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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 4

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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चार रेंगने उसे बताया था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा का जमाना सत्तर के दशक के आखिरी सालों में लग गया था और मैनेजमेंट ट्रेनी प्रोग्राम भी । अस्सी के दशक में देव खत्म हो गए थे । ये नब्बे वाले साल थे और इन दिनों समूचे देश में बदलाव के जुनून के बाल भले फट रहे थे, रहेंगी के पिता हाल ही में कॉनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज के सेमिनार में राजनीति और उद्योग के दिग्गजों को सुन कर लौटे थे । नए प्रधानमंत्री क्या ख्यालात पिछले प्रधानमंत्रियों से अंगदादि वो चाहते थे कि अर्थव्यवस्था में उदारीकरण हूँ, सेवा क्षेत्र पर होने वाले सरकारी भारी भरकम खर्चे कम हो और भारतीय बाजार में बडे खिलाडियों को उतरने के मौके दिए जाएं । यानी हवाई थी कि अब उदारीकरण होगा, क्रोध होगी और कॉरपोरेट व्यवस्था को बढने का मौका दिया जाएगा । रहेंगी ने बताया की खुद बिजनेस में होने के बावजूद उसके पिता ने तय किया था कि उनका बेटा पहले एमबीए की डिग्री हासिल करेगा और फिर बिजनेस में उतरेगा । यही अब सफलता का रास्ता है । उन्होंने जोर देकर कहा था और से अलग अलग बिजनेस मैनेजमेंट संस्थानों में दाखिले के लिए तैयारी करने को कहा । रेंगी ने डैनी को बताया था कि एनडीए वालों की मांग इस कदर थी उन्हें महीने के बीस तीस हजार आसानी से मिल जाते थे और हॉर्स अलग से मिलते थे, बॉक्स में होते हैं । डैनी ने अचकचाकर पूछ डाला डैडी कहते हैं बॉक्स माने अपने सारे खर्चे कंपनी से वसूलना जिसे आप होटल दिखाएँ । बिल कंपनी देगी । सिनेमा देखें बिल कंपनी के माथे यानी ऐसे ही सब पहले से एंटरटेनमेंट अलाउंस कहा जाता था तो कुछ एक लोगों को ही नसीब था और अब हर किसी को मिलते थे । दोनों ने पूरी दोपहर एनडीए वालों के पास पर बता डाला । रेंगी को कुछ कुछ जानकारी तो थी और वो अपने दोस्त को जताना चाहता था जिसे कंपनी जॉब के बारे में सारी मालूमात है । उसने अपने पैदा का एम । बी । ए । के बारे में एक लाख सुन रखा था और उसी की बिना पर अपनी पतंग को ढील दे देकर उडाता गया था । दैनिक हाथ में हूँ टीचर की की सनसनाहट में मस्त हो गया था । पास के आकाश में गोते लगा रहे थे । मालूम नहीं मेरी दूर के रिश्ते की बहन टट्टी में काम करती है । बताती है कि उसके शैम्पू का खर्चा भी उसकी कंपनी देती है । यानी खाना भी कंपनी के सिर्फ और नहाना भी डैनी ने ढाका लगाया था । आॅटो हर महीने शैम्पू की दो बोतलें खरीदती है । इम्पोर्टेन्ट वाली खुद इस्तेमाल करती है और दूसरी माँ को भेज देती है । उसने शैम्पू का नाम भी बताया था । ऍम ऐसा कुछ था, हद है या दैनिक नाक सिकोडते हुए कहा था अरे नहीं और सुनो । वो हर महीने काजू बादाम कंपनी के खर्चे पर खरीदती है, अपने भाई बहनों को भेज देती है और अपने आप के लिए हर छह महीने पर एक फ्रेश एयर भी भेज देती है । वो महंगी वाली इसके ऊपर लकडी का टक्कर होता है । एक से ज्यादा खरीद नहीं सकती क्योंकि अभी शादी नहीं हुई है । ऑपरेशन को कैसे जस्टिफाई करेगी बेचारी ऍफ का लगाते हैं । अपनी चांग पर हाथ मारा तो मेरे से कैसे मिलता है? रेल नीतियां प्रशित है और बिल पर परफ्यूम लिखवाती है । दोनों