृभूमि को और किस्टा के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित किया जाना इंदिरा गांधी के लिए अपने बहुमूल्य देश द्वारा विशिष्ट मुकाम हासिल कर लेने जैसा था । अपने पूर्वजों के प्रति प्रखर देशभक्त का अभी कथन के वे अभी तक तो देश रूपी जहाज को सुरक्षित चलाने में कामयाब रही । साल के मार्च महीने में लंदन में भारत उत्सव के सुखद एहसास के दौरान घरेलू परेशानियाँ अल्पवधि के लिए ही सही, नगर नहीं और भुला देने लायक लगी होंगे । भारत उत्सव दरअसल उनकी वांछित शख्सियत देशभक्ति और कलात्मक प्रफुल्लता के मेरे जुडे व्यक्तित्व के प्रतिबिंबन है । इंदिरा की पडने की आदत उत्सुकतापूर्ण और नियमित थी । अपनी आधी अधूरी गिरफ्तारी के दौरान उन्नीस सौ में जब उन्हें पुलिस के हवालात में रखा गया तो भी वे अपनी कोठरी में बैठी उपन्यास पडने में मगर नहीं नटवर सिंह दिलचस्प वाकया बताते हैं, साल में लुसाका की उडान के दौरान ये सूचना मिली कि विमान में बम रखा है । जी जब इंदिरा गांधी को बताया गया तो उन्होंने तपाक से कहा था कि झूठ है और उन्हें उडान जारी रखना चाहिए । अक्सर ने दखल करते हुए कहा कि सावधानी में कतई कोताही नहीं करनी चाहिए । विमान लौटकर मुंबई हवाईअड्डे पर आ गया और सामान की जांच के दौरान उन्हें पूरे तीन घंटे इंतजार करना पडा । इंतजार के दौरान भी इंदिरा ने सीधे किताबों की दुकान का रुख किया और प्रधानमंत्री को सहज भाव से किताबें खरीदते देखकर बिचारा । दुकानदार बहुत सकता रह गया और उसमें किताब कौनसी खरीदी और सर हेली की एयरपोर्ट किताब पढने के मामले में हालांकि अपने पिता का मुकाबले में उम्मीद की थी । नेहरू की तरह इतिहास और विचारों के इतिहास में उनकी दिलचस्पी नहीं थी । उनका केंद्रीय लक्ष्य बौद्धिक जीवन जीने का नहीं था । व्यावहारिक किसी दुनिया की यथार्थवादी थी । धवन कहते हैं, घरेलू व्यक्ति वो पंडित जी की तरह महान विद्वान नहीं थी । वामपंथ के प्रति उनका रुझान उस माहौल की दिन था, जिसमें उनके पिता के फैबियन समाजवाद और उनके पति के विचारों का प्रभाव था । उनका समाजवाद और लोकतंत्र के लिए उनकी प्रतिबद्धता हमेशा राजनीतिक अनिश्चितता के अधीन रहे । शायद यही सापेक्ष दूरदृष्टि का अभाव रहा कि वे आपातकालकी और बढ गई । फिर भी वे विचारों कि प्रशंसक लेखक ना होकर भी उस तक प्रेमी थी । शारदा प्रसाद ने याद किया, सरकार के कोई मुखिया शायद ही दिखावे से इतने मुक्त, इतने कुशल और पीडा तथा सौंदर्यबोध के प्रति इतने संवेदनशील रहे होंगे । विश्व के इतिहास के उनमें नेहरू जैसी समझ भले ना रही हो, लेकिन उनकी बौद्धिक महत्वाकांक्षा भी बहुत प्रबल नहीं थी । मैं हमेशा दिलचस्प लोगों से मिलना चाहती थी और जिन से मिलना चाहती थी, उनकी सूची भी उन्होंने बनाई थी । सूची कुछ इस प्रकार थीं कुशाग्र योगीजन मिलेजुले कलाकार विद्यार्थी तो सामाजिक कार्यकर्ता, तीन वकील, वर्ष नागरिक और चार पांच तो वेज बडे उद्योगपति हूँ । महाराजा और दिखावा परस्पर नव धनाड्यों के साथ से असहज हो जाती थी । तडक भडक से बचकर अपनी समझ नहीं भारत के असली आत्मा के प्रतिनिधियों के बीच चली जाती नहीं । उन्होंने अनेक भारतीय लेखकों से जब तब मुलाकात और बखूबी बातचीत की, जिनमें अमृता प्रीतम और मोहन राकेश भी शामिल हैं । विदेश में उन्होंने अन्य रचनात्मक शख्सियतों के अलावा राजनीतिक सिद्धांतकार खाना ऍम, नाट्य लेखक एडवर्ड एल्बी और लेखक विक्टोरिया ओ कम पैसे भी बातचीत की । पश्चिमी और भारतीय प्रबुद्धजनों से मिलने की बात हमेशा उनके कार्यक्रम में शामिल रहती थी और मैं उनका सम्मान करती थी तथा कभी कभी उनका मजाक भी उडा देती थी । बस मिनिस्टर फुल्लर ने जब भारत ने व्याख्यान किया तो मौनी मल्होत्रा ने उन्हें बताया कि उनके पहले तो एक भी शब्द नहीं पडा । इस पर वे इतने जोर से और खुलकर हसी । इस बात पर उन्हें मजा आने और महान विद्वानों की छुट्टी लेने की चेष्टा की पुष्टि हुई । उनके पिता के प्रबुद्धता वाद के कारण वो अपने आप ही कुछ विद्रोहिणी हो गई । महात्मा से ये सीख लेकर जनता से बौद्धिक स्तर पर संवाद नहीं किया जा सकता । डर और विवेकपूर्ण बातचीत की गुंजाइश कम ही होती है जनता से सीधे संपर्क की राह पर चलने के लिए । फिर भी महात्मा का जनता से संबंध नैतिक परियोजना थी सकते हैं और आत्मसंयम जैसे उच्च निजी मानकों के लिए संघर्ष का उत्थान, जबकि उनका अपने मतदाताओं से भावनात्मक और लोकलुभावन रिश्ता था । प्रेम और घृणा का उथलपुथल भरा संबंध उन्होंने विद्वानों से संबंध बनाए, फिर भी ज्यादा गहरे सिद्धांतों का जिक्र आने पर अधीर हो जाती थी । उन्होंने महानतम विद्वानों को बहुत ध्यान से सुना जरूर, मगर उनके पिता के विपरी उनकी राजनीति, आदर्शों अथवा विचारों पर आधारित नहीं थे । उनकी राजनीति तो दरअसल उनके पिता के सिद्धांतों के विपरीत थी और वे अपने अनुयायियों में विचारवान अथवा प्रबुद्ध लोगों के बजाय लकीर के फकीर को आकर्षित करती थी । बौद्धिक वर्ग से यू तो वे अपनी नीतियों के अनुमोदन के लिए आतुर रहती थी, लेकिन उन से उनका संबंध राजनीतिक और स्वीकार्यता की जरूरत पर आधारित था, न की नीतियों पर खुली बहस अथवा समाधानों की वास्तविक खुश पत्ते का था । उसके बावजूद उन्होंने अपने पिता से भारत के वैज्ञानिक प्रगति की राह पर चलने की प्रतिबद्धता विरासत में पाई थी और कैम्ब्रिज में शिक्षित शहीन वैज्ञानिक होमी भाभा की कभी निकट मित्र रही इंदिरा को पूरी लगन से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने का श्रेय दिया जा सकता है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो आज राष्ट्रवादियों का गर्व से दिखाने का माध्यम है, लेकिन उस की स्थापना उन्नीस सौ बहत्तर में उन्ही के प्रधानमंत्री काल में विक्रम साराभाई ने की थी । विक्रम साराभाई ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के पिता में थे और इसरो की स्थापना तरह सर भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति के आधार पर हुई थी । इसे नेहरू के साल में बनाया गया था । अपने पिता जीता है अंतरिक्ष में भारत के कार्यों की । वे अपने पिता के समान निरंतर उत्साही संरक्षक बनी रही । भारत द्वारा बनाए गए पहले देसी मानव रहे उपग्रह आर्यभट्ट के परियोजना निदेशक यू आर राव याद करते हैं कि विशुद्ध भारतीय उपग्रह और अंतरिक्ष अनुसंधान के समूचे विचार पर कैसे खुशी और उत्साह से उछल पडी थी । आर्यभट्ट का प्रक्षेपण चोगे संघ में इस तरह रॉकेट प्रक्षेपण स्थल कपुस्तिन यार से उन्नीस सौ किया गया था । आर्यभट्ट परियोजना पर कार्यरत प्रज्ञा नहीं जब अनुमोदन लेने के लिए उनके पास गए तो खुशी से बोली बहुत बढिया और उन्होंने उनके प्रस्ताव पर तत्काल सहमती दे दी । अंतरिक्ष कार्यक्रम दरअसल इंदिरा के लिए वैज्ञानिक खोज तक सीमित ना होकर भारत की आत्मनिर्भरता और सुरक्षा से भी संबंधित था । उन्होंने उन्नीस सौ अस्सी के दशक नहीं मिसाइल बनाने के कार्यक्रम कोर्ट समर्थन दे दिया था । अंतरिक्ष अनुसंधान और भारत की रक्षा व्यवस्था को सुरक्षित करना अपने देश के लिए उनकी व्यापक भावना में शुमार थे । जिस करते हैं ये भारत का सिर ऊंचा रखना चाहती थी । बडी सोचती थी कि हमारी पहचान सर गरीबी और अशिक्षा से ही ना हो । ऐसा भी जो अतीत की शानदार उपलब्धियों की नींव पर भविष्य के लिए ऊंची छलांग लगा सकें । भारत के पहले उपग्रह