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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 15

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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पंद्रह लूटू का काम सिर्फ चार दिनों में पूरा हो गया था । पहले दिन बोलो टू के बन्दों के साथ कई घंटे बैठा था और डॉट कॉम की शब्दावली से लेकर उसकी पहुंच तक को उसने अपने दिमाग में उतार लिया था । इससे पहले बैंक की फाइलों में से उसने एक जाने माने कंसलटेंट का बनाया हुआ पुराना बिजनस प्रपोजल ढूंढ निकाला था और उसे गहराई से पढ समझ भी लिया था । वो फाइल को घर उठा लाया ताकि प्रपोजल के फॉर्मेट और छोटी छोटी मगर जरूरी चीजों को उसमें से देख कर अपना काम और चमका सकेंगे । डायरेक्ट पूरी कोशिश नहीं की प्रोपोजल उस जैसे कई और प्रपोज दिनों से हटकर देखें जिससे उस को मंजूरी अपने बूते पर ही मिल जाए । वैसे दिल्ली से तो उसे ही मंजूर कर के आगे बढा रहा था और मुंबई में बैंक के अफसरों से लूटू की अच्छी पहचान थी ही दैनिक विश्वास था । लूटने मुंबई में भी कई अफसरों को उसकी तरह कंसलटेंट पर आ रखा होगा । हो सकता था अशोक जी उसका हमजोली हो और अगर हो भी तो उसको क्या? डैनी को तो अपना काम एक मंझे हुए पेशेवर खिलाडी की तरह करके देना था । उसका दिमाग में खयाल जरूर आया था की वो उसी बैंक का हिस्सा है जो लोन देने वाला है और इसीलिए वह गलत कर रहा है और उसने इस फैल को पनपने नहीं दिया था । डॉट कॉम वालों के साथ मीटिंग के बाद डैनी मेरिडियन होटल से इंडिया गेट की तरफ चला गया था । बाहर के मौसम से वो बेअसर था क्योंकि अब उसके पास ईसी कहाँ थी? डैनी ने इसी की कोलिन बढा दी थी ताकि ठंडी हवा का पूरा सुख उठा सके । चलते चलते उसे गिरजा का खयाल आया । उसने डैनी का अच्छा उल्लू बनाया था । डैनी मुस्करा उठा । गिरजा चालाक थी शायद इसीलिए उसे पसंद थी । एक पीसीओ पर रुककर उसने मोना को फोन लगाया । रात के तकरीबन दस बज गए थे । काम की वजह से मुझ से बाहर खाना खाने की बात करना भूल गया था । शायद वो घर पर हूँ और अगर वो वहाँ है तो उसे निकलने के लिए राजी कर सकता था । उसका नंबर लगते ही उन्होंने फोन उठा लिया । मुझे पता था हम फोन करोगे । उन्होंने शरारत से कहा वो मैं एक मीटिंग से निकला हूँ और ये सब छोडो ना घर चले आओ साथ में मच्छी झोल खाते हैं मैं तो मैं बाहर ले चलता हूँ बाहर होना हसी कम ऑॅल वक्त बर्बाद मत करूँ । मैं तुम्हारा शुक्रिया अभी की अभी अदा करना चाहती हूँ । अरे नहीं होना ऐसी कोई बात नहीं है । डैनी ने सफाई देने की कोशिश की । मालूम है अब बस चले आओ । कल सुबह का ब्रेकफास्ट हमारे घर पर करेंगे । मैं इंतजार कर रही हूँ कहकर उसने फोन काट दिया । डैनी मोना के साथ जरूर था पर रात भर गिर जा के बारे में सोचता रहा था । उसे मोना बेहद पसंद थी । पर गिरजा उसकी चाहत थी । ठीक वैसे ही जैसे गिरजा उसे चाहती थी, पर अनमोल उसे पसंद था । हो सकता