उसके शातिर तरीके पर खूब देर तक हस्ते रहे थे । जितनी बातें करते गए उतना ही उनका यकीन पुख्ता होता गया की अगर वो इस एनडीए नाम की नैया पर सवार हो लें । उनकी सारी जिंदगी बिना कुछ खर्च किए ऐशो आराम से गुजरेगी । एक बार एमबीए की डिग्री मिल गई तो हमें बस स्वास्थ देखना होगा और एक महंगा चमडे का ब्रीफकेस लेकर पहला होगा । बढिया से बढिया होटलों में लोगों के साथ लंच उडाएंगे फिर कॉकटेल के बाद डिनर एनडीए वाले और करते ही क्या है? मौज उडाते हैं रहेंगी की आंखों में कई सितारे और एक आप शाम चमकने लगा था । उसकी जिंदगी का मकसद अब तय हो चुका था और दोनों मैनेजमेंट संस्थानों के एंट्रेंस की तैयारी से जुडी बारीकियां जुटाने में लग गए । कॉलेज के बाद ऍम पूरे दम हमसे लग गए । दैनिक जीवन शानदार थी रहेंगी की अंग्रेजी अच्छी थी । साथ मिलकर पढना दोनों के लिए फायदे का सौदा था । ये तो वही बात हो गई कि एक अंधा, एक लंगडा एक सहारा दूजा डैनी ने पहले ही दिन प्रैक्टिस टेस्ट होने पर जुमला मारा था । दोनों टेस्ट में पास हो गए । कोई आए तो नहीं मिला पढैनी का दाखिला रहेंगी से बेहतर इंस्टिट्यूट में हुआ था ऍम दोस्ती की खातिर उसे छोडकर रहेंगी वाले इंस्ट्यूट में नाम लिखवा लिया उससे क्या फर्क पडता है या की किस स्कूल से एमबीए किया है डिग्री तो वहीं मिलेगी ना रहेंगी को अपने फैसले के बारे में बताते हुए उसने ये दलील दी थी । हम जब एक साथ रहेंगे तो ज्यादा मस्ती करेंगे । रहेंगी की पीठ पर धौल जमाते हुए उसने कहा था तो दोस्ती हमेशा के लिए होती है और इन छोटी मोटी बातों से कोई फर्क नहीं पडता है । ऍसे नजर भरकर देखा था पर जवाब में कहा कुछ नहीं था । बिजनेस स्कूल एकदम वही था । यानी शेख मैं मास्टरों के लिए जब पूरे शागिर नहीं बल्कि गुलामों की नई खेप थी । इन को सताने के लिए वो हर पल नए तरीके इजाद करते रहते थे । सूरज उगने से लेकर डूब नेता मास्टर दे रहने से उन्हें ऐसे हारते थे । वालों प्रोफेशनल मैनेजर बन ने के लिए बोझ तले चुकी बीट और बेहद खाई हथेलियां जरूरी हैं । अगर उन सरे ले कोई स्टेशन की तैयारी नहीं चल रही होती तो केस स्टडी प्रोजेक्ट रिपोर्ट सी ॅरियर रहेंगी, जहाँ पे सोते हर पल वक्त छत पे रहते हैं और सफल को पूछते रहते थे जब उन्होंने इस नामुराद एनडीए फोर्स को गंभीरता से लिया था । तसल्ली बस इस बात की थी कि उनकी जुबान पर कुछ नहीं लगता चढ गए थे कि उनके हालात बखूबी बयान करते थे । दिन में कई बार उनको लगता था कि वे पकडो और स्कूल हो चुके हैं । दोनों सबको अगर बदल का इस्तेमाल भी करने लगे थे । सुबह के तीन बजे अपना प्रजेंटेशन बढाते वक्त जब बडबडाता था ऍम रेंगी का दर्द रैलिस क्रूड में जाहिर हो जाता था । जुबानी गुनाहों के अलावा दैनिकी परवरिश ने उसे और शबानी हरकतों से बचा कर रखा था । सिगरेट और शराब को उसने हाथ भी नहीं लगाया था जबकि इसके ज्यादातर साथ ही इनमें से एक या दोनों का सहारा गाहे बगाहे ले लिया करते थे । वह अक्सर धुआ धुआ हो जाता था और धोनी के चलने उडाने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी । रेंगी सिगरेट से ज्यादा शराब पसंद करता था और तीन पैग के बाद क्रिकेट जरूरी था । रहता था की शराब दिए बिना सिगरेट का कश मारने से पीटने चैनल होने लगती थी । कोर्स का पहला सारे अच्छे अच्छे सपने की तरह हो गया । ऍम पूरी होती नहीं थी और जब छुट्टियों में वह घर जाता था, सारे वक्त होता रहता था । उसकी