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इरफ़ान खान: टायर वाले से एक्टर बनने तक का सफर in hindi | Irrfan Khan: Tyre waale se Actor banne tak ka safar हिन्दी मे |  Audio book and podcasts

इरफ़ान खान: टायर वाले से एक्टर बनने तक का सफर in hindi

Show: Yaadien Bhooli Bisari
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00:16:31
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एक छोटा सा बच्चा जो बनना चाहता था क्रिकेटर पर बन गया हिंदी सिनेमा का सुपर स्टार. कैसे शुरू हुआ इरफ़ान की एक्टिंग का सफर ? जब इरफ़ान खान बुरी तरह से टूट गए थे रिजेक्शन्स देख देख कर ! “I suppose in the end, the whole of life becomes an act of letting go, but what always hurts the most is not taking a moment to say Goodbye.” These were the words of the veteran actor Irfan Khan in his Hollywood movie ‘Life of Pie’. He was born as Sahabzade Irfan Ali Khan on 7 January,1967 in a village called Tonk in Rajasthan. His mother had a royal lineage and his father was a self-made businessman. Irfan, in the latter days of life, has denounced ‘Sahabzade’ and added an extra ‘r’ to his name; from Irfan to Irrfan. Irfan in his interview had often mentioned that no one believed that he would become an actor one day as he has a slender physique. Irfan had his theater practice from one of the renowned drama schools in India i.e. National School of Drama. He was highly mesmerized and inspired by the legendary actor Nasiruddin Shah. When Irfan moved to Mumbai, a city of dreams, he acted in several serials like Chanakya, Bharat ek Khoj, Banegi apni baat, Chandrakanta, Shrikant and Sparsh. He acted in many serials but he never got the due to his brilliant acting. In the year 1988, Irfan got his first movie in Bollywood named Salaam Bombay! But it was a small cameo role. Life could never be easy on Irfan! After the years of struggle, he could get recognition for his characters in the dramas Haasil (2003) and Maqbool (2004). Then, it was no-stopping for Khan. He starred in movies like The Namesake (2006), Life In a …Metro (2007) and Paan Singh Tomar (2011). Irfan Khan had delivered applaudable performances in movies like Piku (2015), The Lunchbox (2013), Hindi Medium (2017), and Karwaan (2018). His witty and comedic characters touched everyone’s heart. Unfortunately, on 29, April, 2020 at the age of 54, bid adieu all his fans' teary eyes and left for heavenly abode. His incandescent talent will always shine and mark its eternity. To know more about Irfan Khan’s biography in Hindi, you can tune into our audiobook presentation! आदमी जितना बड़ा होता है.. उसके छुपने की जगह उतनी ही कम होती है। यह डायलॉग है इरफ़ान खान की फिल्म कसूर से। इरफ़ान का जन्म साहबज़ादे इरफ़ान अली खान के रूप में 7 जनवरी, 1967 को राजस्थान के टोंक नामक गाँव में हुआ था। उनकी माँ का शाही वंश था और उनके पिता स्व-निर्मित व्यवसायी थे। इरफान ने अपने साक्षात्कार में अक्सर उल्लेख किया था कि किसी को विश्वास नहीं था कि वह एक दिन अभिनेता बन जाएगें क्योंकि वह दुबले-पतले से थे। इरफ़ान ने भारत के प्रसिद्ध नाटक स्कूलों में से एक - नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अपनी थिएटर की पढ़ाई की थी। वह महान अभिनेता नासिरुद्दीन शाह से बेहद प्रेरित थे। जब इरफ़ान सपनों की नगरी मुंबई में गए, तो उन्होंने चाणक्य, भारत एक खोज, बनेगी अपना बात, चंद्रकांता, श्रीकांत और स्पर्श जैसे कई धारावाहिकों में अभिनय किया। उन्होंने कई धारावाहिकों में अभिनय किया लेकिन उन्हें अपने शानदार अभिनय के लिए ज़्यादा प्रशंसा नहीं मिली। वर्ष 1988 में इरफ़ान को बॉलीवुड में पहली फिल्म सलाम बॉम्बे नाम से मिली। लेकिन यह एक कैमियो भूमिका थी। इरफ़ान पर जिंदगी इतनी मेहरबान नहीं थी। वर्षों के संघर्ष के बाद, वह नाटक- हासिल (2003) और मकबूल (2004) में अपने पात्रों के लिए मान्यता प्राप्त कर सके। उन्होंने द नेमसेक (2006), लाइफ इन ए… मेट्रो (2007) और पान सिंह तोमर (2011) जैसी फिल्मों में अभिनय किया। इरफान खान ने पिकू (2015), द लंचबॉक्स (2013), हिंदी