के नामकरण के लिए उन्होंने भारतीय परंपरा को खंगाला । उन्होंने उसका नाम छठी सदी के गणितज्ञ और खगोलविद् आर्यभट्ट के नाम पर रखा । इंदिरा ये समझती थी कि भारत को और अधिक महान भविष्य का निर्माण के लिए सिर्फ अपनी महान विरासत की शक्ति के प्रयोग की आवश्यकता थी । कारीगर वास्तविक निर्माता तथा अंतरिक्ष अनुसंधान करता हूँ, भले ही नई खोज नया निर्माण करेंगे, लेकिन अपने महान पूर्वजों के वारिस ही कहलाएंगे । उन्होंने स्वाभावित विशेषता के साथ राजनीति की । उन्होंने उन्नीस सौ बहत्तर में कांग्रेस में जो दो खाड किया था, उनके लिए अनजानी राहों पर सिर्फ अपनी छठी इंद्रीय और पैदाइशी कुशलता के बूते ही किसी अनजानी गहराई में छलांग लगाने के समान था । अपने पिता तथा स्वतंत्रता आंदोलन के अगुवा दल को तोडने के लिए अपनी महत्वाकांक्षा को अंजाम देना मात्र ही माध्यम नहीं रहा होगा, बल्कि इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास की जरूरत भी बडी होगी । वो इसमें सफल इसलिए हो पाई क्योंकि उनकी समूची परवरिश में राजनीति रची बची हुई थी । बचपन से ही क्रांतिकारी परिवार में बडी हुई और उन्हें उन दिनों का बखूबी अहसास था जिनमें जोखिम, मौत, कैद, भावनात्मक और शारीरिक उत्पीडन आदि खेलना रोज मर्रा की बात थी । इसलिए राजनीति की पकड उनके लिए स्वाभाविक और चुटकी बजाने का खेल थी । सत्ता उनकी पूंजी थी और सत्ता की उत्कंठा, उनकी प्रकृति, विचारधारा के अधिक दखल से उनका वास्ता नहीं था । विचारधारा की जरूरत सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए पडती थी । साल उन्नीस सौ नब्बे में फिर सत्तारूढ होने पर प्रबुद्ध वर्ग के साथ अपने संबंध दुरुस्त करने को आतुर में उन्हें अपना नया विचारवान व्यक्तित्व दिखाना चाहती थी । विदेश में उनकी छवि धूमिल हो गई थी इसलिए उनके लिए ये जरूरी हो गया था । वे अग्रणी वैश्विक नेताओं की पांच में फिर से शामिल होने के लिए कुछ बडा कॉटन करेंगे । उन्हें जब सौर मान में सम्मान स्वरूप डॉक्टर ऑफ लेटर्स से मैं घोषित किया गया तो उन्होंने विश्वविद्यालय में किए जाने वाले अपने भाषण को कई बार लिख कर दुरुस्त किया । स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की धरती पर उन्होंने अपने बारे में तीसरी दुनिया की तानाशाह से संबंधित सभी धारणाओं को खारिज करने का प्रयास किया । भाषण के दौरान उन्होंने भारतीय दृष्टि की धर्म मानवीय सम्पूर्णता पर जोर दिया और अर्थ की संपूर्ण डाल मनुष्यों के भीतर गहराई आने पर ही आ सकने के बारे में बात कही । उन्होंने कहा, अच्छाई को निष्कलंक स्थिति से स्वाभाविक रूप में नहीं जोडा जा सकता । इसके बजाय हम माइंड में हर एक मनुष्य सूक्ष्म तब तो है । उन्होंने बौद्धिकता शायद इसलिए दिखाई कि वे आपातकाल की बदनामी को धोना चाहती थी जिसके कारण उन्हें अनेक अंतरराष्ट्रीय मित्रों और प्रशंसकों की मित्रता से हाथ होने पडे थे तो इस बात के लिए आतुर थी कि भारत की छवि दुनिया के सामने फिर से सहस्त्राब्दी पुरानी मनीषा के खान के रूप में स्थापित हो । उसकी पहचान ठंड, अलोकतांत्रिक निर्वात के बजाय कहीं अधिक महान रूप में स्थापित हो । उनका भाषण खचाखच भरे हॉल में लोगों ने एकाग्रता से सुना और खडे होकर तीर तक तालियाँ बजाई । उनका भाषण मुख्यतः उनकी अपनी छवि को सुधारने की भावना से प्रेरित था । ये बात सत्य से सब होती है । आपातकाल के बाद उन्होंने जैसी राजनीति की, उससे कोई उन्हें समबुद्धि आ जाने का प्रमाण नहीं मिलता । उनके सचिवालय के अफसरों के लिए मिसिस जी यानी श्रीमती इंदिरा गांधी दो भिन्न व्यक्ति थे । नटवर सिंह याद करते हैं, उनके व्यक्तित्व के दो पहलु थे । एक पहलू गर्मजोश, मित्रतापूर्ण और एकदम अनौपचारिक । जब हम राजनीतिक चर्चा नहीं कर रहे होते थे । अलबत्ता राजनीतिक चर्चा के दौरान को एकदम भिन्न व्यक्ति बन जाती थी । लेकिन जब वो गुस्से में आती थी तो किसी भी हद तक गिर सकती थी । अब से इंदिरा गांधी नाराज हो जाए तो उससे बुरा अनुभव कुछ नहीं था । लेकिन अगले ही चाँद तपाक से कह देती थी मुझे खेद है, सब हुई जाओ । उनके अधिकारी रहे लोग उन्हें ऐसी शख्सियत के रूप में याद करते हैं जिनके लिए आराम और काम के बीच में कोई लक्ष्मणरेखा नहीं थी । बल्कि आप एक दूसरे के पूरक थे तो एक साथ कई काम करती थी । फूलों को सजाने और संगीत सुनने के साथ के साथ पायलें भी निपटाती जाती थी और बैठक भी करती थी तथा कम और आराम साथ साथ करती प्रतीत होती थी । हबीबुल्ला याद करते हैं, हमें से जब भी कोई उनके कमरे में घुसता था, वो कहती थी, ऍफ जाओ । किसी बडी चाची अथवा बुआ के समान उनकी निगाह बहुत पहनी थी मगर हमेशा नहीं नहीं रहती थी । लेकिन कभी कभी वह क्रोधित भी हो जाया करती थी । वो याद करते हैं कि कैसे मद्रास में हुई किसी बैठक से वे कुछ से मैं बडी हुई । हाथ में कागजों का पुलिंदा लिए हडबडाकर बाहर निकली थी । वो जैसे ही बाहर निकली उनके पास में डॉक्टर मास्टर को खडे पाया । उनके हाथों में कागजों का वह पुलिंदा थमाते हुए कुछ नहीं बोली, पकड ली आपने रखिए । रवि बोला याद करते हैं । उनका वित्त तो बहुत नहीं था । नटवर सिंह कहते हैं, नेहरू खानदान के लोग सब जनता की हद तक शिष्ट थे । इसलिए कट्टर प्रतिद्वंदी होने के बावजूद मोरारजी मोरारजी भाई थे । जगजीवन राम ने भले ही उन्हें छोड दिया हो मगर उनके लिए हमेशा बाबू जी ही रहे । अपने पिता की तरह उनका शिष्टाचार निर्द्वंद्व था । उनकी निजी छाप को भी खूब याद किया जाता है । आपातकाल घोषित करने में इंदिरा के तानाशाही इरादों का अत्यंत आलोचनात्मक आंखों देखा विवरण उन्होंने भले ही लिखा हूँ, मगर बी एन टंडन इंदिरा को बेहद मानवीय व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जो अपने डॉक्टर को भी खुद फोन करती थी और जब वह बीमार पडते थे तो ये ध्यान रखती थी की उन की देखभाल ठीक से हो । तब लगातार सिगरेट पीने वाले आर । के धवन के लिए अपने विदेश दौरों से उस सिगरेट लाना हमेशा याद रखती थी । एक बार मौनी मल्होत्रा के साउथ ब्लॉक स्थित दफ्तर में जब अंदर घुस गए तो उन्होंने उनके द्वारा अपनी पत्नी के लिए लाई गई इत्र की शीशी फोड दी थी । श्रीमती गांधी सीढियाँ चढ के चलाती हुई आई यहाँ तो कोठे जैसी गंदा रही है । किसी समारोह में डॉक्टर माथुर को किसी आकर्षक स्त्री से बात करते देखने पर उन्होंने बाद में कहा, मैंने देखा कि आप उनसे कुछ अधिक की घुल मिल रहे थे । उनका अपने आस पास के लोगों के साथ सहज नहीं । मैं गर्मजोशी का रिश्ता था । हालांकि ये कभी भी खत्म हो सकता था । धवन कहते हैं, किसी भी क्षण अचानक बेहद गुस्सा करने लगती थी, लेकिन अगले ही क्षण उसे पूरी तरह ही देती थी । इंदिरा आदतन चिट्ठी लिखा करती थी और अपनी सरकारी पत्रों के अलावा अपने परिवार और मित्रों को भी सैकडों चिट्ठी लिखती थी । चीटियाँ टिप्पणियां, इंद्राज, डूडल्स यानी रेखांकन आदि उनके कलम से निकलते ही रहते थे । उनके निकटतम संबंधों में शुमार उनके पिता के साथ अधिकतर पत्रों के माध्यम से ही अभिव्यक्त हुए थे । सहजता से लिखे निजी लिखित शब्द उनके लिए बोलने से अधिक आसान संचार माध्यम थे । इंदिरा गांधी यदि आज हमारे काल में जीवित होती है, शायद ऍफ संदेशों में वह बहुत प्रवीण होती । उन्होंने ऊषा भगत को अनेक छोटी छोटी टिप्पणियां उन तीन दशक के दौरान लिख कर दिए होंगे । भगत उनकी सहायक