था आज रात को अपनी चाहत और पसंद की अदला बदली कर लें । वो ढुलमुल हो रही थी, अपनी बात पर टिकी नहीं रही थी । और जहाँ तक मोना का सवाल था वो बस उसे पसंद ही करता था और कुछ नहीं पसंद इसलिए करता था क्योंकि उसने डैनी के लिए बहुत कुछ किया था । मोना ने उससे कभी कोई फिजूल सवाल भी नहीं किया था और नहीं होशियार बनने की कोशिश की थी । वो जैसा था पैसा था और मोना उसी हिसाब से चलती थी । आपको गिर जाती तरह अचानक गुलाटी नहीं मारती थी । आधी रात को मंदिर में शादी जैसे ऊटपटांग प्रस्ताव नहीं रखती थी । होना स्थिर थी । गिरजा स्तर नहीं थी । दोनों से पसंद थी । हो सकता था अगर वह कोशिश करे तो उससे मोहब्बत भी कर सकता था । अगर गिर जैसा अनमोल के साथ कर सकती थी तो वो क्यों नहीं कर सकता था । होना ही क्यों? वो किसी और मछली को भी फंसा सकता था । उसे एक बढिया मोटी मछली फंसाने के लिए बस अपना दिमाग ही तो चलाना था । डैनी देर से सोकर उठा था । नींद टुकडे टुकडे आई थी । थकान लग रही थी । जी कर रहा था । करवट बदलकर फिर हो जायेगा । पर आज का काम उसके इंतजार में था । उसे शाम तक बिजनेस प्रपोजल का खाका तैयार कर लेना था और अगली रात तक उसे पूरी तरह से दुरुस्त करना था । गिरजा खाया लाया था । ऐसी रही होगी इसकी शाम और उसने अपने आप को कम की तरफ मोड दिया था । जल्दी से तैयार होकर उसने अनमनी सीमोन के गाल पर पत्ती मारी थी और निकल पडा था । नाश्ता करना भी भूल गया था । अपने फ्लैट में पहुंचते ही दैनिक काम में जुट गया । घर में इसी नहीं था पर उसको गर्मी महसूस नहीं हुई । उसका सारा ध्यान प्रोपोजल पडता था । और वो उस पर भूत की तरह तब तक जुटा रहा है जब तक वह पूरा नहीं हो पाया । शाम के पांच बजे उसे अच्छा जोरों की भूख महसूस हुई । पिज्जा बनाने जा रहा था और दाल रोटी की होटल मार गई । पेट भरने और स्वास्थ के लिए देशी खाने से बेहतर उसे और कुछ नहीं लगता था । फिर उसने गिरजा को फोन मिला क्या कर रही हूँ? कुछ नहीं पिछली बार की तरह उसने हस्कर पूछा पिज्जा कटाक्ष पर दिल खोलकर ऐसी थी धूम । कहाँ हूँ अपने फ्लैट में और चले आओ घर में कोई नहीं है । फिर जाने शरारत भरे अंदाज में फुसफुसाया और फिर अपनी हरकत पर खिलखिला पडी थी । उसी की खडखडाहट डैनी के कानों में देर तक पूछती रही थी उसे वो बेसुरी और कर्कश लग रही थी । जैसे किसी ने उसके खोखले दिल पर चमडा चढाकर सूखी लकडियों से चोट करती हूँ तो खास दे रही थी और उस की खडखडाहट का गहरा दर्द सीने को फाड रहा था । गिरजा की दावत को खारिज करके डैनी अपने को अंधेरे कमरे में बंद कर लेना चाहता था । उसने मन कडा करने की भरपूर कोशिश भी की थी पर अपने को रोक नहीं पाया । दैनि ने पूछा नहीं और गिरजा ने बताया नहीं । नई कार के नाम पर उन्होंने घर पर ही जाम टकराए और बैठकर टीवी देख रहे । थोडी देर बाद गिरजा ने कहा था जिसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है और वो सोने चली गई । दैनिक देर रात तक अपने प्रपोजल पर काम