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अम्मा: जयललिता - 16 (घायल बाघिन)

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तमिल फिल्मों की ग्लैमर गर्ल से लेकर सियासत की सरताज बनने तक जयललिता की कहानी एक महिला की ऐसी नाटकीय कहानी है जो अपमान, कैद और राजनीतिक पराजयों से उबर कर बार-बार उठ खड़ी होती है और मर्दों के दबदबे वाली तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देते हुए चार बार राज्य की मुख्यमंत्री बनती है| writer: वासंती Voiceover Artist : RJ Manish Script Writer : Vaasanti
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वो घायल पाकिर जेल से रिहा होने के बाद जयललिता अगले नौ महीनों तक एक तरह से एकांत पास में नहीं किसी अपराधबोध क्या शर्मिंदगी के कारण नहीं । मैं घायल भाग्य की तरह थी जिसके गुस्से को नियंत्रित नहीं रखा जा सकता था तो उसे अपना अधिकार लेकर रहना था । अपने खुद के अस्तित्व के लिए उन्हें पार्टी को बचाना था जो निष्क्रिय हो चुकी दिख रही थी । जब पहनना इस तरह से पार्टी कार्यालय में उपस्थित हुई तो कार्यकर्ताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था । उनके कानून हाथों या कल ही में कोई आभूषण नहीं था । उन्होंने पोशाक के ऊपर रहने वाला लगता भी हटा दिया था । कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा, मैं अब भी राजनीति में हूँ क्योंकि मैं नहीं जाती की इतिहास यह दर्ज हो कि अन्नाद्रमुक पार्टी जैसे एमजीआर ने करुणानिधि के विरोध में बनाया था । करुणानिधि के हाथों समाप्त हो गई । उनकी बातों ने समर्थकों को रुला दिया था । पार्टी उनके बिना नहीं चल सकती थी और इसी में जयललिता की ताकत है क्या दिखाना भी जरूरी था कि वो अब भी निर्विवाद नेता है जैसे पार्टी के भीतर कोई चुनौती नहीं दे सकता । यह दिल्ली के राजनीतिक माहौल में बदलाव था जिसने जयललिता को एक बार फिर सक्रिय कर दिया । नवंबर बाॅम्बे में जारी हुई चयन आयोग की रिपोर्ट ने डीएमके को एक बडा झटका दिया जो उस समय केंद्र की आई के गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकार की सहयोगी ही नहीं बल्कि मंत्रिमंडल का भी हिस्सा थी । राजीव गांधी हत्याकांड के व्यापक परिदृश्य की पडताल करने वाले आयोग ने डीएमके का खास तौर पर से जैन आयोग की रिपोर्ट में करुणानिधि और उनकी पार्टी को राजीव गांधी के हत्यारों को बढावा देने का दोषी करार दिया । अब संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस पार्टी ने कुछ साल मंत्रिमंडल से टीएमके को हटाए जाने की मांग की । ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस लेने की चेतावनी दी थी । करुणानिधि झुकने को तैयार नहीं हुए क्योंकि कांग्रेस की धमकी पर स्वयं ही मंत्रियों को निकाल लेने से यह संदेश जाता की उन्होंने चयन आयोग के निष्कर्ष को स्वीकार कर लिया है । जब कांग्रेस ने अल्टीमेटम जारी कर दिया तो गुजराल ने डीएमके मंत्रियों के इस्तीफे का चार दिनों तक इंतजार किया लेकिन जब ऐसा हुआ नहीं तो उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया । देश अब मध्यावधि चुनाव की ओर अग्रसर था । जयललिता ने चलती ही हिसाब किताब बिठा लिया कि कांग्रेस जहाँ अपनी खोई ताकत अब भी हासिल नहीं कर पाई है, वहीं भारतीय जनता पार्टी अभूतपूर्व ताकत के साथ उभरते दिखा रही है । उन्होंने ऐसे मैं हल्का पानी से गुपचुप भेड कर भाजपा के साथ गठबंधन किया, जो द्रविड राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत थी । उन्होंने महसूस किया कि एक ऐसे राष्ट्रीय तल से हाथ फैलाना जरूरी है जिसके दिल्ली में सरकार बनाने के अच्छे आसार हो । भाजपा को लोकसभा में सशक्त समर्थन देकर