बहुत खुश खोज रहा था । इसके दिल्ली ऊपर जलन, कुकडे, रिश्तेदारों ने कुछ ऐसा जादू टोना कर दिया है कि उसके पास नहीं होती । बेचारा हर बार सुबह पडा रहता है । उधर उसके पिता उसकी आंखों में झगडते रहते थे । जब भी दिन सूखा रुकता था तो वो उसे बडे गौर से देखते थे । इसे पता लगाने की कोशिश कर रहे हो कि लडके को कोई भी तो नहीं लगती है । उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उनका बेटा जब से एनडीए करने गया था तब उसकी आखिर क्यों मोदी रहने लगी थी । उसके पहनने ओढने का ढंग भी बदल गया था । ज्यादातर वो ढीली ढीली देखकर पहनता था और बाल एकदम रुपया हो गए थे । घर छोडने से पहले तक तो वो बाकायदा कुर्ता पायजामा पहनता था और रहने के बाद बालों में खूब सारा क्यो कार्यक्रम तेल लगाना कभी नहीं बोलता था । लेकिन अब अब उसकी आंखों वालों और चेहरों से चमक पूरी तरह गायब हो गई थी । कुछ गडबड तो जरूर ही शिक्षा रात के खाने के बाद देवकीनंदन ने पूरी संजीदगी से घर के संस्कारों और स्कूल कॉलेजों में पहले नशे के चलन पर लंबा चौडा व्याख्यान दे दिया । मास्टरी वाले अंदाज उन्होंने कहा कि शिक्षकों, माता पिता और छात्रों को रात दिन नशे की बुरी लग से होशियार रहना चाहिए क्योंकि इससे जवान हम स्वस्थ शरीर को खडा हो जाता है । टाइमिंग थोडी देर तो उन्हें सुना था लेकिन जल्दी उसे छपकी आ गई थी । इनके नाम बंद हो गया था । उनके बेटे को नशे की लत लग गई है । क्योंकि सिर्फ नशेडी ही बैठे बैठे हाथ में खाली हो सकते थे । कोर्स के दूसरे साल को कुछ ही हफ्ते हुए थे की रहेंगी ने एक दिन बताया उसके पिता ने अमेरिकन यूनिवर्सिटी में उसके दाखिले का इंतजाम कर दिया है । पैसे और प्रभाव की बदौलत भारत में की गई एक साल की पढाई का क्रेडिट भी मिल पाना मुमकिन हो गया था । रहेंगे । वहाँ दूसरे साल में सीधे दाखिल हो सकता था और एक साल या ज्यादा से ज्यादा डेढ साल में अपना कोर्स पूरा कर सकता था । उसमें डैनी को बताया कि उसके पिता को यकीन था कि विदेशी डिग्री हर हाल में भारतीय डिग्री से बेहतर थी और दुनिया में कहीं भी डॉक्टरी दिलवा सकती थी । उदारीकरण के दौर में विदेशों में भारतीय मैनेजरों की मांग हो चली थी इसलिए बाहर जाना ही हो गया था रहेंगी जाने से और डैनी का साथ छूटने से तो भी तो देख रहा था और डैनी को लगा के अंदर ही अंदर वो खुश था और क्यों ना हो । मैंने सोचा और रिटर्न ज्यादा कीमती होता है । उस रात डैनी और रहेंगी । ऍफ इसके सीढियों पर बहुत देर तक बैठे रहे थे । एकदम चुप चाप फॅमिली गई थी और पहली ड्रिंक ली थी । फिर वो अपने को रोक नहीं पाया था । दारू पीता रहा था और कशमकश लगता रहा था । जब तक की बोटल और सिगरेट का पैकेट खत्म नहीं हो गए थे उसके साथ धोखा हुआ था । पक्का दोस्ती की खातिर एक बेवकूफ की तरफ से बेहतर कॉलेज छोड दिया था और अब तो उसको छोड रहा था । फॅस क्रूड । नशे में वो अपने पर खूब हँसा था और ऍम भी था । रहेंगी के हाथ से थामने की कोशिश करते रहे थे । ऍफ दिया था अब बिहार दोस्त के नहीं धोखेबाज के हाथ थे और जिंदगी को तो चलते ही रहना था । डेली को मौके मौके पर अपने दोस्त की याद जरूर आती थी और उसने इस हम को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया था । सारा ध्यान पढाई पर लगा दिया और अच्छे नंबरों से सभी अंतर हम पास करता गया । खाली समय में डाॅन पडता था ये जानने समझने के लिए की असल कॉर्पोरेट जगत ने चल क्या रहा है । मैंने खुद को कभी फाॅरेस्ट रूप में नहीं देखा था । अंकों ढेर में घंटों सर खपाना । फिर उसमें से फिजूल सा निष्कर्ष निकाला तो शायद ही किसी काम का हो । उसे बेहद बहु लगता था । स्टॉक मार्केट रिपोर्ट और महारथियों की बनाई फ्यूचर रीडिंग को जब पडता था तो उनके डाउन पर से झुंझलाहट होते ऊंचाई की पत्तियों को पढकर भविष्य बताने जैसा स्वाद था जिसमें बडे बडे दिमागदार लोग भविष्यवाणी करते रहते थे कि आज शेयर मार्केट उछाले लेगा और कल हम से गिरेगा । शायद आपस में उनके पास कोई कोर्ट जैसा कुछ था कि जब अब बोलेंगे तो डाउन होगा या फिर अपने बनाए हुए बेहतरीन आंकडों का विश्लेषण और कंपनियों के नतीजों की ना कॉल सिर्फ दिखावा था । वास्तव में विश्व को जानने का दावा करने वाले चमदार चेहरे पाखंडी जवाब के तीरंदाज रहे तो अंधेरे में तीर चलाकर अपनी काबिलियत खाते रहते थे । लेकिन आंकडों के मकडजाल में उलझाने वाले इन विशेषज्ञों के बहुतेरे अंधभक्त थे । ठीक वैसे ही जैसे गेरुआ कपडे पहने पेड के नीचे बैठे सडक छाप ज्योतिषी के होते थे जो खुद समझते जानते कुछ नहीं थे और लोग पर लोग की बातें करने से बाज नहीं आते थे । रहने के लिए ये नए जमाने के बरामद थे । इनके विश्वास किस आधार पर तय किए जाते थे कि वे किस बिजनेस स्कूल से पढ करने गए थे । स्कूल भी सरयूपारीण और कान्यकुब्ज जी की तरह दो अलग अलग हिस्सों में बंटे हुए थे । दोनों ही अपने को असली भ्रमण बताते थे । पूरी तरह से आश्वस्त थे कि दुनिया उन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है और उनका कहा हुआ भ्रम सत्य के अलावा कुछ नहीं है । ऊच नीच के दंभ के साथ साथ वो इसमें भी जरूर महसूस करते थे । उनका कोई कुछ बिगाड नहीं सकता था, चाहे वो कितनी बडी गलती क्यों ना कर लें । इसीलिए ये काम को खिलवाड समझते थे । खिलवाड खत्म होने से पहले ही पाला बदल देते थे । विशिष्ट भ्रमण उसी को मानते थे । जल्दी जल्दी जजमान बदलने की कुव्वत रखता हूँ । यानी बारह साल में एक दर्जन नौकरियाँ कर चुका हूँ । ज्यादा पैसा और पहुँच पाने का ही सारा खेल था और उसी में शौहरत थी वास्तव में अपने को शातिर तरीके से बेचने की कला बिजनेस स्कूल मोटी फीस लेकर सिखाते थे । टहनी समझ गया था की कामयाबी पाने के लिए उसको पेशेवर दोस्तों और जानकारों का मकड जाल बुनना होगा । हमेशा आगे बढने की होड में लगे रहना होगा और अपने को ऐसे पेश करना होगा । उसको पाने की ललक दूसरी कंपनियों में हमेशा बनी रहे । दूसरे शब्दों में उसको काफी कारनामों के सहारे अपने को अचरज और आकर्षण का केंद्र बनाना था । एक दिन उसके बिजनेस स्टेटर्जी के प्रोफेसर नहीं मूड में आकर कहा था की कंपनी की नौकरी लगभग झपक वाली सुहागरात की तरह होती है । उन्होंने कहा था नए संभोग का रोमांच रात भर का होता है तो रात के बाद ठहर गया तो फिर बेमुरव्वत जान जानना फस गया । पिछले पार्टी करो और आगे बढो पार्टी के झूठे बर्तन किसी और पोटॅटो दैनिकों बात पसंद आई थी । उसे सुनकर माँ की याद आई थी । हमेशा औरों के खाने के बाद बढता उठाने और चौका साफ करने में लगी रहती थी । आपसे मुझसे हर गया था वैसा अपनी जिंदगी के साथ नहीं होने देगा । पार्टी करेगा और निकलेगा । कॉर्पोरेट जगत में तो ऐसा होता ही है ना उसको अपवाद बनने की क्या जरूरत थी ।

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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