करता रहा । प्रपोजल मंगलवार की सुबह लोगों के पास पहुंच गया । कुछ घंटों बाद उसने फोन करके अपनी खुशी जाहिर की । दैनिक बेहतरीन काम किया था । सुंदर बिल्कुल उसकी मर्जी के हिसाब से था । वो दस का करके टैनी के पास दोपहर तक भिजवा रहा था ताकि उस पर आगे की कार्यवाही कर सकें । दैनिक सप्ताह के अंत तक घर जाने की बात लोगों को बताई थी । लोगों ने फाइल के साथ एक लिफाफा भी भेज दिया । दैनिक पांच ज्योति के लिए अलग कर दिए थे और बाकी अपने पास रखे थे । बीच में मित्र साहब का अचानक होना गया था । उसके साथ लंच करना चाहते थे । उन के न्यौते पर मुझे चौक गया । पर तो करनी ही थी मित्र साहब जैसे बडे कॉरपोरेट नाम के साथ रंज करने के लिए । जब जाने माने नाम भी सिर के बल चलने को तैयार थे । डैनी की क्या बिसात थी उनके आसपास देखने से लोग चर्चा में आ जाते थे । वैसे तो डैनी ने ऊपरी तौर पर मित्रा साहब से पूरी गर्मजोशी से हाँ कर दी थी और गिर जा के पिता से मिलने को लेकर वो कुछ घबरा गया था । दैनिकों लगा था कि गिर जाने उन्हें सब कुछ बता दिया था और एक पिता की हैसियत से उन्होंने डैनी को बुरी खबर सुनने की जिम्मेदारी खुद पर ले ली थी । इसीलिए पिछली रात गिर जाने अनमोल के बारे में कुछ नहीं कहा और उसको घर बनाने के बाद भी जल्दी सोने चली गई थी । उसे यकीन था कि गिरजा रात गहरे सोच में पडी हुई थी और सुबह दैनिक के साथ मामला निपटाने के लिए अपने डैडी को बीच में डाल दिया । बिचारी हमें नहीं से मासूम बच्चे क्या आपने अक्रमण तजुर्बेकार बाप है? इतनी सी मदद नहीं रह सकती थी । डैनी हर सूरते हाल से निपटने के लिए खुद को तैयार करने में जुट गया था । उसने अपने रिश्ते के बारे में बारीकी से सोचना शुरू कर दिया । पता नहीं फिर जाने मित्र साहब को उसके बारे में क्या बताया था और कैसे बताया था । हो सकता था उसने कहा हो । डैनी ने पहली ही मुलाकात में शराब पिलाकर उसे फैसला लिया था और आधी रात को शादी भी कर डाली थी ताकि इससे तरक्की पाने की सीडी बना सके । ये भी हो सकता था की मिसाल मित्रा ने अपने तलाकशुदा पति को समझाया हूँ कि सहारनपुर के फटीचर टीचर के बेटे के मुकाबले अनमोल उनकी बेटी के लिए कहीं बेहतर रिश्ता था । संभावनाएं बेहिसाब थी और दैनिक जितना सोचता था उसे हर एक सूरत संभव होती दिखती थी । एक मर्तबा दो उसकी आंखों के सामने फिल्मी सीन भी घूम गया था, जिसमें मित्रा साहब बडे नाटकीय अंदाज में कह रहे थे, ये ऍम जितनी रकम चाहे भर लो और दूर हो जाओ । मेरी बेटी की जिंदगी से बदहाल सूरतेहाल से है । अपनी के घोडे दौडाकर ही मिल सकती थी । डैनी ने अपने आप कल को मशक्कत करने में लगा दिया । उसने दराज से कागज कलम निकले और लिखना शुरू कर दिया । सबसे पहले उसने अपनी शख्सियत की खूबियों की । फिर इस पर आए । उसके पास अच्छी शफीक, अच्छा मिजाज और अच्छा दिमाग था । उसने अपनी पेशेवर जिंदगी की शुरुआत भी अच्छी की थी और हांगकांग पोस्टिंग में उसकी हैसियत में बडा इजाफा ला दिया था । एक तरह से वो अनुभव की बराबरी पर पहुंच चुका था क्योंकि वहाँ तक की तरह नहीं चलता था इसलिए जल्दी आगे भी निकल सकता था । हो सकता था कभी अनुभव उसके नीचे काम भी करना पडेगा और अगर ऐसा होता है तो उस अंकल जी बच्चे को समझ में आएगा । किसने डैनी को नजरंदाज करके कितनी बडी गलती की थी । अपनी खुशफहमी पर डेनिम्स कराया पर साथ इसको यकीन भी था कि कुछ सालों में वो अपने पेशे के हाजारों में से एक होगा । उसकी खास खूबी ट्रेनिंग कागज पर लिखा था उसका लोगों से दरपेश होने का सलीका था । इसी वजह से लो टू एक छोटी सी मुलाकात नहीं उसका मुरीद हो गया था । उसका गिरजा पर भी असर उम्दा रहा था और अशोक विशाल मुन्ना मेरे पर भी उसका रह था । और तो बेहद तजुर्बेकार मित्रा साहब जिसके कायल हो गए थे अगर वो कायल नहीं होते तो फॅमिली लंच के बाद उसके ब्रांच हेल्थ के बारे में नहीं पूछते । इसकी बजाय वो गिरिजा को डैनी से पिंड छुडाने की सलाह देते हैं । वैसे भी मित्रा साहब के बारे में मशहूर था कि वो आज भी और हालत पहचानने में माहिर थे । उन पर कोई मामूली आदमी असर नहीं डाल सकता था पर डैनी ने ये कारनामा कर दिखाया था । मित्रा साहब ने एक नौजवान की असल कीमत पहचानने में न तो जल्दबाजी की थी और न ही गलती । तो फिर मुस्कराया था अगर वो मित्रा साहब जैसे नामी गिरामी शख्स को अपनी गिरफ्त में ले सकता था, उन जैसे और ऊपर भी अपनी छाप क्यों नहीं छोड सकता था । उसने अपने शुरुआती दौर में ही एक बडा और मुश्किल इम्तिहान पास कर लिया था जिससे उसका हौसला खासा बढ गया था । पर क्या वो गिरजा को लेकर हौसला रख सकता था? उसकी ताकत थी या उसकी कमजोरी? क्या सिर्फ एक मौका नहीं? क्या चुनौती इसकी लंगडी लगने से उचित हो सकता था? वो मित्र साहब उसके खिलाफ कुछ इस तरह से भडका सकती थी कि डैनी की पेशेवर जिंदगी को आपको पूरी तरह से चौपट करने पर उतारू हो सकते थे । गिर जाए । तेज तरार लडकी थी जिसमें किसी भी हालत का सामना कर रहे हैं और उनसे माफिक जवाब हासिल करने की हिम्मत थी । उसकी ये बात अच्छी भी थी और बुरी भी । वो अख्खड थी और अगर उसके दिमाग में आ गया कि डैनी उसे छात्रा दे रहा है तो वह पलक झपकाए बिना उसे मिटा सकती थी । कुछ फितूर तो उसके दिमाग में जरूर चल रहा था तभी वो अनमोल को जांचने में लगी थी हूँ ऍम थोडा और उस पर बडे बडे अक्षरों में अनमोल लिखा था गजान मूल के बारे में क्यों सोच रही है? लिखते हुए उसने कलम को इतनी जोर से कागज पडता जीता था की वह कहीं कहीं फट गया था । वो मुझे सच में प्यार नहीं करती है और उस रात पीने के बाद उसने शादी रचाने का नाटक किया था और मुझे एक खिलौना बनाकर अपने घर ले आई थी । उसने तैश में लिखा था मैं उसके खेल का सामान था । बस दैनिक ने अपने लिखे को एक बार पडा और अपने बारे में खेल का सामान लिखा हुआ उसे पसंद नहीं आया । उसने उसको काट दिया था । ना तो सामान था और नहीं । गिरजा उस तरह की लडकी थी । डैनी उसे वास्तव में अच्छा लगा था और तभी