थी । ये टिप्पणियां निर्देश तथा कभी कभी लम्बे सन्देश शहर सीधी सादी शैली यहाँ और वहाँ मुहावरों में समाहित रहते थे । मान उन्हें लिखने से वे तनावमुक्त और ऐसी भावनाओं को काबू करने में सफल होती थी जिन्हें बोल कर नहीं बताया जा सकता । टिप्पणियों पर बहुत कलात्मक डूडल्स बने रहते थे जिनमें विभिन्न पगडियां टोपियां और गहने पहने भारतीय शक्लें बांकुडा घोडा बंगाली शैली में अल्पना, शंक, गुलदस्ता आदि शामिल थे । कभी कभी उनसे जब कोई बात कर रहा होता था तब भी वे आतंक डूडल्स बनाती होती थी जिससे बहुत उन्हें संबोधित करने वाले व्यक्ति को भी मत जाती थी । कृष्णामेनन ने कभी गुस्से में कहा था, मैं महत्वपूर्ण मामलों के बारे में उनसे बात करने आया और वे बैठी बैठी डूडल्स बनाती रही । उनके पत्र दिन में कभी कभी दस्तखत की जगह टूट ही बने होते थे । लगभग हर एक समय लिख दिए जाते थे । रेलगाडी में विमान में और हेलीकॉप्टर में भी मानो वे आमने सामने जो बात नहीं कर पाती थी, उसे लिखकर बताने में उन्हें आसानी होती थी । उनके लिखे ऐसे निर्देश भी उपलब्ध है जिनमें संजय मेनका के सगाई समारोह के लिए चांदी की छोटी सी डिबिया में ठीक किस्म का कुमकुम रखने, छत की सफाई ब्लाउज की रंगाई सोनिया के लिए उपयुक्त हिंदी शिक्षक लगाने, संजय के लिए क्वालिटी की अच्छी वाली टॉफियां खरीदने, कश्मीर की खूबसूरती के अप्रतिम विवरण और राजीव और सोनिया की शादी संबंधी व्यवस्था के लिए सटीक निर्देश बहुत हूँ और फूलों के चयन से लेकर मोतिया के झालरनुमा, पर्दे और अल्पना से लेकर मेंडल सोन के बारह के संघीय और पैरा लोहे ग्रीन में वेंगर के दुल्हन के सामूहिक गीत तक शामिल थे । साडिया चुनते हुए थे भगत से पूछते हैं रुपया किसी पार्टी की नजर से बताऊँ लडकियों वाले चुटकी में सुनाई जाएंगे । आपकी जानकारी के लिए मैं अपने नाको नहीं काट रही बल्कि छोटे वाले लद्दाखी बादाम खा रही है अथवा किसी ने मेरे बालों की शैली पर ध्यान ही नहीं दिया । मादम तुसाद के यहाँ उनके मोम के पुतले संबंधी नापजोख के बारे में और एक निर्देश पत्र के अनुसार सबसे ताजा पैंतीस दशमलव सत्ताईस दशमलव देश आधार इन सब मुझे अंकों में कम से कम डेढ इंच की कटौती कर दी जाए । किसी उपहार के साथ लिखे अन्य निर्देश के अनुसार हमारे पास क्योंकि चैनल नंबर छह की बहुत आयात है, मैंने सोचा की चैनल नंबर पांच शायद अधिक पसंद आएगा । पत्रों में सुरूचिपूर्ण व्यवस्थित ग्रहणी की झलक मिलती है जिनके लिए शादी अथवा अंत्येष्टि के लिए भी उपयुक्त परिस्थितियां बनाना मगर कलात्मक शैली, प्रदर्शन करने, सुरूचिपूर्ण और परिष्कृत संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति का माध्यम थे रिजोर देती थी । विदेशी पत्रों के लिए हमें बढिया टिकट चलना चाहिए । उदाहरण के लिए बीथोवन अथवा मनी चर्च प्रकारी सरकारी बोझ भी व्यंजनों की सूची बहुत सोच समझकर बनाती थी और मेहमान की फितरत के अनुसार उनके नाम रखती थी । अंतरिक्ष की बाहरी कक्षा का दौरा करने वाले रूस के प्रथम मानव अंतरिक्ष यात्री यूरी गैगरीन जब उनके पास चाहे की बैठक पर आएगा तो उन्होंने वहां पेस्ट व्यंजनों के नाम कुछ ऐसे रखें उडनतश्तरी समूचा और लड्डू ल्यूनर भगत बताती हैं कि दोपहर और रात के बोझ में हमेशा उनका निजी पुट रहता था । जैकलीन कैनेडी तब की मूर्ति में आकर ठहरी । पिंजरा ने उनके कमरे को कलात्मक वस्तुओं और भारतीय संस्कृति पर पुस्तकों से सजाया और उनके झूलने के लिए बागीचे में गुजराती शैली का झूला भी टंगवा दिया । चुनाव प्रचार के दौरान फिर सघन दौरे करती थी और चुनाव में वे खुले आसमान के नीचे सोने में भी नहीं हो सकती थी, लेकिन जीवन की सुख सुविधाओं से भी उन्हें परेश नहीं था । श्रीमूर्ति में नेहरू के सोने के कमरे में एयरकंडीशनर नहीं था, लेकिन मुंबई के दौरे में कभी इंदिरा ने राजभवन स्तर किसी बंगले में ठहरने से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि उसमें एयर कंडीशनर नहीं था । इंदिरा सत्तर के दशक में उच्च मध्यम वर्ग शैली का जीवन जीते थे । इसमें किफायती सुख सुविधाएं और त्यौहार आदि समारोह परिवार आधारित ही मनाए जाते थे । अपना खाली समय बिताने के तौर तरीके उनके स्मारक संग्रहालय में प्रदर्शित हैं । बुनाई की सलाइयां क्रोशिया पक्षी तार ने के लिए दूर भी और ताश के पत्तों की गड्ढे । छुट्टियों के दिन वो अपने औपचारिक परिधान से पिंड छुडाकर घर में कप्तान और किमोनो पहन कर रहे दी थी । कुत्तों से खेलती थी अथवा कभी कभी कश्मीर में पुरानी शिकारगाह दाचीग्राम में अपने परिवार के साथ समय बिताती थी । राजीव गांधी ने इंदिरा के घुमक् तार समूह में सभी को अपना बिस्तर खुद लगाना, गुसलखाना खुद साफ करना, सरकार में दूसरों के साथ बैठना होता था । शाम के समय ताश अथवा डम शराब खेले जाते थे । डॉक्टर माथुर ठाकुरों से गुलजार उन शाम को याद करते हैं, जब दम शराब खेलते हुए इंदिरा के निजी सहायक केशपाल कपूर ने सपेरि का स्वांग किया और गर्दन इधर उधर हिलाते हुए तीन बजाई और जब डॉक्टर माथुर ने सिर पर बडा सा तौलिया लपेटकर अरब शेख का रूप धरा था । इंदिरा ने सबसे खुश होकर डॉक्टर माथुर से कहा, सक्रिय राजनीति से जब मैं संन्यास होंगी तो नाटक कंपनी खोल होंगे और उसमें आप प्रमुख अभिनेता होंगे । समुद्र तट की बजाय घूमने के लिए पहाडों को ज्यादा तवज्जो देती थी । कहती थी समुद्र आपकी थकान दूर करते हैं, मगर पहाड नवजीवन देते हैं । ये उदारीकरण से पहले का ताल था । मॉल, मल्टीप्लैक्स, टीवी का मनोरंजन अथवा पांच सितारा होटल नहीं थे । इसके बजाय परिवारों के साथ लोग बाहर घूमने जाते थे । बागीचों में बैडमिंटन और पालतू कुत्तों के साथ खेलते थे । पिकनिक में समूह से और गर्म चाय चलती थी और सर्दी की अलसाई दोपहरी धूप में चटाई बिछाकर नानी पोतों के साथ खेलने में भी थी । आराम का मतलब पहाडों में लंबी से अथवा टाइम्स की कठिन शब्द पहली हल करने में मजबूर रहना होता था, जब पहली तो लगभग रोजाना ही हाल करती थी । ऑपरेशन ब्लूस्टार के कुछ ही महीने बाद कश्मीर के अपने अंतिम दौरे से लौटने पर जब उनके जीवन के लिए खतरा चरम पर था, तब भी दादी इंदिरा परपोती प्रियंका शाम को साथ बैठकर शांतिपूर्वक और मजे में जान ऑस्टिन की फॅमिली विजन पर देखते थे । उन दिनों तो उनके घर में बहुत पकने वाली कुरकुरी भिंडी हैं, जैसे आम वहम व्यंजन को खाने में भी आनंद था । जब ताजा दक्षिण भारतीय काफी खास होती थी और बढिया साबुन की खुशबू क्या कई दिनों तक सफाई रहती थी? भारतीय उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था कुछ दशक दूर थी । विदेशों से आने वाले उपहारों पर उत्साहपूर्वक आश्चर्य जताया जाता था । अफगानिस्तान से आए सर दे दैनिक खरबूजे भी विशिष्ट व्यंजन की तरह घर के सब लोगों के साथ बात कर खाए जाते थे । उनके दिनचर्या पुराने अनुशासन से बनी थी । सवेरे छह बजे नींद से जाग नहीं योगासन करने, ठंडे पानी से नहाने और आठ बजे तक तैयार हो जाने, कुछ अधिक सिगरेट तो आधा उबला हुआ, एक अंडा, कुछ फल और दूरियाँ कॉफी का सादा सा नाश्ता, उसके बाद काम में जुट जाना और फिर दोपहर के खाने के लिए घराना दोपहर के खाने में हमेशा सादा भारतीय व्यंजन होते थे । अमूमन खाली और हमेशा अपने परिवार के साथ । उसके बाद थोडा सा आराम, फिर काम पर लौटना तथा रात में लौटकर हल्का भोजन कर रहा हूँ । रात के खाने में