बहन मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों में अपने मंत्री बैठा सकती थी, जो उन्हें भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों से बाहर निकालने में सहायक होते हैं । अगर तहत भाग्यशाली रही तो केंद्रीय नेतृत्व को तमिलनाडू की डीएमके सरकार को गिराने के लिए भी राजी कर पाएगी और इस तरह उनकी वापसी का रास्ता साफ हो सकेगा । जयललिता की राजनीति थी पूरी ताकत के साथ चुनाव प्रचार करना, खुद को ऐसी महिला के रूप में प्रदर्शित करना जैसे करुणानिधि ने झूठे आरोपों में फंसाया है, जिसमें उन्हें आम अपराधियों की तरह अठ्ठाइस दिनों के लिए जेल में रहने को मजबूर किया । ऐसे उन्हें लोगों की सहानुभूति मिलने की संभावना थी । उनके अभियान में केंद्र में एक स्थिर सरकार की जरूरत पर भी बल दिया गया । चुनाव के ठीक पहले एक और घटना हुई जिसमें जयललिता को फायदा पहुंचाया । चौदह फरवरी उन्नीस सौ को जिस दिन भाजपा नेता एलके आडवाणी को कोयंबटूर में एक चुनावी सामान संबोधित करनी थी, वहाँ कुल तेरह जगहों पर हम धमाके हुए जिनमें कम से कम पचास लोग मारे गए । अपनी सभा के समय में एक बदलाव के कारण आठवाणी सुरक्षित रहे । बम धमाकों ने डीएमके को हिला दिया और करुणानिधि को परेशान कर दिया क्योंकि पूर्व चेतावनी पर ध्यान नहीं देने को लेकर उनकी ओर उंगलियां उठाई थी । दरअसल जब दिसंबर उन्नीस सौ बानबे में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, उसके बाद से कोयंबटूर में अल उम्मा नामक सांप्रदायिक संगठन अपनी जडे जमा रहा था । करुणानिधि रहे इस संगठन के समर्थकों और पुलिस के बीच आए दिन होने वाली झडपों पर ध्यान नहीं दिया था । जयललिता शहर तक शहर घूमकर करुणानिधि पर आरोप लगाती रही । करुणानिधि सरकार ने तमिलनाडु को जो उनके कार्यकाल में शांति का उपमा था, चरमपंथियों के लिए सुरक्षित सैरगाह और निर्दोष आम जनों के लिए असुरक्षित स्थान में बदल दिया है । संसदीय चुनाव में डीएमके घर छोडकर सूपडा साफ हो गया जबकि जयललिता के नेतृत्व वाले गठबंधन को तीस सीटों पर सफलता मिले जिनमें से अठारह अकेले अन्नाद्रमुक ने जीती थी । जनता मानो खुल चुकी थी कि उसने दो साल पहले जयललिता का पूरियाँ बिस्तर बनवाया था । जयललिता खुश थे । एक बार फिर उनमें ताकत आ चुकी थी । भाजपा जिससे स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया था, सत्ता में बने रहने के लिए उनके अठारह सांसदों पर निर्भर थी । यह सौदेबाजी का बढिया अवसर था जो उनके एकसूत्र एजेंडे राज्य में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के बहाने डीएमके सरकार की बर्खास्तगी जो पूरा कर सकता था । जयललिता ने जब केंद्र की भाजपानीत सरकार को बिना शर्त समर्थन दिया था तो उन्हें साहब तौर पर उम्मीद है कि उन्हें अहम सहयोगी की मान्यता देने के लिए प्रधानमंत्री तुरंत टीएमके सरकार को बर्खास्त कर देंगे । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बारह महीनों तक उनके साथ शाही बर्ताव किया । उन्होंने उनके हित में अपना मंत्री चुनने और विभाग बांटने का विशेषाधिकार छोड दिया । वाजपेयी ने वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी संबंधी उनकी बातें भी मानी । लेकिन करुणानिधि की निर्वाचित सरकार को देखिए हटाया जयललिता ने ताकि मंत्रियों रामकृष्ण हेगडे, बूटा सिंह और राम जेठमलानी को हटाए जाने की मांग की । बूटा सिंह को तो हटा दिया गया लेकिन बाकी को पद पर बने रहने दिया गया । जब उन्होंने रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के नौसेना प्रमुख एडमिरल पृष्ठों भागवत को हटाने के आदेश पर आपत्ति जताई तो संघ परिवार ने खूब हो हल्ला मचाया कि जयललिता लक्ष्मण रेखा लांघ रही है । जयललिता ने जॉर्ज फर्नांडिस को बर्खास्त किए जाने की मांग की । ऐसा लग रहा था कि वह करुणानिधि को दिखाना चाहती थी कि वह केंद्र में कितनी ताकतवर हैं । जयललिता पहुंच जल्दबाजी में दिख रही है । उन्होंने अपने खिलाफ मामले देखा ही विशेष अदालतों की वैधता को चुनौती थी । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालतों को काम करने की अनुमति दे दी । अब मुकदमे चलती ही शुरू होने वाले थे और भले ही उनके वकील दावा कर रहे हो कि वह बिलकुल पाकसाफ साबित होंगी, लेकिन खुद जयललिता को डर था कि डीएमके कोई न कोई चाल चलकर उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकती है । ऐसे में दिल्ली पहुंचे हाँ, संयोग से चाय पार्टी में गई जहां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत सभी बडे कांग्रेसी नेता मौजूद थे या केंद्र की भाजपा सरकार के लिए ब्लैक मेल संदेश की तरह था कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गई तो वह पाला भी बदल सकती हैं और जो लास्ट भी था बहन हो गया । माना जाता है कि भाजपा फर्नांडिस की बर्खास्तगी की मांग मानने को तैयार नहीं हुई और अपनी मांग नहीं माने जाने के आधार पर जयललिता ने में केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और इसके बाद अविश्वास प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में नाटकीय रूप से मात्र एक मत से पीछे रह जाने वाली सरकार गिर गए । कांग्रेस ने ये कहते हुए सरकार गठित करने का एक टाइम इयर प्रयास किया कि उसके पास पर्याप्त संख्या में सांसद है लेकिन इस बारे में मैं प्रमाण नहीं दे पाएँ । नए चुनावों की घोषणा कर दी गई लेकिन भाजपानीत सरकार को एक कार्यवाहक सरकार के रूप में बने रहने दिया गया जैसे कारगिल युद्ध से भी निपटना पडा । जयललिता के लिए यह एक हार थी लेकिन उन्होंने इसपर कोई खेद नहीं जताया । उनके इस व्यवहार से उनके दुश्मनों की स्थिति मजबूत हुई । यह सब उन्नीस सौ निन्यानवे में हुआ था । डीएमके के स्वर्ण जयंती वर्ष में विडंबना ही कही जाएगी कि इसी वर्ष पार्टी को एक बडा नीतिगत फैसला लेना पडा हूँ जो उसकी विचारधारा के खिलाफ गया । करुणानिधि ने तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम पर विचार करने के लिए पार्टी के कार्यकारी परिषद की बैठक बुलाई । परिषद एकमत थे की पार्टी की सर्वोच्च प्राथमिकता जयललिता के खतरे को रोकना है । डीएमके राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच ऐतिहासिक पैनस जनता के बावजूद डीएमके के कार्यकारी परिषद ने भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया । जैन आयोग की रिपोर्ट के बाद से सोनिया गांधी डीएमके से दूरी बनाए रखने की नीति पर चल रहे थे । भाजपा आपातकाल के दिनों से ही करुणानिधि के मित्र रहे थे और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण उन्होंने डीएमके सरकार को बर्खास्त करने के जयललिता के आग्रह को नहीं माना था । इसलिए आगामी चुनाव में डीएमके भाजपा के साथ होने का सोचा समझा फैसला कर सकती थी । जयललिता यह अनुमान नहीं लगाई थी कि उन्हें खत्म करने के लिए डीएमके इतना आगे तक जा सकती है ।

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तमिल फिल्मों की ग्लैमर गर्ल से लेकर सियासत की सरताज बनने तक जयललिता की कहानी एक महिला की ऐसी नाटकीय कहानी है जो अपमान, कैद और राजनीतिक पराजयों से उबर कर बार-बार उठ खड़ी होती है और मर्दों के दबदबे वाली तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देते हुए चार बार राज्य की मुख्यमंत्री बनती है| writer: वासंती Voiceover Artist : RJ Manish Script Writer : Vaasanti
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