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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा - Part 11

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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ग्यारह डैनी तरक्की पाकर बेहद खुश था । मुंबई में आला अफसरों से आंख मिलाकर साहस और आत्मविश्वास से उसने अपनी बात कही थी । मन ही मन उसे अपनी कारगुजारी पर फर्क था क्योंकि बिरला ही कोई रंगरूट पहले ही दौर में इस तरह की कामयाबी अपने नाम दर्ज करा सकता था । उससे सिर्फ माँ को मुंबई में हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा दिया था । हर एक छोटी बडी बात उसने बताई थी । उसने बताया था कि अब उस की तनख्वा पच्चीस हजार से बढकर पैंतीस हजार हो गई थी । बॉक्स भी बढ गए थे । बैंक में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी को इतना बडा प्रमोशन मिला था । डैनी माँ के आगे शेखी नहीं बनाना चाहता था पर अपनी कामयाबी बयां करने से अपने को रोक नहीं पाया था । शायद माँ को सुनने के जरिए वो खुद मुंबई के लम्बे दोबारा जीना चाहता था । माँ कई बार आपने खुशी के आंसू रोक नहीं पाई थी । उन्होंने बेटे को बाहर बार दवाई दी थी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया था । लाड दिखाने का उन का यही तरीका था । डैनिका भी दिल भर आया था । माँ से लंबी बातचीत से जो भी बेचैन हो उठी थी उसने माँ के हाथ से फोन छीन लिया और पूरे सुर में चाहती थी । इस बार मेरे को क्या मिलेगा? भैया अरे अभी तो स्कूटी दी है तो ये बहुत नौकरी मिलने पडती थी । मुझे इस बार कुछ बढिया चाहिए । अच्छा बहना, बढिया दूंगा । तेरे लिए भावी लिया हूँ क्या? युवती चौक गई थी उसने बोलने की कोशिश की थी पर आवाज फस गई थी । अचानक भाभी का जिक्र उसके गले नहीं उतरा था । उसने फोन माँ को दवा दिया था । नहीं है मेरे लिए भाभी ला रहे हैं । वो बुदबुदाई थी माने फोन को ले लिया था पर कुछ पल वो भी संसी खडी रह गई थी । ये ज्योति क्या कह रही है दिन हूँ । उन्होंने आखिरकार पूछा था कुछ नहीं आॅस्कर बात टाल दी थी । मैं तो इस की खिचाई कर रहा था । देखा भाभी का नाम सुनते ही घबरा गई । पता नहीं क्या करेगी जब वो वास्तव में आ जाएगी । सैनी ने ढाका लगाया था परमाणु मैं दो चार दिन बाद घर आ रहा हूँ । मैं सोच रहा था अब आप लोगों के लिए अच्छा सा घर किराए पर ले देखो । देखो नामक करना हो तो मेरे लिए पिताजी और ज्योति के लिए मुझे इतना तो करने दो । वो अपने द्विवेदी अंकल है ना की प्रॉपर्टी का काम करते हैं । उन से कहो तीन चार हजार रुपए का कोई मकान तलाश कर रहे हैं । वहाँ को गश्त आ गया था । चार हजार इतना महंगा तो पागल हो गया है क्या दिनों? हाँ, तुम्हारा बेटा नालायक नहीं निकला है । इतना तो आसानी से कर सकता है । बाहर होने लगी थी । साथ में खडी ज्योति भी । दोनों खुश थी । उन का दिन लोग इतना कामयाब हो गया है कि अपने बूते पे उनको दो कमरे के तंग मकान से रिहाई दिला रहा है । तीन चार हजार का किराया देने