अधिकतर पश्चिमी व्यंजन पडते थे लेकिन वो भी अत्यंत गश्त अथवा बहुत महंगे नहीं होते थे । वो कभी बाहर खाना खाने नहीं जाती थी । धवन कहते हैं, कभी नहीं सिर्फ सरकारी समारोह में किसी राष्ट्र अथवा किसी के घर में होने वाली दावत में कभी नहीं खाने की । उनकी आदत में भारतीय और यूरोपीय दोनों ही व्यंजन भरपूर शामिल थे । दोपहर का खाना हमेशा भारतीय शैली का और रात का खाना बिला नागा अंतरराष्ट्रीय शैली का होता था । मौनी मल्होत्रा याद करते हैं, उनके घर में खाना हमेशा सादा मगर स्वादिष्ट बनता था । मछली खाने की शौकीन थी । मुझे याद है कि स्माॅल बहुदा उनके खाने में शामिल रहती थी है । बहुत तरह को याद है कि वे नए व्यंजन चखने से भी गुरेज नहीं करती थी । जैसे ऑस्ट्रेलिया के अपने दौरे, मेरे केकडे किए किस्मत वो रिटर्न बे बॉम्स को चखने बढ गई थी । होना हुआ वीर भारत में बनी बच ली और सूफ ले आदि उनके पसंदीदा यूरोपीय व्यंजनों में शामिल थे । मल्होत्रा की पत्नी लीला ने जब उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे में सुरूचिपूर्ण यूरोपीय शैली के रात्रिभोजन का आयोजन किया, विंद्रा बेहद प्रभावित थी क्योंकि उन्होंने व्यंजनों की सूची भी भोजपत्र पर बनाई थी और मिठाई में बहुत लेमन सूफले खिलाया था । डॉक्टर माथुर कहते हैं, उन्हें बढिया खाने का शौक था लेकिन अमूमन वे सादा और मात्रा में बहुत कम भोजन कर दीजिए क्योंकि वे मोटे होने के प्रति बहुत जागरूक थी, नियमित योगासन करती थी और आजीवन उन्होंने एल्कोहल के किसी भी पे को छुआ तक नहीं । माँ और बताते हैं । इसके बावजूद बेहतरीन व्यंजनों की जानकार नहीं हैं । कुछ भी बेहतरीन खाना पकाती थी और हमेशा स्थानीय स्वास्थ्य के नए खाने बनाने को उत्सुक रहती थी । दक्षिण भारत के दौरे में एक बार उन्होंने ये शिकायत की । उन्होंने मुझे ये तैयार कॉफी कैसे भी जब यहाँ इनके पास इतनी बढिया, ताजा पिसी हुई स्थानीय काफी उपलब्ध है । दोस्तों ने अपने आस पास के माहौल की घटनाओं के प्रति हमेशा बेहद जागरूक व्यक्ति के रूप में याद करते हैं । विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री और राजीव गांधी के मित्र सर्वर लतीफ याद करते हैं कि उनकी श्रवण शक्ति कितनी तेज थे । प्रियंका के जान के बाद से परिवार में उनसे मिलने गया । मैं राजीव के साथ कमरे में एक सिरे पर बैठा था और श्रीमती गांधी दूसरे सिरे पर सोनिया के साथ सोफे पर बैठी थी । मैंने राजीव से कहा उनकी बेटी का नाम प्रियंका रखने से ऐसा भी हो सकता है । लोग उसे भूल वर्ष प्रिया पुकारने लगेगा । मैं बेहद दबी आवाज में बात कर रहा था मगर तभी कमरे के दूसरे छोड से श्रीमती गांधी बोली नहीं, कुछ नहीं लगता कि उसे कोई भी प्रिया पुकारेगा । किसी अन्य समारोह में लतीफ याद करते हैं । श्रीमती गांधी वहाँ मेहमानों के बीच घूम कर उनसे बात कर रही थी और वहाँ के प्रवेश द्वार के पास कुछ लोग चर्चा कर रहे थे कि बेहतर शासन के लिए उत्तर प्रदेश को क्यों ना तीन राज्यों में बात किया जाए । कुछ मिनट बाद वहाँ से निकलते हुए मिसल गांधी दरवाजे के पास होगी और लोगों से कहा मेरी लाश के ऊपर मेरी सिस्टर ने लिखा वे अंतरंग आराम की मुद्रा और उत्तेजक रूप में बुद्धिमान हो सकती थी । दूसरा पक्ष था वो काम में मशगूल सहज दिख रही हूँ । अगर अचानक क्रोधित हो जाए उनके लिए किसी को माफ करना कठिन था और अपमान का बदला लेने से कभी नहीं चुकी थी । पीडित होने की याद उनके दिमाग में हमेशा रहती थी । ऐसा उनके बुआ विजयलक्ष्मी पंडित से उनके तनावपूर्ण रिश्तों का लंबा इतिहास गवाह है । वो जब प्रधानमंत्री बन गई और उदारमना आसानी से हो सकती थी, तब भी अपमान से जुडी भावनाओं और अपनी बुआ के प्रति गुस्से से पार नहीं पा सके । जैकलीन कैनेडी उन्हें असल मूर्ख, उधेडना, उद्दंड, भयानक और हमेशा ऐसा लगता था कि वह निम्बू चूस रही हूँ के रूप में वर्णित किया था । लेकिन डॉक्टर माथुर हत्प्रभ करने वाले सदाबहार मजाक के भाव को याद करते हैं । पाकिस्तान के राष्ट्रपति जियाउलहक में कभी उनसे जब प्रयास में अपनी आलोचना की शिकायत की, उन्होंने मशविरा दिया । इन पत्रकारों के प्रति निश्चिंत रहिए । मैंने कुछ नहीं पता । देखिए आपको लोकतांत्रिक और मुझे तानाशाह पुकारते हैं । राष्ट्रपति कुछ नहीं हुए । नटवर सिंह कहते हैं की अनौपचारिक होने के बावजूद उनमें मौनधारण करने, राजनीतिक चुप्पी धारण करने की भी जबरदस्त प्रतिभाग ही प्रधानमंत्री के रूप में यदि आप किसी के बारे में कुछ कहते हैं, आपके बयान को हमेशा तोडने, मरोडने अथवा उसके बारे में कब करने की गुंजाइश बनी रहती है । इसीलिए बहुदा कुछ भी नहीं कहती थी । अपने विचारों को अपने मन में रखना और अत्यधिक बहस से बचना पसंद करती थी । उनके मन से कोई बात उगलवाना असंभव था । उनमें राजनीतिक प्रतिभा की चिंगारी को पहचानने की गजब क्षमता भी, भले ही उससे उन्हें खुद कितना भी खतरा हो सकता हूँ । डॉक्टर माथुर याद करते हैं, जयललिता से व्यक्तिगत रूप में अत्यंत प्रभावित थी । कभी किसी सरकारी दावत ने । जयललिता जब मुख्य में से दूर बैठती थी, इंदिरा गांधी ने बैठने का क्रम बदलकर उन्हें मध्य में बुला लिया । जयललिता में बुद्धिमानी और खूबसूरती के संगम से बेहद प्रभावित थी और जान भी गई थी कि वे राजनीति की उभरती सितारा सब होंगे । इसे उन्होंने सच सिद्ध भी कर दिखाया । देश के लिए व्यस्त करने वाले काम में मसरूफ रहना कर्तव्य भी था और खुशी भी भरपूर । जीवन जीने की उन की परिभाषा भगत को भेजी गई नववर्ष की शुभकामना में परिलक्षित होती है । अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे मनोरंजन, अच्छे दोस्तों और अच्छे काम से भरपूर साल के लिए हर एक शुभकामना सहित उन्होंने कहा था, मेरे लिए राजनीति कोई नौकरी नहीं । ये तो कुछ ऐसा है जो करना जरूरी है । राजनीति तो पारिवारिक धंदा था । वो जैसा जो खानदान करता आया था और हमेशा करेगा । उन्होंने अपने लिए अपने पिता की सामान्य महत्वाकांक्षाओं के विरुद्ध विद्रोह किया और अपने बच्चों को कभी भी कम न आंकने की कसम खाई । भारतीय लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यशाली परिणामों के साथ ब्याज ईवन इसी धारणा से बनी रही कि भारत की देखभाल और उसके संरक्षण का जिम्मा नियति ने उनके परिवार के कंधों पर डाल रखा है । इस बारे में उनके मन में कभी कोई शंका नहीं थी । मेरी शटर लिखती हैं, वे भले ही कभी कभी कितनी भी ऊंचा अथवा पष्ट जान पडे, मगर जब उनके पिता की है, सुरक्षा का प्रश्न आता था, उनके लिए लावा कांच का सरासर अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाती हैं । विदेश में उनके संबंध विश्व मंच पर भारत को गंभीरतापूर्वक समझा जाए, ऐसी उनकी इच्छा और भारत के नैतिक मकसद को पहचाना जाए । ये भावना उनके भीतर नेहरू की अंतरराष्ट्रीयता की विरासत को हर कीमत पर संरक्षित करने की जब से निकली थी । धवन कहते हैं, वो इस बात की हमेशा बहुत परवाह करती थी कि उनके और भारत के बारे में अंतरराष्ट्रीय राय क्या बनेगी । उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण बात थी वो चाहे निर्गुट आंदोलन का नेतृत्व हो अथवा सोवियत नेतृत्व से उनके निकलता हूँ । इंदिरा मानती थी कि वो दुनिया में भारत के विशिष्ट स्थान की प्रतीक थी । उनकी विदेश नीति के विचारधारात्मक आधार स्पष्ट थे । वैश्विक मंच पर नेहरूवादी उपस् थिति को बरकरार रखेंगे । उनके लिए निर्गुट आंदोलन किसी भी आस्था की तरह पवित्र था । इस से उनका परिचय चुकी उनके पिता नहीं कराया था, इसलिए उसके आदर्श उनके मन में रच बस गए थे । वे हमेशा अपनी अलग राहत चुनने के भारत के अधिकार को बडी शिद्दत से सही ठहराती थी । दो परस्पर विरोधी वैश्विक धडों से निरपेक्ष था । निर्गुट आंदोलन को आजकल होंगे । समर्थक क्लब कहकर उसका मखौल उडाया जाता है । लेकिन इंदिरा के लिए इस संप्रभु संस्था का प्रतीक था आप निवेशित शासकों से छीनी गई राजनीतिक स्वतंत्रता के स्वाभाविक परिणति । दुनिया की नजरों में वे भारत की सम्राज्ञी थे । सत्ता का प्रतिरोध अनेक अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगाह में स्वर्ग से उतरी बहुमूल्य पक्षी थी और अपने सभी समकालीनों से उनकी शैली निराली थी, जिनमें श्रीलंका के प्रधानमंत्री श्रीमा, वो भंडारनायके और इस्राइल के प्रधानमंत्री गोल्डा मायर भी शामिल थे । स्वरुचि और सत्ता संपन्न ऐसी महिला थी तो दुनिया को गांधी के अहिंसा के नैतिक हजार देने वाले देश का नेतृत्व कर रही थी । अपनी विदेश यात्राओं में फिर धारा प्रभाव फ्रेंच भाषा अथवा हल्के से ऑक्सफोर्ड के फट वाली अंग्रेजी बोलती थी ताकि दुनिया को यह पता चल सके कि भारत का अर्थ है उच्च शैली और गरमा बैठें ऊपर स्थिति, फिर भले ही वह भीषण गरीबी से कितना भी त्रस्त हो । आपने सचिवालय में उन्होंने विदेश सेवा के अधिकारी की नियुक्ति पर भी जोर दिया क्योंकि वे हमेशा अंतरराष्ट्रीय मसलों में भी गहरी दिलचस्पी लेती थी । उनके नेतृत्व और आत्म छवि के लिए कूटनीति मानव संजीव नहीं थी । उन्नीस सौ अस्सी के दशक के आरंभ में असम और पंजाब में हो रही उथल पुथल के बीच भी दिल्ली में निर्गुट शिखर सम्मेलन का बडा भव्य आयोजन किया गया था । इंदिरा गांधी ने उस सम्मेलन के सभापति का दायित्व संभाला और दुनिया ने उन्हें और फिर कल कास्त्रो को गर्मजोशी से मिलते ही देखा तो नहीं बहन कहा करते थे । उन्होंने अपने पिता के आह्वान की तरह दुनिया भर में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों को समर्थन का ऐलान किया । दिल्ली में में कॉमनवेल् सदस्य देशों के सरकार प्रमुखों की बैठक में जहाँ महारानी एलिजाबेथ और मार्ग्रेट थैचर भी उपस् थित थी, इंदिरा ने अपने चारों और गिरती चुनौतियों की किसी को भी अलग नहीं लगने दी । उन्होंने परमाणु हथियारों के विरुद्ध अपना अभियान जारी रखा । हालांकि उस समय ये भूल गई थी । उन्नीस सौ चौहत्तर में शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट की बदौलत ही उन पर राष्ट्रवादी होने का ठप्पा लगा था जिस पर उन्हें खूब कर भी था । भारत के सही होने में अपनी आस्था और विश्वास के बूते कि भारत की मनीषा में अनेक महत्वपूर्ण उत्तर निहित हैं, दुनिया को अंतरराष्ट्रीय बहस में भारत की स्वाभाविक बौद्धिक नेतृत्व क्षमता के प्रति आश्वस्त करने की कोशिश करती थी । स्टॉक होम में में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन में अपने भाषण में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया । सम्राट अशोक ने वनडे, जीवों और जंगल के पेडों की रक्षा को राजा का कर्तव्य बताया था अथवा अथर्ववेद में किस प्रकार पृथ्वी के महत्वपूर्ण अवयवों के विनाश से बचने की सलाह दी गई थी । उन्होंने कहा था, साझी धरती का अर्थ साझा पर्यावरण और साथ ही मान्यता है न कि ये उनके बीच विभाजित है जो शर्त लगाते हैं तथा भेजो शर्तों से बंधे हैं क्योंकि पृथ्वी की सबसे बेहतर रूप में रक्षा व्यक्ति के परिष्करण से ही हो सकती है ताकि पृथ्वी का हर एक निवासी विचारशील व्यक्ति दया से उत प्रोत् बने । पश्चिम की जबरदस्त आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, अनीज एक और तो हमारी गरीबी का मखौल उडाते हैं । और दूसरी और वो अपने तौर तरीको को अपनाने के विरुद्ध हमें चेतावनी देते हैं । हम पर्यावरण का और अधिक छह नहीं होने देना चाहते हैं लेकिन हम अधिकतर संख्या में लोगों की भीषण गरीबी को भी एक्शन के लिए घूमना नहीं चाहते । विकसित देशों की पर्यावरणी समस्या अत्यधिक औद्योगीकरण का दुष्परिणाम नहीं है बल्कि उनसे अपूर्ण विकास की झलक मिलती है । क्या गरीबी और आवश्यकताएँ सबसे बडे प्रदूषक तब तो नहीं है? ये भाषण विद्वतापूर्ण और कटु आलोचना लिए था जिसमें पर्यावरण को बचाने के लिए सामान वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया था और गरीबी से संघर्ष को पहली बार पृथ्वी के संरक्षण से जोडा गया था । इससे गरीबी खत्म करने और पर्यावरण बचाने संबंधी प्रमुख बहसों की बुनियाद पडी जो जलवायु परिवर्तन के संबंध में विकसित हुई और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में आज भी प्रतिध्वनित होती हैं । मौनी मल्होत्रा कहते हैं, सौ खून का संबोधन ऐतिहासिक भाषण था । वे पर्यावरण और वन्य जीव के लिए चिंतित थी और पर्यावास ई मुद्दों की समझ के मामले में दूरदृष्टा थी । पर्यावरण संबंधी कानून, बांध परियोजना, प्राकृतिक अभ्यारण्य और वन्यजीव संरक्षण क्षेत्रों की स्थापना इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल की प्रमुख उपलब्धियां हैं । हालांकि इनमें से अनेक की बाद में आलोचना हुई क्योंकि इनमें भी घनघोर केंद्रीयकरण और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में सक्षम एजेंसियों और संस्थाओं का निर्माण किया गया था । उन्होंने केरल में साइलेंट वैली बांध परियोजना पर काम रुकवा दिया और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सलाह दी कि प्रत्येक बच्चे के जन्म पर एक पेड अवश्य लगाया जाए तो इस बात से बेहद चिंतित थी उनके बचपन में पी रहे सुरक्षित सम्बल और शांति दाता । वो हरे भरे मंदिर तेजी से लुप्त हो रहे थे और बहुत आवे जंगलों में जाकर देखा करती थी । जो लक्ष्य उन्होंने वहाँ देखे थे तो मौजूद थे अथवा नहीं । उन्हें कुत्ते भी अत्यंत प्रिय थे और वे हमेशा एक से अधिक कुत्ता पाल ले रखी थी । गांधी परिवार में कुत्तों की भीड होना सामान्य सी बात थी । नेहरू के घर तीनमूर्ति में पालतू वन्यजीवों में एक पांडा, बाघ के शावक पदकों के जोडे होते और मछलियां शामिल थे । वन्यजीव कानूनों की बदौलत इनमें से आने पशुओं को घर पर पालना आजकल गैरकानूनी घोषित हो चुका है । मेनका याद करती हैं, हम सभी के लिए कुछ न कुछ सिखाने वाली माँ थी । मैंने जो पहली पुस्तक लिखी तो पौधों और बच्चों से संबंधित थी और ये सब उन्होंने ही शुरू किया था । बी । जे । हमेशा कहती थी, तो मैं पता है कि कौन सा होता है और क्या करता है । उन्हें जो भी फूल भेंट किए जाते थे उन्होंने कभी भी फेंकती नहीं थी । हमेशा ये ध्यान रखती थी । उन्हें या तो गुलदानों में सजाया जाए अथवा अन्य लोगों में बांट दिया जाएगा । उन्होंने कुल्लू घाटी के बारे में लिखा था, कुल्लू घाटी उन लोगों को आकर्षित करें तो प्रकृति की सुंदरता को सराह सकें और उससे आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति प्राप्त कर सकें । मानवता स्वयं को प्राकृतिक परिवेश में तो होती जा रही है, क्योंकि अब सीधे प्रकृति से अपनी शक्ति प्राप्त नहीं करती है । न कर दें । वन्यजीवन तथा दलाओं का संरक्षण एक मत में समा है । उन्होंने दिल्ली अर्बन आठ कमीशन के समान है । बांध परियोजना पर भी ध्यान दिया