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मेजर ध्यानचंद  | लेखक - सचिन गोस्वामी  in hindi |  हिन्दी मे |  Audio book and podcasts

Story | 27mins

मेजर ध्यानचंद | लेखक - सचिन गोस्वामी  in hindi

AuthorSACHIN GOSWAMI
Major Dhyanchand Biography Author : Sachin Goswami Voiceover Artist : RJ Chaitali मेजर ध्यानचंद | लेखक - सचिन गोस्वामी in Hindi, is one of our best biography stories available in Hindi in our catalog. This story is created by SACHIN GOSWAMI. SACHIN GOSWAMI is a prominent personality known for writing biography stories. Biography stories not just talk about the life of a person and his/her achievements but their struggles as well. A successful person is not just known for his luxurious life but due to his hard work. There are so many celebrities, sportspersons, and businessmen who have worked hard throughout their lives. And we get to learn a lot from their life. Hence, biography stories are of great help if you are seeking motivation to work hard. The inspiration we get from people is the stepping stones that lead us to a successful goal. If we apply the rules they’ve applied then we are sure to get what they achieved. We understand that our users emotionally connect with the audios more when it is in their language. Hence, we offer a variety of biography stories in different languages like Hindi, Gujarati, Telugu, Marathi, Bangla, etc. These biography stories are available for free and can be downloaded and saved on our app. And the best part is that you can access it while traveling, while working out in the gym, and doing anything, anywhere at any point of time be it early morning or late at night. So, stream, download, and enjoy the ad-free experience.मेजर ध्यानचंद | लेखक - सचिन गोस्वामी हिंदी में, हमारी सूची में हिंदी में उपलब्ध हमारी सर्वश्रेष्ठ जीवनी कहानियों में से एक है । यह कहानी SACHIN GOSWAMI द्वारा लिखी गई है। SACHIN GOSWAMI जीवनी कहानियां सुनाने के लिए जाना जाने वाला एक प्रमुख व्यक्तित्व है । जीवनी कहानियां न सिर्फ किसी व्यक्ति के जीवन और उसकी उपलब्धियों के बारे में बात करती हैं बल्कि उनके संघर्षों के बारे में भी बात करती हैं । एक सफल व्यक्ति सिर्फ अपनी आलीशान जिंदगी के लिए नहीं बल्कि अपनी मेहनत के कारण जाना जाता है। ऐसी कई हस्तियां, खिलाड़ी और बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने जिंदगी भर मेहनत की है। और हमें उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । इसलिए, जीवनी कहानियों बहुत मदद की है अगर आप कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरणा ढूंढ रहे हैं तो । प्रेरणा हमें लोगों के दृड़संकल्प व एक सफल लक्ष्य के लिए नेतृत्व रखने वालो से मिलती है। हम समझते हैं कि हमारे उपयोगकर्ता भावनात्मक रूप से ऑडियो के साथ अधिक कनेक्ट करते हैं जब यह उनकी भाषा में होता है। इसलिए, हम हिंदी, गुजरती, तेलुगू, मराठी, बांग्ला आदि जैसी विभिन्न भाषाओं में विभिन्न प्रकार की जीवनी कहानियां पेश करते हैं। ये जीवनी कहानियां मुफ्त में उपलब्ध हैं और हमारे ऐप पर डाउनलोड किए जा सकते हैं। और सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे यात्रा करते समय, जिम में काम करते समय, और कुछ भी काम करते समय, इसे किसी भी समय - सुबह जल्दी या देर रात में सुन सकते है । इसलिए, विज्ञापन-मुक्त अनुभव को स्ट्रीम करें, डाउनलोड करें और आनंद लें।