को तैयार है । पिताजी पास बैठे सब सुन रहे थे, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा था । बेटे की पेशकश नाम का सीना फूला दिया था । ब्रांच हेड की कुर्सी संभालते ही डैनी ने अपने को काम में झोंक दिया था । अनुभव विशाल के वक्तव्यों से खाली बैठना पडा था और उस दौरान उसने बैंक के कामकाज में दिक्कतों को नामजद कर लिया था । अब उन पर अमल करने का समय आ गया था । उसे क्रेडिट कार्ड बिक्री को बढाकर बैंक के अफसरों को अपना मुरीद बनाना था । साथ ही अलग अलग विभागों को उसे ऐसी पटरी पर डालना था और ब्रांचों के लिए मिसाल बन जाए । दैनि ने मुख्यालय से असिस्टेंट मैनेजर की भर्ती के लिए कहा था । वहाँ से यहाँ आने के बाद उसने अपने जैसे एनडीए वालों के आवेदनों को खारिज कर दिया था । बैंक में कैश लो और ट्रेजरी ऑपरेशन का तजुर्बा रखने वालों को रख लिया था । उसके आते ही डैनी ने उनसे कमर तोड मेहनत करवाई थी । वो उसे पढना चाहता था । आदमी खराब निकला था । हर बार उसने देने की उम्मीद से ज्यादा ही करके दिखाया था । बैंक के रोज मर्रा का काम अब वो संभाल सकता था और डैनी अपना समय नेटवर्किंग में लगा सकता था । डैनी ने अपने स्टाफ में भी कई फेरबदल किए । निशा कोसने नए असिस्टेंट मैनेजर के साथ लगा दिया था और कैश का नया सिस्टम लागू करने के बहाने उसे देर शाम तक दफ्तर में बैठने के लिए मजबूर कर दिया था । निशा को अच्छा नहीं लगा था । बडा खुश था कि वह दुखी हो रही थी । आखिरकार विशाल के आने पर सबसे ज्यादा ताली उसी ने बताई थी । मोना को उसने रिसेप्शन से हटाकर क्रेडिट कार्ड की टेलीमार्केटिंग में डाल दिया था । रिसेप्शन पर मुस्करा मुस्कुराकर लोगों से काफी मेलजोल बढा लेती थी । अब्बू से ऐसे नहीं करने देगा मोना को मार्केटिंग सख्त ना पसंद थी इसलिए उसने उसको वहाँ लगाया था । विशाल की पार्टी का सारा इंतजाम मोना ने किया था । ट्रेनिंग जानता था । मोना को मालूम है वो खुन्नस निकाल रहा है । वो परेशान थी और इसलिए दुखती रग पर बाहर रखने से भी नहीं चूकता था । हर शाम काम का जायजा लेने के बहाने वो उसे अपने केबिन बुलाकर कॉफी पिलाता था । होना जाने से कतराती नहीं थी, रहने के लडके को समझती थी और इसीलिए गैर पालने की बजाय उसने डैनी को माफ कर दिया । वैसे मोनाको विशाल से ज्यादा दे नहीं पसंद था और अगर हालात अलग होते तो उसी के साथ खडी होती है । पर विशाल के समय की अपनी मजबूरियाँ थी । अनुभव का जाना और विशाल का आना तय था । अनुभव ज्यादा दिन नहीं चल सकता था जबकि विशाल लंबी रेस का घोडा लग रहा था । डैनी ने एका एक बरसात पलट दी थी । यानी सप्ताह के अंत में घर गया था जहां उसने मन भर कर माँ के हाथ का बना खाना खाया था । ज्योति के साथ खूब मस्ती की थी और जमकर सोया था । पिताजी ने मुंबई की मुलाकातों के बारे में जो भी सवाल किए थे उसका जवाब डैनी ने बढ चढ कर दिया था । उसने पिताजी को अपने जैसे पेशेवर लोगों के खर्चीले रहन सहन के बारे में अवगत कराया और आगाह किया था कि आज नहीं तो कल उसको बीस तहजीब का हिस्सा बनना पडेगा । मेरी ख्वाइश अगले पांच साल में वाइस प्रेजिडेंट बनकर एक लाख रुपए महीना कमाने की है । उसने देवकीनंदन के सामने अपनी इच्छा का बेबाक खुलासा किया । वो चुप रहे थे । कमाने और उडाने की नई लालसा पर उन्होंने अपनी राय जाहिर नहीं की थी । द्विवेदी अंकल ने एचआईजी मकान तलाश किया था । उसमें नाम था और गाडी खडी करने के लिए ग्यारह भी था । डैनी को मकान पसंद आया था और उसने फौरन सामान शिफ्ट करा दिया था । डाॅटर्स छत वाले दो कमरे के तंग मकान से निजात मिल गई थी । घरा उसके आने जाने के लायक हो गया था । गिर जा से मांगी हुई गाडी में बैठने से कुछ देर पहले दैनिक माँ को बताया था कि उसको दिल्ली में एक लडकी पसंद आ गई थी । आप लोग भी उसको देख लेंगे । अगर आपको ठीक लगती है तो फिर आगे सोचते हैं । मेरे को अगर पसंद है तो मुझे भी पसंद आएगी देना । उन्होंने बिहार से स्कूल चिपका लिया था तो अपनी पसंद देख हमारी चिंता मत कर । कुछ देर डैनी माँ की छाती से लगा रहा था । उसका दुलार पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था । पर बेटा इस बात का ख्याल रखना की जोडी बराबरी की होनी चाहिए । माँ ने उसका चेहरा उठाते हुए कहा था मुझे जिंदगी में अगर सिर उठाकर चलना है तो तेरे दोनों पर एक जैसे होने चाहिए । अगर कोई छोटा या बडा हुआ तो तू लडखडा जाएगा । दैनिक फिर उनके गले लग गया था । महान उसको सर पर हाथ फेर दिया था । कोई जल्दी नहीं है । बेटा उसको ठीक से देख समझ ले और तब तू जब कहेगा हम भी उसे आकर देख लेंगे । पैसे मेरी भी नजर में कुछ लडकियाँ हैं । उन्होंने मुस्कराकर कहा था हम पहले से देख लो बाकी लडकियों की बात हम बाद में करेंगे । ठीक है तो पिताजी को लडकी वालों के घर का पता पता बता जा बाकी तहकीकात खुद कर लेंगे । दैनिक कहना तो चाहता था कि मित्रा साहब पिताजी की पहुंच से बाहर हैं । उनके बारे में जानने के लिए महंगी मैगजीनें खरीदने पडेंगे जिसमें उनके फोटो और इंटरव्यू छपते थे । स्कूल की लाइब्रेरी बेटा ऐसी मैं जिन आप ही नहीं थी, जिनको पढकर मित्रा साहब जैसी शख्सियत से वो वाकिफ हो पाते । पिताजी से उसने शादी के बारे में कोई बात नहीं की थी । उसको तो माँ के मन में डालना था । इनका दिन हूँ । अपनी पसंद की लडकी से शादी करेगा । फिर कुछ समय बाद गिरिजा उसके घरवालों के बारे में वो थोडा थोडा बताना शुरू कर देगा । उनको अमीर खानदान की बहू लाने के लिए तैयार करेगा । पैसे भी गिर जाए और उनका रिश्ता दूर का ही रहना था । क्योंकि नौकरी की भागदौड उसे घर से अलग रखने वाली थी । असल और कारगर रिश्ता तो उसका और गिरजा का बनना था । उसका और बित्रा साहब और देसाई साहब का बना था । मगर देसाई साहब ने गिर जा के बारे में सोच लिया था । उनके बीवी एक साल से अपनी बेटी को बहाने पर आमादा थी । मैं आलोक कब और इंतजार नहीं कर सकती हूँ । वो एक दिन अचानक भडक उठी थी । उन्हें कॉल खेलने से फुर्सत नहीं । बेटी शादी लायक हो गई है । पर उनसे क्या तुम फौरन लडका तलाश हूँ क्योंकि मुझे गिरजा की शादी कर रही हैं । देसाई साहब खोज में लग गए थे और जल्द ही कई रिश्ते आ गए थे । उनमें से एक उन्हें बेहद पसंद आया था । लडका आईआईएम अहमदाबाद से था । अट्ठाईस साल का उसके पिता एक विदेशी कंपनी के चेयरमैन थे और वह बंगोली भी थे । गिरजा की माँ लडके से मिलकर इतना जोश में आ गई थी कि हीरो का कडा देकर तुरंत रोकना चाहती थी । एन वक्त पर देसाई साहब ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था । पहले गिरजा से तो मिलवा तो उन्होंने प्यार से झटका था । उसके हाँ कहने के बाद ही कोई रस्म करना । गिरजा उसी इतवार को अनमोल से मिली थी जब डैनी उसकी कार लेकर अपने घर गया था । गिर जा की माँ से नहीं बताया था कि वो उसे अनमोल से मिलवाने के लिए बुला रही है । बस इतना कहा था कि दोपहर के वक्त आ जाना । शादी की बात करने से पहले वो देखना चाहती थी कि गिर जाए और अनमोल आपस में कैसे घुलते मिलते हैं । पैसे भी गिर जा । जब भी लडकी थी जिसको मन मर्जी से ढाका नहीं जा सकता था । सिर्फ प्यार से सही रास्ता दिखाया जा सकता था । गिरजा और अनमोल की खूब बनी थी । अनमोल उन लडकों में था तो बडी नफासत से अपनी बात कहने और उसको मनवाने का होना रखता था । वो जानता था किस वक्त हाँ में हाँ मिलानी है और कब और कैसे न कहना है ना एक दफा की कोई सलीके से पेश करता था कि सुनने वाला उसकी अदा पर फिदा हो जाता था । अनमूल की विदेश यात्राओं के किस्से और नौकरी की अलबेली कहानियाँ गिरजा को खूब पसंद आई थी । उसने ऐसा समा बांधा की गिरजा एक मन होकर उसको सुनती रही थी । अपनी माँ के घर पहली बार उसे ऐसा मेहमान मिला था जिससे मिलकर उसको अच्छा लगा था । अनमोल ने मौका देखकर उसको अगले द्वार सात कॉफी पीने की दावत भी दे दी थी । गिर जाने फौरन हाँ कर दी थी । ऍम कैसा लगा? गिरजा की माँ ने बाद में पूछा । बहुत अच्छा गिरजा चाहती थी तो फिर हम उसके घर वालों से बात करें । जल्दी क्या है देखती हूँ । बुधवार को पहले से मिल लूँ फिर बताउंगी नहीं उन जल्दी नहीं डालेंगे । लेकिन तुम अपना मन जल्द से जल्द बनाओ । ऐसे लडके रोज नहीं मिलते हैं । मालूम है वहाँ अनमूल बहुत अच्छा है हूँ । वो माँ के गले लग गई थी । मैसेज देसाई को लगा था जैसे उनके सर से बहुत बडा बोझ उतर गया था । जो का मित्र साहब नहीं कर पाए थे उन्होंने आसानी से कर दिया था । वैसे भी ये किसी काम के लायक नहीं थे । बस खेल सकते थे । मैं सरदेसाई ने गुस्से से अपनी गर्दन झटक दी थी । डैनी रात ग्यारह बजे सहारनपुर से लौटा था । गिरजाघर पर नहीं थी तो टेलीविजन देखने बैठ गया । उसने अपना काम कर दिया था । घर वाले बेहतर रिहाइश में पहुंच गए थे और शादी का इरादा भी उसने उनको बता दिया था । अब कुछ दिनों बाद सबको दिल्ली बुलाकर वो देखा दिखाई भी पूरी करवा देगा और उसके बाद सहारनपुर में छोटी सी मंगनी की रस्म हो सकती थी । दैनिक ध्यान शादी पर चला गया था । मित्रा साहब अपनी बेटी की शादी जरूर बडे धूम धडाके से करना चाहेंगे । उनके बहुत सारे रिश्तेदार, दोस्त और जानने वाले इसमें शिरकत करने के लिए बेताब होंगे । सभी ऊपर के तबके के नामीगिरामी लोग होंगे और उस की तरफ से ऐसा कोई नहीं होगा । डैनी ने मनी मंत्री अपने मेहमानों की फेहरिस् बनानी शुरू की थी और फिर उसमें से ढेरों नाम कार्ड भी दिए थे । ऐसे लोगों को बनाने से क्या फायदा था? शादी की शानशौकत बचाना पाएं और अपनी हैसियत दिखाकर सबको शर्मिंदा कर रहे हैं । गिरजा आधी रात के बाद लौटी थी । उसके चेहरे की लाली और चहक बता रही थी कि ब्लडी मैरी की संगत खूब रही थी । ऐसा नहीं था वो रोज पीती थी पर जब भी मेरी जी से मिलना होता था तो अच्छी चलती थी । दैनिक को हल्की सी तुमने गिर जाता । दिलकश रख दीजिए । ब्लडी मैरी कॉम टमाटर का रस उसके गालों पर चला जाता था और बहुत का उसकी आंखों में चमक खोल देती थी । जिससे गिरिजा का अलग पन खेल होता था । वो मस्त हो जाती थी आई उसने आते ही डैनी को बाहों में पढ लिया था । कब आएगा एक घंटा पहले कैसा है सब बढिया और हमारा दिन कैसा रहा? फिर उस की गोदी में असर गयी । उसकी आंखों में शरारत कह रही थी । आज दोपहर में मम्मी के घर गई थी और वहाँ बहुत दिलचस्प लडके से मुलाकात हुई । उसके आस मारते हुए कहा था, हाँ आया अहमदाबाद का है । मम्मी ने उसे खाने पर बुलाया था तो ऐसे नहीं मुलाकात उसने सहजता से पूछा था । पर आई एम के चार लाख चार बार उसके सीने में खंजर की तरह कर चुके थे । अच्छा लगा । मैंने उसे भी बता दिया है कि वह मुझे अच्छा लगा है । बढिया दैनिक बुलाया था और मैं उस से शादी भी कर सकती हूँ । उसने आधी बंद आपको से झांककर इरादा जताया था । डैनी चौक गया था नहीं नहीं कर सकती है तो वही मुझे शादी हो चुकि है । उसकी आवाज कुछ ऊंची हो गई थी । गिरजा उसकी गोदी से उठ खडी हुई थी । हमने शादी करने का फैसला किया था और फिर कर ली थी । अब हम कुंवारे होने का फैसला कर लेते हैं । जब हम अपने को बिहार सकते हैं तो अनबिया क्यों नहीं सकते हैं? नहीं तो है इसमें परेशानी क्या है? डैनी उसका तरफ सुनकर सन्न रह गया था । पर मैं कौन हूँ? उसने हडबडाहट में पूछा था मेरे बारे में कुछ बताओ जो सच है । मतलब दैनिक खुला का खुला रह गया था । बताएंगे हम कुछ दिन साथ रहे थे । धोनी के पैर कहाँ गए थे? उसने प्रसिद्ध दीवार से टिका दिया । गिर जाने मोहब्बत से उसके बालों में उंगलियां विरोधी थी । मैंने कहा था वो मुझे अच्छा लगा है । तुमसे भी तो प्यार करती हूँ पर तुम शादी करने की बात कर रही थी । हाँ भी सकती हूँ । अभी क्या मालूम क्या होगा । गिर जाने कम थे । उसका आए थे और बेडरूम की तरफ चल दी थी । दैनिक उसका हाथ पकड लिया था । क्या तुम्हारा मन मेरे बारे में अभी विपक्षा नहीं है, पर बुधवार तक देखते हैं दैनिक का माथा चूमकर वह बेडरूम में चली गई थी । दैनिक अखबार था । कुछ देर बाद वह से जरूर पुकारेगी पर उसके डर से कोई आवाज नहीं आई थी ।

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अदभुत प्रेम की विचित्र कथा writer: अश्विनी भटनागर Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Ashvini Bhatnagar
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