क्योंकि ये भारत की सभ्यता और पर्यावरण संबंधी भारत की हाथ की रक्षा करने के उनके दृढ निश्चय में शामिल था । इंदिरा के लिए परिवार ही उनका स्वर्ग था । धवन याद करते हैं तो दोपहर का खाना खाने के लिए जब घर जाती थी, इस बारे में बहुत सकती कि वहाँ उनके परिवार के अलावा और कोई न हो । कर्तव्यकी उसी भावना के साथ जीती थी । जो उन्होंने सबसे पहले अपनी माँ के प्रति जताई थी । उनकी लगन से देखभाल और ससुरालियों से कमला की रक्षा करने में उन्हें परिस्थिति की कमान संभालने का अभ्यास था । जैसे परिवार का कोई मर्द मुख्य संभालता होगा । मात्र बयालीस साल की अल्पायु में पति को खो देने के कारण क्या उन्हें मर्द की भावना उपस् थिति का अभाव खटकता था? साल ये अफवाह उडी कि कालाकांकर के सुदर्शन राजा और उनके मंत्रिमंडल में मंत्री दिनेशसिंह उनके प्रेमी थे और वही उनकी सत्ता का संचालन करते थे । उनके ऊपर धीरेंद्र ब्रह्मचारी से उनकी युवावस्था में अंतरंग संबंधों के आरोप भी लगे थे । ये आरोप एम । ओ । मथाई से उनके प्रेम प्रसंग की अफवाहों के अतिरिक्त थे । नटवर सिंह कहते हैं, उनके लिए किसी से प्रेम संबंध बनाना संभव ही नहीं था । पलंग के नीचे भी सुरक्षाकर्मी घुसे रहते थे । उनके साथ अपनी कथित अंतरंगता की अफवाह तरह सर दिनेश सिंह ने खुद ही उडाई थी ताकि उन्हें उसका फायदा मिल सके । लेकिन मैं जल्द ही किनारे बैठा दिए गए । जाहिर है यहाँ कोई लकडी के तो बने नहीं होते, लेकिन आपको ऐसी ही कीमत चुकानी पडती है । आपकी निजी जिंदगी चौपट हो जाती है । उन्होंने अपनी सराहना क्या जाना तथा सुदर्शन, मजाकिया और समझदार लोगों द्वारा अपने पर ध्यान दिया जाना कुछ पसंद था । लेकिन उनका यौन पक्ष अविकसित था । उसके बाद उन्होंने कबूल किया था, मैं स्त्रियों की तरह व्यवहार नहीं करती । मेरे भीतर सेक्स की कमी आंशिक रूप में किसी प्रवर्ति की उपज है । मैं महसूस करती हूँ कि सेक्स की कमी के कारण ही और उसके साथ ही किसी इस तरी की चालाकी क्या भाव । इसके आधार पर अधिकतर लोग मेरे बारे में अपनी राय बनाते हैं । सेक्स का भाव पर आधी लुभाने वाली भूमिका से बनने की प्रवर्ति दरअसल मर्दाना अधिकारवादी के प्रति मनोगत विरोध की उपज थी । उन्होंने अपने पिता, पति तथा पुत्र के प्रति भले ही समर्पण किया हो लेकिन उनसे विद्रोह भी किया था अपने पिता की इच्छा के विपरीत फस के से पूर्णकालिक राजनीति में प्रवेश सांसद पति की लखनदीप अपनी बन्नेसिंह का अपने बेटे के विरूद्ध जाकर आपातकाल समाप्त कर देना । अक्सर जैसे प्रमुख सचिवों ने जब अपनी बुद्धि को उन पर हावी करना चाहा तो उन्होंने पलक झपकते उन्हें हटा दिया । अमेरिका के राष्ट्रपति उन्हें जब ये सोचा कि वे इस लडकी का फायदा उठा सकते थे तो उन्होंने उन्हें ना चढा दी थी । मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ । लगभग बारह वर्ष की उम्र तक मुझे तो लडके अथवा लडकी के बीच अंतर भी बाहर नहीं था । मैं अपने चचेरे तहेरे भाइयों के साथ पेडों पर चलते, पतंग उडाते और बिट्टू खेलते हुए बडी हुई थी लेकिन वो सामान्य अनुभव नहीं है । भारत में स्त्रियों पर इतना हावी होने, इतना अधिक दबाने और उनके साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति है । उनके प्रति इतनी अधिक अनावश्यक रूडका और अपमान प्रचलित है । उन्हें स्त्री होने की पीडा का अहसास था लेकिन अपने ऊपर उन्होंने ऐसा कभी नहीं होने दिया । घर में इलाहाबाद से मौजूद परिवार के पुराने परिचारक उन्हें हमेशा भैया जी संबोधित करते थे क्योंकि सबसे पहले पैदा हुए बच्चे को परंपरा के अनुसार हमेशा लडके की तरह सम्मान दिया जाता था । अपने पिता को लिखे अपने पत्रों में समापन हमेशा हिन्दू लिख कर करती थी । बच्चों में सबसे पहले पैदा हुई थी इसलिए पुरुष की तरह उनकी परवरिश हुई । ऐसी बेटी जिसे उनके पता नहीं छोटे से सैनिक लडकी की तरह पाला था, बचपन नहीं और फिर बालिग होने पर भी वो अपने आप को इस तरी की जगह पुरुष के समान ही समझती थी । इस तरीके भी डर छुपा पूरा ही उनके व्यक्तित्व में अक्सर जोर मारता दिखता था । अपने दादा मोतीलाल से अपनी तुलना करते हुए कभी उन्होंने कहा था वे अर्धनारीश्वर थे । पुरुष और स्त्री दोनों उनके व्यक्तित्व में समय है । खुद कोई स्त्रीवादी कहने से इनकार करती थी । लेकिन मैं किसी भी संबंध में अपने आप को दोयम दर्जे पर रखा जाना बर्दाश्त नहीं करती थी । जिन संबंधों में वे सबसे अधिक सहज रहती थी, इस संबंध वही थी जिनमें वे प्रभावशाली मात्र शक्ति होती थी । जैसे अपने बेटों और उनकी पत्नियों के साथ सोनिया को तैयार करते समय उन्हें भारतीय तौर तरीके दिखाते समय हिंदुस्तानी बोलना, समझौते समय उन्हें भले ही बिहार का परिश्रम करना पडा, लेकिन उसमें किसी नौसिखिए के संरक्षक की भूमिका भी शामिल थी । ऐसा संबंध तो सास और बहू के सत्ता संबंधी समीकरणों में आसानी से बैठ जाता था । इस बात को भी कभी नहीं भूली की वो कौन थी कि वह इंदिरा नेहरू गांधी थी और उनकी वंशावली ऐसी थी जो भारत की वंशावली से जुडी थी । जब आपको जिम्मेदार समझा जाए तो आप आसानी से प्रेम के बंधन के वशीभूत अथवा कमतर भागीदार नहीं हो पाते । मेनका गांधी याद करती हैं, वो परिवार के मुखिया थी, उसमें कतई शक नहीं था । प्रियंका कहती हैं, घर में सिर्फ उन्ही की चलती थी । पूर्वनिर्धारित भूमिकाओं में फंसी और उसकी छवि से उन्हें परेशानी होती थी । टैगोर कि चित्रांगदा उनसे उद्घृत करती थी मैं चित्र हूँ । मैं पूछने देवी भले ही ना हो नहीं सब की दया की पात्र हूँ जिसे लापरवाही से कीडे मकोडे की तरह एक तरफ छिडक दिया जायेगा । अपने जीवन के महान कर्तव्यों में भागीदार बनने का मुझे मौका दीजिए तभी आप मेरे असली व्यक्त तो से परिचित हो पाएंगे । उन्होंने कहा था मैं स्त्रियों की मुक्ति को वैसे ही महत्वपूर्ण मानती हूँ जैसे मुझे पुरुषों की मुक्ति अभिष्ट है । रूढिवादी विचारों और आदतों की तंगदिल परिस्थितियों से मुक्ति उनकी मान्यता थी । दूसरी विस्तृत मुद्दों में मुक्त हो और जिसकी अनेक दिलचस्पियां हो तो हमें मान बेहतर पत्नी और बेहतर मानसिक होती है । वो इस बात से चिंतित रहती थी कि उनके बेटों की परवरिश अत्यधिक विशेषाधिकारों और हकदारी के बीच हुई है और वो चाहती थी कि उनके बचपन की तरह वे भी रेलगाडी में तीसरे दर्जे के डिब्बों में यात्रा करेंगे । उसके बावजूद अंत में उनके आदर्शों पर माँ का महोल खाली हो गया और उन्होंने प्रधानमंत्रियों के घरों में उन्हें अवसर विशेषाधिकार पूर्ण परवरिश दिलाई बल्कि प्रधानमंत्री का अपना पद भी उनके हाथों में सौंपे जाने की राहत सुगम बनाई । उन्हें आजीवन इस बात का भरोसा रहा कि वे और उनका परिवार ही भारत में परिवर्तन के अग्रणी बहुत हैं, की वंशावली ही भारत को उसका आकार और भविष्य प्रदान करेगी । भारत के भाग्य में उनके परिवार का अंतर्निहित जुडा उनके लिए आजीवन प्रतिबद्धता और लक्ष्य बना रहा हूँ । उनका स्वाभाविक रुझान कलात्मक था । प्रकृति और संस्कृति के प्रति समर्पण । लेकिन इसके साथ ही मानो उन्होंने अपने पिता तथा अपने दादा से मौन प्रतिज्ञा की हो कि भारत का नेतृत्व करना तथा उनके परिवार नहीं । जिस तरह हमेशा भारत के लिए काम किया था और हमेशा करता रहेगा, उसी तरह ये उनका भी कर्तव्य था । लोगों और संबंधों की गहराई को वे पलक झपकते पडती थी । डॉक्टर माथुर याद करते हैं, उन्होंने