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Writer - Sachin Goswami जादूगर ..वह शक्स जो जादू जानता हो और समय समय पर अपने जादू का प्रमाण देता हो । अक्सर एक अच्छे जादूगर के बारे में कहा जाता है कि एक अच्छा जादूगर वह होता है ,जो अपने जादू से आपको मोह सके और आप उस पल में सारी दुनिया को भूल जाए और केवल उस जादू को निहारते रहे, देखते रहे और उसमें खो जाए । ये हुई एक अच्छे जादूगर की निशानी पर अगर कोई पूछे कि इससे भी ऊपर कोई होता है क्या? तो जवाब हैं हां , श्रेष्ठ जादूगर । श्रेष्ठ जादूगर वह होता है जिसके जादू को ना केवल उस पल याद करें बल्कि समय के साथ इसकी छाप गहरी होती जाए । दशकों बीत जाने के बाद भी उसका जादू आपके जेहन पर हावी रहे ,यही श्रेष्ठ जादूगर की निशानी है । ऐसे ही बिरले श्रेष्ठ जादूगर है मेजर ध्यानचंद ,जिन्होंने अपने जादू से भरे खेल से ना केवल हॉकी ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया इसके साथ साथ भारत का परचम पूरी दुनिया में फैला दिया। मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में 29 अगस्त 1905 में राजपूत परिवार में हुआ। उनकी माता का नाम शारदा सिंह और पिता रामेश्वर सिंह थे ।उनके दो छोटे भाई थे ,एक भाई रूप सिंह जो विख्यात हॉकी खिलाड़ी थे और उन्होंने भारत के लिए खेला था । ध्यानचंद के पिता ब्रिटिश सेना में काम कार्यरत थे और उन्होंने सेना के लिए हॉकी खेला था । बचपन में पिता की नौकरी के तबादले के चलते परिवार को विभिन्न शहरों में रहना पड़ा ,जिसके कारण ध्यानचंद को अपनी स्कूली पढ़ाई 6 साल के बाद छोड़नी पड़ी और पिता के आर्मी से रिटायर होने के बाद परिवार ने झांसी उत्तर प्रदेश में निवास किया। बचपन में ध्यानचंद को खेलों के प्रति कोई ज्यादा लगाव नहीं था केवल कभी-कभी कुश्ती का मैच देख लेते थे । हॉकी का शौक उन्हें तब लगा जब उन्होंने सेना में भर्ती हुए ।सेना में भर्ती होने के बाद उन्होंने हॉकी का अभ्यास शुरू किया और बाद में सेना की तरफ से कई हॉकी टूर्नामेंट में भाग लिया। सेना में ध्यानचंद का सफर 17 साल की आयु में शुरू हुआ ,जब उन्होंने 29 अगस्त 1922 में सेना की फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट में सिपाही के रूप में भर्ती ली । यही शाखा आगे चलकर फर्स्ट पंजाब रेजीमेंट बनी। 1922 से 1926 तक चंद्र ने अपनी रेजीमेंट के लिए काफी अभ्यास और हॉकी टूर्नामेंट खेले, उनके शानदार प्रदर्शन की बदौलत उन्हें जल्दी ही भारतीय सेना की हॉकी टीम में चुन लिया गया जो न्यूजीलैंड का दौरा करने वाली थी इस दौरे में सेना टीम ने 21 मैच खेले जिसमें से 18 मैंच जीते ,दो ड्रॉ रहे और एक मैच हारा। चंद ने इन मैचों में अपनी बेहतरीन कला का परिचय दिया ,जिसका इनाम उन्हें भारत लौटने पर 1927 में लांस नायक के पद पर प्रमोशन के रूप में दिया गया। 1922 से लेकर 1926 तक , यह कुछ साल हॉकी के लिए बदलाव भरे रहे। 1924 ओलंपिक में हॉकी को यह कहकर निकाल दिया गया कि विश्व में हॉकी का कोई स्ट्रक्चर नहीं है, इस कमी को दूर करने के लिए 1924 में विश्व हॉकी संस्था का गठन हुआ । इसी की देखा देखी , 7 नवंबर 1925 को इंडियन हॉकी फेडरेशन की स्थापना हुई ।जब हॉकी का स्ट्रक्चर बन गया तो ओलंपिक समिति ने 1928 ओलंपिक के लिए हