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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 3

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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दीनानाथ को डैनी होने में कुछ खास दिक्कत पेश नहीं आई थी । उसने जो निश्चय किया था उसको हासिल करके ही दम लिया था । कच्ची उम्र से ही उसने हालत पर हावी होने की आदत डालनी शुरू कर दी थी । उसके सामने जो भी परिस्थिति आती थी उस पर अपना सिक्का जमाने के लिए अखिल दौडाने लगता था । पहले वो स्थिति को समझता था, फिर उसमें वो जिससे तलाशता था जिनसे उसकी पकडे बन सकें और फिर उलझन को तसल्ली और बडे गौर से अखिल की रोशनी में लाकर सुलझा देता था । उसे ऐसा करना रोमांचक लगता था तो उसका दमाद हर बार उसी तारतम् में से दौडता था जिसे नई चमचमाती फरारी कार का इंजन दौड रहा हूँ । उसके लिए दिमाग चलाना फरारी की सवारी करने जैसा था । उसे खूब मजा आता था जब वो एक पल में ही रफ्तार पकड लेता था और दूसरे पाल न्यूट्रल गेयर में आकर बेआवाज बढने लगता था । शानदार पावर थी । दोनों ही कृतियों में दैनिक उसके लग पड गई थी । अपना नाम बदलने की जरूरत को उसने खूब सोच विचार करके पूरा किया था । घर पर एकदम से नहीं बताया था क्योंकि इसकी अभी जरूरत नहीं थी । नाम को घर में धीरे से पहुंचाना था । बाकी विरोध एकदम से नहीं खडा हो । नाम का सॉफ्ट लांच भी वाजिब था और उसके बाद मध्य अल्प समय में कोशिश करनी थी कि नया नाम प्राकृतिक रूप से आम चलन में आ जाए । सॉफ्ट लॉन्च इसलिए भी जरूरी था क्योंकि पिताजी अपनी परंपरागत समाजवादी विश्वास की दहलीज को इसके लांघने के अंदेशे भर से बिफर सकते थे । लाॅ लियो क्या? फिर बॉरिस जैसा सोशल इस टाइप का नाम होता तो अलग बात थी । उस पर उन्हें ऐतराज नहीं होता और अगर होता भी तो बहुत कम ऍम तो एकदम ही नाकाबिले बर्दाश्त था । एकदम ना माकूल अमेरिकी था जिसमें से भ्रष्टाचारी पूंजीवाद की बदबू आती थी । आसमान सिर पर उठा लेते और माँ दिनभर अपने चिरपरिचित अंदाज में भगवन करती रहती है । दिना में क्या बुराई है । दिनो पहले साध् तरीके से पूछती फिर एक सुर में शुरू हो जाती है तुम्हारे दोस्तों ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है बिगड रहे हो तो और उस रहेंगी के बच्चे से तो तुम दूर ही रहो । फॅमिली ज्यादा है वहाँ पर बहुत करके छोडेगा तुम्हें घर की किस किस से बचने के लिए डैनी ने लॉन्च स्टेटर्जी पहले ही बना ली थी । पहले चरण मास्टर रहेंगी के दोस्तों के बीच नाम चलाया । सबको नाम अच्छा लगा था और जल्दी उनकी जुबान पर भी चढ गया था । अगला कदम था कि दोस्त उसके घर आकर नहीं नाम से पुकारे रहेंगी । को फिर लगाया गया और एक दोपहर उसने घर आकर ज्योति से डैनी के बारे में पूछा था । पल भर का तो डेनी सुनकर कुछ भगवान ही गई पर रहेंगी ने उसे इतना कि कि दोस्तो न जाने कब से उसे इसी नाम से पुकारते आ रहे थे । ज्योति ने गंदे उसका और फिर जोर से बहनी कहकर पुकारा था । ज्योति के जरिए डैनी अवतार घर में अब स्थापित हो गए थे लेकिन उसको पक्का पता था उसके माता पिता नया नाम नहीं अपनाएंगे । वो अपना तरीका कभी नहीं बदल सकते थे और घर में दिल्लू दिनों की गुहार लगी रहती थी । अच्छा इससे कोई खास फर्क नहीं पडने वाला था । वैसे भी कौन से फॅस की छत वाले छोटे से मकान में जिंदगी बितानी थी । नाम के बाद शिक्षक में भी निखार लाना बेहद जरूरी था पर इसके लिए उसे पहले कुछ बुनियादी दिक्कतों से जूझ रहा था । एक दिक्कत शेट्टी हर कोई आराम से शिफ्ट कर लेता था । ऍफ जाता था शायद मर्ज पुस्तैनी हिंदी मीडियम होने की वजह से था । उसकी हवा सी नहीं बन पाती थी कि शिट, कुदरत ही निकल पडे । एक हफ्ते तक वो शिफ्ट करने में पूरी संजीदगी से लगा रहा था । पर बात बनी नहीं देनी अपनी नाकाबलियत पर छोटा था । फिर एक दिन रहेंगे ने उसे तब से समझाया । शिफ्ट निकालने की कई तरीके होते हैं । ऍम जगह, समय और सब घर पर निर्भर दी । हर एक मुझे एक अलग तरह की शिक्षा जुडी थी । जैसे अगर मूड खराब है तो शिट अलग तरीके से निकलेगी । उसे भीतर से खूब सारा जोर लगाकर बाहर की ओर धकेलना होगा । जैसे कि हम जब गुस्सा होते हैं तो पेट से खीजकर आवाज निकालते हैं । खुशी वाली शर्ट इससे एकदम अलग होती नहीं है । वो मस्ती में सीटी बजाते हुए बाहर निकलती थी । वो हल्की और झागदार होती थी और जब निकलती थी तो चेहरे की मांसपेशियां, रिलेक्स और आंखें चमकदार हो जाती थी । कभी कभी इसके बाद मुस्कराहट या बेसाख्ता हंसी भी आ जाती थी । दुख वाली शिट धीरे धीरे मशक्कत के साथ निकलती थी । उसमें फैलाव होता था जिसको समझने में एक घडी से ज्यादा समय लगता था । दुख भरी शिप भारी मन की नुमाइश करती थी । इसमें झुके हुए कंधे और कुत्ते के काम जैसे लटके हुए हूँ की तस्वीर साफ दिखाई देती थी । उसमें किसी पिटे हुए इंसान का दर्द मुखर होता था । जैसे कि के एल । सहगल के गंभीर नगमों में टूटे दिलों की हताशा गूंजती थी । दुख भरी शिफ्ट के चार अक्षर ऍम आई टी अब तो उस समय हुए अलग अलग निकलते थे । वे उदास सहित कुछ समय हवा में लटके रहते थे और फिर धर्म से गिर पडते थे । आम सेट सबसे आसान होती थी । वो ॅ निकलती थी, अचानक फिसल जाती थी । पता भी नहीं लगता कि कब हो गई । ये सहज क्रिया गई जैसे बेवजह गंभीर कुछ गाना या फिर जब कुछ करने को ना हो तो इधर उधर देखना उसका कुछ मतलब नहीं होता था । बस हो जाती थी अपनी उंगलियों के नाखून देखते हुए भी आप छिटपुट बुला सकते थे । बेमकसद बिन बोले बोलने की तरह । पर इससे अधूरी लव पूरे जैसे लगते थे । वैसे ये किसी अनमनी बातचीत से कहीं बेहतर थी तो की आप दुनियादारी से एकदम बेपरवाह लगते थे । अपने में हुए हुए नहीं । नहीं जितनी कोशिश करता था उतनी ही बात बिगडती जाती थी । रहेंगी की जुबान चली थी । उस पर मक्खन की तरफ फसल दी थी पर उसके मुंह में मूसल बन कर रखी थी । वो लगातार शिट करता था क्लास में, खेल के मैदान में, बाजार में, बिस्तर पर लेटे हुए और यहाँ तक कि संडास में भी और उस से नहीं हो पा रहा था । हमेशा शिट सिट में तब्दील हो जाती थी । ये चार जलावन अक्सर ऐसे थे कि कभी उसके मुंह से एक साथ निकलते ही नहीं थे । तीन ही रह जाते थे । शिट का एच गायब हो जाता था और लगता था कि सिट यानी बैठने के लिए कहा जा रहा था । असल में सारा दोष उसके माता पिता का था जिनके पुरातनपंथी विचारों की वजह से उसको कान्वेंट स्कूल की जगह सरकारी स्कूल का मुंह देखना पडा था । रहेंगी ने उसे बताया था कि कॉन्वेंट स्कूलों में सिर्फ अंग्रेजी हालेस अंग्रेजी बोली जाती थी । यहाँ तक कि खेलते समय खाने की छुट्टी में भी अगर कोई हिंदी काॅपी बोल देता था, उस पर जुर्माना लगा दिया जाता था । ये थी अच्छी शिक्षा जिसमें एच के सही उच्चारण पर जोर दिया जाता था । उनकी देशी किसकी नहीं जिसमें सब चलता था । उसके मन में आता था कि अपने बाप से पूछे कि दुनिया उसका कैसे भला करेगी । अगर वो ठीक से भी नहीं कर सकता था । उन्होंने समझाना चाहता था की अच्छी परवरिश और अच्छा स्टेटस पाने के लिए शिवतत्व की बहुत अहमियत थी । उसके बिना वो उसी दलदल में हमेशा फसा रहेगा जहाँ साला ही सौ रुपया था । ऊंची लोग साले से परहेज करते थे और सिर्फ शिफ्ट कहना पसंद करते थे । पिताजी नहीं समझ पा रहे थे की जिंदगी गली मोहल्ले से निकलकर कॉलोनी में बस करेगी । जहाँ पर अगर आप ठीक तरीके से शिक्षित नहीं कर सकते थे तो वहाँ रहने के काबिल नहीं थे । इस पर है कि दिक्कत ऍम कहने में थी । यहाँ भी बेचने समस्या खडी कर रखी थी । मैन को भी उस तरीके से वो नहीं खींच पाता था जैसे रहेंगी कर लेता था । ऍम आसान था क्योंकि डैनी नाम अपनाने के बाद भी का वो आगे हो गया था । डाॅन कब चचेरे से हो गए थे । धीरे धीरे वाॅल भी फिल्म मिल गया था फॅमिली जैसा जहाँ उसने पहन लिया था और अब उस पर फबने भी लगा था । यही वो रंगीन पैरहन थे, स्टेटस को सजाते और सामान पे थे । दुनिया के मेले में जाने के लिए डैनी दो तिहाई तैयार हो चुका था । शेट्टी बचा था लेकिन उसको यकीन था क्या? आज नहीं तो कल ठीक से शिफ्ट करने लगेगा ।

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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