मोना की पार्टी के बाद उसके साथ शाम बिताने के लिए तैयार हो गई थी । उसको और जानना चाहती थी और बातचीत के दौरान हो गई थी । गिर जाने कोई खेल नहीं खेला था । डैनी ने लिखा था बल्कि उसके साथ कोई और बेबाकी ने उसको अपने जज्बातों को जाहिर करने के लिए मजबूर कर दिया था । उसकी शख्सियत ऐसी ही थी । तभी तो वह जब करके मंदिर ले गई थी और घर ले जाने से पहले उसने शादी की, उसने ये सब मौज की खाते नहीं किया था । वो सब दिल से चाहती थी और चाहत उसकी ताकत बन सकती थी । पर फिर अनमोल क्यूँ उससे सवाल कागज, परदादा और उसको भरने के लिए कई बार उसके नीचे कलम फिर नहीं उसने दिन से चाहती है । वो काट कर उसकी जगह बहुत पसंद करती है लिख दिया था । इसमें कोई शक नहीं था कि आगे चाहे कुछ भी हो वो ताउम्र डैनी को अपने वजूद से नहीं बता सकती थी । उसको अहसास था वह गिरजा की कमजोरी है और अगर सब कुछ ठीक रहता तो शायद गिरजा देने की सबसे बडी ताकत बन जाती । गिर जाए । उसके लिए सही थी । उसके मिलता ही सब कुछ बेहतर होने लगा था । उसके जैसी लडकी के सपने उसने सहारनपुर वाले दिनों में देखे थे । एक बहुत ही प्यारी ही खानदानी लडकी के सपने शिफॉन और नॉन के मखमली शाम को बखूबी बढ सकें । दूसरी तरफ भेजा अच्छी तरह से जानती थी कि डैनी के साथ उसकी जोडी जबरदस्त देखती है । उसका ऐसा महसूस करना ट्रैनी ने लिखा उसको हालात संभालने का मौका देता है । उसे बस तरीके खोजने होंगे, गिर जाता है । कश्मीर ढंग से उसकी जिंदगी ना आई थी । डैनी को अहसास था कि उसके जैसा बडी किस्मत वाला करोडों में इक्का दुक्का ही होता होगा । किस में गिरजा को उंगली पकडकर उसके दरवाजे तक लाई थी, पर गिरजा दहलीज पर खडी है, इसके चाह रही थी । उसके अनुमान होने पर उसको क्या समझे? पूरी तरह उसके साथ थी या खिलाफ हो रही थी । वैसे अमूल का नाम लेकर उसमें जाहिर कर दिया था कि वह फिलहाल पूरी तरह से उसके साथ नहीं थी । अगर वहाँ जैसा कर सकती तो कुछ साल बाद और कुछ भी कर सकती थी और डैनी की जिंदगी में नई हलचल पैदा हो सकती थी । फिर जा पर पूरी तरह से अखबार अभी नहीं किया जा सकता था और इसलिए उसे अपने लिए खतरे की तरह देखा जा सकता था । पर गिरजा अनमोल के बारे में आखिर क्यों सोच रही थी? उसने वजह लिखनी शुरू कर दी हूँ । बेवकूफ थी । रही इस बात की बिगबाॅस इसे जब चाहे कुछ भी करने की आदत पड चुकी थी । फैसला पहले लेती थी और सोचती बाद में भी वो टूटे परिवार से थी और इसलिए किसी से जुडने में हिचकी चाहती थी । वो सिर्फ और सिर्फ अपना सोचती थी । ऍम रुपया । ऐसी पहले उसका कोई मतलब नहीं था । उसने कागज को चिंदी चिंदी कर दिया था । उसने एक और कागज उठाया और इस बार मित्रा साहब का नाम उस पर लिख दिया । उसे तय करना था कि जब वो उनसे मिलेगा तो कैसे पेश आएगा । उसे तय करना था कि अगर गिरजा का मुद्दा उठता है तो क्या करेगा और अगर कुछ और बात होती है तो उसका रुख क्या होना चाहिए । उस वैसी तैयारी करनी थी जिसमें और मुद्दे गिर जा के