मीडियम (2017) और कारवाँ (2018) जैसी फिल्मों में उनके मजाकिया और हास्य किरदारों ने सभी का दिल छू लिया। दुर्भाग्य से, 29 अप्रैल, 2020 को इरफ़ान दुनिया को अलविदा कह गए। इरफ़ान खान के जीवनी के बारे में अधिक जानने के लिए, आप हमारी ऑडियो बुक हिंदी में सुन सकते हैं! “I suppose in the end, the whole of life becomes an act of letting go, but what always hurts the most is not taking a moment to say Goodbye.” These were the words of the veteran actor Irfan Khan in his Hollywood movie ‘Life of Pie’. He was born as Sahabzade Irfan Ali Khan on 7 January,1967 in a village called Tonk in Rajasthan. His mother had a royal lineage and his father was a self-made businessman. Irfan, in the latter days of life, has denounced ‘Sahabzade’ and added an extra ‘r’ to his name; from Irfan to Irrfan. Irfan in his interview had often mentioned that no one believed that he would become an actor one day as he has a slender physique. Irfan had his theater practice from one of the renowned drama schools in India i.e. National School of Drama. He was highly mesmerized and inspired by the legendary actor Nasiruddin Shah. When Irfan moved to Mumbai, a city of dreams, he acted in several serials like Chanakya, Bharat ek Khoj, Banegi apni baat, Chandrakanta, Shrikant and Sparsh. He acted in many serials but he never got the due to his brilliant acting. In the year 1988, Irfan got his first movie in Bollywood named Salaam Bombay! But it was a small cameo role. Life could never be easy on Irfan! After the years of struggle, he could get recognition for his characters in the dramas Haasil (2003) and Maqbool (2004). Then, it was no-stopping for Khan. He starred in movies like The Namesake (2006), Life In a …Metro (2007) and Paan Singh Tomar (2011). Irfan Khan had delivered applaudable performances in movies like Piku (2015), The Lunchbox (2013), Hindi Medium (2017), and Karwaan (2018). His witty and comedic characters touched everyone’s heart. Unfortunately, on 29, April, 2020 at the age of 54, bid adieu all his fans' teary eyes and left for heavenly abode. His incandescent talent will always shine and mark its eternity. To know more about Irfan Khan’s biography in Hindi, you can tune into our audiobook presentation! आदमी जितना बड़ा होता है.. उसके छुपने की जगह उतनी ही कम होती है। यह डायलॉग है इरफ़ान खान की फिल्म कसूर से। इरफ़ान का जन्म साहबज़ादे इरफ़ान अली खान के रूप में 7 जनवरी, 1967 को राजस्थान के टोंक नामक गाँव में हुआ था। उनकी माँ का शाही वंश था और उनके पिता स्व-निर्मित व्यवसायी थे। इरफान ने अपने साक्षात्कार में अक्सर उल्लेख किया था कि किसी को विश्वास नहीं था कि वह एक दिन अभिनेता बन जाएगें क्योंकि वह दुबले-पतले से थे। इरफ़ान ने भारत के प्रसिद्ध नाटक स्कूलों में से एक - नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अपनी थिएटर की पढ़ाई की थी। वह महान अभिनेता नासिरुद्दीन शाह से बेहद प्रेरित थे। जब इरफ़ान सपनों की नगरी मुंबई में गए, तो उन्होंने चाणक्य, भारत एक खोज, बनेगी अपना बात, चंद्रकांता, श्रीकांत और स्पर्श जैसे कई धारावाहिकों में अभिनय किया। उन्होंने कई धारावाहिकों में अभिनय किया लेकिन उन्हें अपने शानदार अभिनय के लिए ज़्यादा प्रशंसा नहीं मिली। वर्ष 1988 में इरफ़ान को बॉलीवुड में पहली फिल्म सलाम बॉम्बे नाम से मिली। लेकिन यह एक कैमियो भूमिका थी। इरफ़ान पर जिंदगी इतनी मेहरबान नहीं थी। वर्षों के संघर्ष के बाद, वह नाटक- हासिल (2003) और मकबूल (2004) में अपने पात्रों के लिए मान्यता प्राप्त कर सके। उन्होंने द नेमसेक (2006), लाइफ इन ए… मेट्रो (2007) और पान सिंह तोमर (2011) जैसी फिल्मों में अभिनय किया। इरफान खान ने पिकू (2015), द लंचबॉक्स (2013), हिंदी मीडियम (2017) और कारवाँ (2018) जैसी फिल्मों में उनके मजाकिया और हास्य किरदारों ने सभी का दिल छू लिया। दुर्भाग्य से, 29 अप्रैल, 2020 को इरफ़ान दुनिया को अलविदा कह गए। इरफ़ान खान के जीवनी के बारे में अधिक जानने के लिए, आप हमारी ऑडियो बुक हिंदी में सुन सकते हैं!

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