एक बार ये इशारा किया की उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ दो ही शादियाँ कामयाब होती देखी थी । बीके नेहरू एवं गौरी नेहरू तथा राजीव एवं सोनिया उन्हें बंद लिफाफे में छिपा मजबून दाल लेने की अपनी योग्यता पर गर्म था । हमें भारत में पैनी नजर रखने के प्रति उत्साहित किया जाता है । लेकिन मैंने इस प्रवृत्ति को स्विट्जरलैंड में अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान सीखा था । तात्कालिक परिस्थितियों में उनकी पैनी नजर दूसरों से पहले ही आदत को तार जाती थी । बावजूद इसके वे छितिज पर दृष्टिपात में नाकाम रही तो सीमा रेखा के बार देखने में जहाँ वर्तमान समाप्त और भविष्य आरंभ होता था क्योंकि वो दुर्भाग्य से अपनी तात्कालिक वास्तविकताओं के प्रति चौकन्नी बनी रहती है । प्रियंका कहती हैं, उनका सबसे महत्वपूर्ण गुण साहस था । वे असाधारण रूप में साहसी थी और सत्ता के प्रयोग में कतई है शक्ति नहीं थी । उन्होंने सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझा और उसका प्रयोग किया । सोनिया गांधी के विपरीत जो स्वयं को सत्ता का रखवाला समझती है और उसके प्रयोग नहीं हो सकती हैं, उनकी पुण्यतिथि भर दो हजार सोलह में राहुल गांधी ने फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में लिखा है, मेरी जानकारी में मेरी दादी सबसे बहादुर इस तरह उनके सभी जीवनी ले होने, उनके किवदंतियों जैसे साहस, अप्रतिम हिम्मत और जबरदस्त नायक को इंगित किया । उनकी फुफेरी बहन तथा कट्टर आलोचक नयनतारा सहगल स्वीकार करती हैं । बंगलादेश में दखल उनका सबसे श्रेष्ठ काल था । इतिहास में वो सबसे सफल सैन्य दखल था । लेकिन भारत ने ऐसे विशाल स्तर पर मानवीय संकट से भी धैर्य और साहस पूर्वक निपटने में सफलता पाई जैसा दुनिया में कभी नहीं देखा गया था । सिंडीकेट से सिंह भिडाने पाकिस्तान पर सैन्य विजय हासिल करने, आपातकालकी आंधियों से निपटने और अंत में भारत की एकता के लिए सबसे निर्णायक हमला करने से होता है कि इंदिरा जोखिम उठाने के मामले में सचमुच बेहद कडे दिल की थी । फिर उनके परिणाम भले ही कितनी ही घातक निकले, स्वाभाविक दुर्दम ने । साहस उनकी विशेषता थी और उन्होंने जब गलतियाँ की तो वह भी पूरी धमक और तो साहसी रवैये से की । दुख में वो दक्ष और दार्शनिक थी और कर्तव्य अहम जिम्मेदारी की गहरी भावना से उत् प्रोप थी । विश्व संस्कृति, सामाजिक महिला होने के साथ ही सडक पर मुकाबले में महिल राजनेता खूबसूरती से समझ नहीं । आकर्षण मेहमाननवाज, सन्यास पद रूप में परपीडा कुप्प षड्यंत्रकारी तो देशभक्ति पता बेहद दोषपूर्ण लोकतांत्रिक शख्सियत थी । नटवर कहते हैं, जब कमरे में आती तो ऐसा लगता मानो बिजली कडक गई हो । सबकी निगाहें उन्हीं पर थम जाती है । सब की निगाहें हमेशा उन्हीं पर लगी रहती थी । वैश्विक नेताओं के मध्य भी । बावजूद इसके अत्यधिक फिर शादी थी । उनसे लोग बेहद चलते थे । तली कहते हैं, मैं उन्हें लौह महिला के रूप में नहीं आता । मैं उन्हें द्वैत की शिकार महिला समझता हूँ, जो निर्णय करने में इतनी देर लगा देती थी । कि परिस्थितियां उनके हाथ से निकल जाती थी कि उन्हें कई गुना अधिक भरपाई करनी पडती थी और कडे उपाय अपनाने पडते थे । इसके कारण सत्ता उनकी हर अवधि की त्रासदीपूर्ण समाप्ति हुई है । चाहे वो कांग्रेस में दो फाड करना हो, आपातकाल हो अथवा ऑपरेशन ब्लूस्टार हो या फिर बारह को बर्खास्त करना हो । तली आगे कहते हैं कि वे समझने में नाकाम रही कि भारत पर तभी सर्वश्रेष्ठ रूप में शासन किया जा सकता था जब उसे पूरी तरह कार्यरत लोकतांत्रिक संस्थानों पर आधारित लोकतंत्र के रूप में चलाया जाए । उन्हें शायद अपनी शक्ति का ही भाग और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम करने का एहसास नहीं था । यदि भी अपनी ही शक्ति का एहसास कर लेती है तो वे महान महिला नेता का दर्जा पापा लेकिन भलाई करने की अपनी शक्ति का वो अहसास नहीं कर पाए । उन्होंने सिर्फ सत्तारूढ रहने के लिए ही अपनी शक्ति का प्रयोग किया । वजाहत हबीबुल्लाह कहते हैं, तो भारत के सभी प्रधानमंत्रियों में सबसे महान्ति । वैसे संकटकाल में भारत की प्रधानमंत्री थी । भारत की एकता खतरे में थी । उन के हाथ में नेतृत्व होने के कारण ही देश अखंड रह पाया और अपेक्षा का स्थिर भी रहा । वे अपने पिता और पति की तरह लोकतांत्रिक नहीं थी, बल्कि बहुत लोकतंत्र को अपने मिशन की बाधा समझती थी । उसके बावजूद भारत की कट्टर संरक्षण देश की सीमाओं और संप्रभुता की अपने प्राणों के बलिदान तक सुरक्षित रही । इंदिरा के सार्वजनिक जीवन को दो भिन्न चरणों में बांटा जा सकता है । पहला चरण से उन्नीस सौ चौहत्तर तक रहा । इसमें भारत में जनता का ऐसा नेता उभरा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था । आत्मविश्वास से लबरेज युवा इस तरी जिसने देश को चमकदार आत्मनिर्भरता और संप्रभुता की डुगडुगी बजाने लायक बनाया । इसके बाद उन्नीस सौ से उन्नीस सौ चौरासी का काम है, जिसमें वे निष्ठुर सत्ता लो लोग राजनेता के रूप में सामने आएंगे, जिसने अपने पिता के आदर्शों को अंगूठा दिखाया और विकेंद्रीकरण के लिए आतुर देश पर केंद्रीकृत व्यवस्था थोपने की जी तोड कोशिश की, लेकिन उन्हें पारिवारिक दायित्व की मर्यादा भी रखनी थी । उन्हें मिशन पूरा करना था । नेहरू की बेटी को ऊंचे पहाड से रपट कर नीचे आना था और कुशलतापूर्वक और सवारी करने थी । शक्तिशाली तैराक होना था है । दीवान धावत बनना था और स्पोर्ट में पढना था । हमेशा चुस्त दुरुस्त रहना था कि शासन करना था और सर्वश्रेष्ठ पुस्तकें पढनी थी तो कहने के लिए समर्थ होना चाहती थी कि पापु देखिए आपने जो काम किया वो व्यस्त नहीं गया । भारत ने नाम कमा लिया । भारत अपने पैरों पर खडा हो गया और उसी तरह इंदिरा भी । इंदिरा इंडिया भारत कठिनाई से जीत गए, अपना ध्यान रख पाए, दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाए और अपने दुश्मनों की आंख में आंख डालकर उनका सामना कर पाए । उन्होंने आजीवन भले ही अपने पिता की मासूमियत बार कितना कडा रोष जताया हो और उनके आदर्शों से विश्वासघात किया हो फिर भी मैं उनके अनुमोदन की आकांक्षी रही । अंत में उन्होंने अपने पिता तथा देश के अभिवादन की आकांक्षा की भारत को वो कम से कम इतना आगे तो ला पाएंगे मानो कहना चाहती हूँ पापु देखो मैंने ये कर लिया है । इंदिरा इंडिया भारत ने ये हासिल कर लिया है । प्रिया श्रीमती गांधी ये पत्र क्यों कि सारे प्रश्न किस लिए? आपके जीवन और विरासत की ये जांच पडताल क्यूँ? आप सादा थी मगर पेचीदा भी कडक मगर भंगुर भी न्यारी राजसी और अहंकारी लेकिन गर्मजोश परिचित और गहन अंतरंगता से ओतप्रोत की आप एकाकी आत्मा थी जो उत्सव प्रेमी थी अकेली जिसने मित्रों, रिश्तेदारों और संपर्कों की विशाल श्रृंखला बनाने के लिए संबंधों को पाला पोसा संवेदनशील लेकिन उदार नहीं गरीबों की मसीहा मगर मोतीलाल की तरह बडे दिल वाली नहीं । सार्वजनिक रूप में आप किस तरी से कहीं बढ चढकर थी मगर पोषणीय जनाना बाल पर शायद ही घर में । हालांकि आप निश्चित ही समर्पित माता एवं दादी थी आप राजनीति में पुरुष और घर पर स्थिति थी । ऐसी अख्खड राजनीतिक योद्धा जिससे घरेलु साथ सजा में दिलचस्पी थी । प्रधान सेनापति जिसे मेहमान नवाजी में आनंद आता था, आपके भीतर लाहौर संकल्पशील ता