मुद्दे पर हावी हो जाए और वह मित्रा साहब का हर हाल में सजा बन जाये अपनी खूबियों की तो वो लेकर वो संतुष्ट था । उसमें खूबियाँ और उनसे ज्यादा भी उसे आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता था । फिर जा के शौहर की तरह भी नहीं । एक परेशानी अभी और थी । उसने मित्रा साहब और गिरजा को बताया था । उसके पिता टीचर थे । उस ने ये नहीं बताया था कि वह सरकारी स्कूल में टीचर थे । दोनों ये मानकर चल रहे थे कि वह यूनिवर्सिटी में टीचर है । असलियत पता चलने पर मित्रा साब भडक सकते थे । उनके लिए ऐसे दामाद को अपनाना शायद मुश्किल हो सकता था जो एक छोटे से स्कूल मास्टर का बेटा था । दोनों परिवारों के बीच ये बहुत बडा हैसियत का फर्क था । टाॅक उनके सामने सीना ठोककर कह सकता था । वो खुदमुख्तार था और हालांकि से बाप दादों से कुछ नहीं मिला था । पर उसमें इतनी को वक्त थी की आने वाली नस्लों के लिए वह जरूर को छोडकर जाएगा । पता नहीं क्यों उसे यकीन था मित्रा साहब उसकी बात को पसंद करेंगे और मिसिस बत्रा जरूर परेशान होंगे और ऐसी बातों को लेकर अक्सर बखेडा खडा कर देती थी । डैनी उसे कभी मिला तो नहीं था पर जैसा गिरजा ने बताया था उस हिसाब से वो हैसियत पहले पडती थी और बाद बाद में करती थी । डैनी ने फौरन से पेश्तर ऍफ का ख्याल अपने दिमाग से खदेड दिया और मित्र साहब से मुलाकात को कामयाब बनाने के जहन में लग गया था । उसने अपना नाम दोबारा से पडा । समस्या क्या थी? उसने खुद से जोर से पूछा । जवाब मित्रा साहब ने उसे मिलने बुलाया था । मैं कोई भी बेढंगा सवाल कर सकते थे । गिरजा से दूर हो जाने को भी कह सकते थे । उसे किसी भी हालत का सामना करने के लिए अपने आपको तैयार रखना था तो सोच में पड गया और उसकी कलम अपनी मित्रा साहब के नाम के चारों ओर घेरा बनाते हुए चलने लगी । उसके निशान गहरे से गहरे होते गए थे । जल्दी ही मित्र साहब घेरे में समा गए । डैनी ने उसके हरे घेरे में देखा था और जवाब लपक कर बाहर आ गया था । बेवजह ही सीधी सी बात के लिए उसने इतना वक्त बर्बाद किया था । गिरजा से उसका रिश्ता कैसा भी रहे, पर मित्रा साहब से उसे सीधा और पुख्ता रिश्ता बनाना था । अगर वैसा कर लेता है तो गिरजा अनमोल के साथ जाए या किसी और के साथ, उस पर कोई फर्क नहीं पडने वाला था । मित्रा साहब उसके लिए सबसे जरूरी थे । पर पता नहीं क्यों उसको यकीन हो चला था कि गिरजा उससे अलग होने पर भी उसकी ज्यादा खिलाफत नहीं करेंगे । अब वो मित्र साहब के सामने अपनी कमजोरी छिपाने के बजाय अपनी खूबियां रख सकता था । उसका बडा मौका मित्र साहब को अपनी काबिलियत दिखाने में था और अगर वैसा कर लेता है तो उसे किसी से कहीं से भी कोई खतरा नहीं था । डाॅ । और मुस्काता चला गया । उसके पास अकल थी और वो उसका इस्तेमाल करने का हुनर भी रखता था । डाॅन अपने से बेहद खुश था ।

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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