थी जिसमें आपके उथल पुथल भरे जीवन में आपकी रक्षा की आप हमेशा शिष्ट थी फिर भी आपने अधिकतर से दूरी का निर्वाह किया । आपको रोमांच से गहरा लगाव था और ऐसी खुरदुरी आत्मा जिसने कभी हार नहीं स्वीकारी । फिर भी आप अपने आवरण में छुपकर शंकालु एम डरपोक भी बन जाती थी । आपने दौडो की नार्मन को लिखा था । अधिकतर लोग क्या भी व्यक्तिवादी ही नहीं बल्कि अनेक व्यक्तिवादी नहीं होते । मैं सोचती हूँ कि मैं ही हूँ लेकिन अभी तक मैं ये नहीं समझ पाई कि उन्हें दुनिया के सामने कैसे पेश करो । अलग अलग लोग मुझे अलग अलग रूप में देखते हैं । मैंने आपको सिर्फ एक ही बार देखा था जब मैं सत्रह वर्ष पूरा करने के दौरान स्कूल में पढती थी तब हम तत्कालीन मेरा नंबर कलकत्ता हवाई अड्डे पर थे । खाली हॉल, दूधिया बत्तियों से नीचे मैली कुचली प्लास्टिक की कुर्सियों पर बिगडती रोशनी के बीच आप सत्ताच्युत हो चुकी थी और तब प्रधानमंत्री नहीं थी । मुझे याद है छरहरी एकाकी कटे बालों वाली साडी पहने महिला दूर से अपने किसी साथी के साथ अंदर जाती देखें और अन्य यात्रियों से थोडे फांसले से वो कुर्सी पर बैठ गई । वहाँ कानाफूसी होने लगी । वो इंदिरा गांधी है ना, आप एकदम अकेली थी । आप की अगवानी करने वाला कोई नहीं आया था । ज्यादातर लोग आपको नहीं पहचानने का ढोंग कर रहे थे अथवा चाये बेहद डरे हुए थे । कुछ लोग तो वहाँ से हट भी गए थे । मुझे इस सीधी सादी महिला तथा मैंने तस्वीरों में जिस महान प्रधानमंत्री को देखा था, उन के बीच में अंतर देखकर झटका लगा । मैं आप से मिलने के लिए सडक रही थी और ऑटोग्राफ लेने के लिए आपकी और लडकी क्योंकि सब सेल्फी नहीं ऑटोग्राफी ले सकते थे । पिछले देने से आपने मना कर दिया । आपने पट्टी बांधी, अपनी उंगली दिखाई और उदास आवाज में कहा, क्या आपको उंगली में चोट लगी होने के कारण लिख नहीं पाने का सोच है? मैं जाने के लिए जैसे ही मुडी मुझे अच्छे से याद है आपकी वक्त दूर तक भेजती । गहरी नजर आपने मुझ पर डाली थी पानी ये कहने के लिए की हाँ मैं इंदिरा गांधी हूँ, वही प्रधानमंत्री हूँ तुम ने जैसे कभी अखबारों के पन्नों पर देखा था मुझे भूलो मत । मुझे याद रखो मेरे दिमाग में तभी स्कूल की कविता कौन गई? मेरा नाम और जी मंदिर है राजाओं का राजा मेरे पराक्रमों पर लगा डालो कितने शक्तिशाली थे और कुछ हो शक्तिशाली सम्राट अचानक कंकाल बना अबूझ रेगिस्तान में सहित में सिर्फ दवाई पडा । हवाई अड्डे पर अकेला आरक्षित और भी पहचान पत्र आपके हमेशा साथ ही रहे । आपके पिता ने आपके जीवन में अपनी उपस्थिति को बौद्धिक रूप में झंकृत करने वाले शिक्षात्मक पत्रों के माध्यम से सजीव बनाए रखा । आपने आपने तथा दौर उसी नॉर्मन और फॅमिली के नेहरू को लिखे पत्रों में अपनी भावनाओं को ढाई लाख अपने बेटों को अपने नियमित पत्र लिखें । अपने पिता की सही शैली में ना सही मगर समर्पित माँ की अंतरंगता और प्रत्यक्षत आके मिश्रण सहित पत्र । दरअसल आपके लिए आत्माभिव्यक्ति का साधन थे पत्र क्योंकि ईमेल अथवा लिखित मैसेज नहीं है । उन्हें विचारपूर्ण अभिवादनों सहित और ऐसे समापन के साथ लिखा जाता है जिन पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाता है । पत्र लेखन वाले काल में प्राप्त करता को शिष्टता से संबोधित किया जाता था और उस से संबोधित करने की उचित शैली भी सोच समझकर तय की जाती थी । आपके पत्रों में बहुत ऐसे विषयों संबंधी बातचीत होती थी तो पुराने मित्रों के बीच भी मौखिक रूप में उद्घृत करने वाले कठिन थे । आप के भीतर ऐसा लगता है कि नेहरू की तरह मुख्यमंत्रियों के साथ किसी सार्वजनिक मकसद के लिए पत्रों के प्रयोग की क्षमता अथवा इच्छा नहीं थी । नहीं खुले आम अपनी आत्मालोचना करने की, क्योंकि आप सोच ऍम संयुक्त थी । फिर भी आपके पत्र आत्मविश्लेषण के दस्तावेज थे । आत्मचेतना की झलकियां मित्रों के साथ बातचीत, जिसमें आपकी समझदारी की अलिखित याचना अंतर नहीं थी । इतिहास से अपना पल्लू बन्दे होने की चेतना के कारण आपने अपने पत्रों को आने वाली पीढियों के लिए छोडा था और इस प्रकार आप भी पत्र में स्त्री बनी रहेंगी । ऐसे युग से जब राजनीति में हो तो होती थी मगर कलाकार नहीं । जब राजनीतिक विरोधियों को भी आपसी शिष्टाचार निभाने की फुर्सत मिल जाती थी, दुश्मन भी एक दूसरे की इज्जत करते थे । जब आपातकाल की घोषणा भी चोरी छुपे थोपने के बजाय पारदर्शी प्रक्रिया से की गई थी । आप अपने पिता के सपनों का भारत नहीं बना पाए । आपने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक दशक तक फसाए रखा । ऐसी राजनीतिक संस्कृति अपनी पीछे छोडी जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को तहस नहस कर दिया और लोगों के बीच से अपनी पार्टी की जडें उखाडने की । फिर भी आपने भारतीय नागरिकों के मन में ऐसे नेतृत्व की छाप छोडी तो देश और विदेश दोनों में ही अप्रतिम राजनेता कितने साल बनी और अद्वितीय साहस जिसमें कार्यशैली तथा दैदीप्यमान करिश्में से युक्त नेता भी था सप्ताह आपकी मंजिल थी सप्ताह जिससे आप अपने दुखों पर बाहर रखती थी सत्ता जो आपको अपने पिता के सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य देगी । सपना है आपके विरोधियों को भर सकता और आपके वोटरों को संबोधित कर देगी । प्रधानमंत्री के रूप में आपकी पहली अमेरिकी यात्रा के मौके पर लाइफ पत्रिका ने आपका इंटरव्यू छपा जिसमें आप ऐसा कह रही थी कि आपको मादाम प्राइम मिनिस्टर यानि सम्मान ईशरी प्रधानमंत्री के रूप में संबोधित करना ना पसंद था । राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन नहीं आपका इंटरव्यू पढकर भारतीय राजदूत से पूछते हुए संदेश भेजा, आप कैसे संबोधित होना पसंद करेंगी? आपका उत्तर आपकी स्वाभाविक इंदिरा गांधी शैली में ही था । अपने राजदूत से कहा, आप राष्ट्रपति से कह सकते हैं कि मेरे मंत्रिमंडल के साथ ही मुझे सर यानी श्रीमान संबोधित करते हैं । चाहे तो भी करें । इसीलिए शायद मुझे भी आपको वही कहकर संबोधित करना चाहिए । मैंने उतने सारे वर्ष पूर्व दूधिया रोशनी में नहाए कलकत्ता हवाई अड्डे पर आपसे ऑटोग्राफ माना था । इंदिरा गांधी प्राइम मिनिस्टर सर श्रीमान प्रधानमंत्री

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इंदिरा गांधी को बड़े प्यार से लोग दुर्गा के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने भारत को सदियों में पहली बार निर्णायक जीत हासिल कराई और धौंस दिखाने वाली अमेरिकी सत्ता के आगे साहस के साथ अड़ी रहीं। वहीं, उन्हें एक खौफनाक तानाशाह के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने आपातकाल थोपा और अपनी पार्टी से लेकर अदालतों तक, संस्थानों को कमजोर किया। कई उन्हें आज के लोकतंत्र में मौजूद समस्याओं का स्रोत भी मानते हैं। उन्हें किसी भी विचार से देखें, नेताओं के लिए वे एक मजबूत राजनेता की परिभाषा के रूप में सामने आती हैं। अपनी इस संवेदनशील जीवनी में पत्रकार सागरिका घोष ने न सिर्फ एक लौह महिला और एक राजनेता की जिंदगी को सामने रखा है, बल्कि वे उन्हें एक जीती-जागती इंसान के रूप में भी पेश करती हैं। इंदिरा गांधी के बारे में पढ़ने के लिए यह अकेली किताब काफी है। writer: सागरिका घोष Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Sagarika Ghose
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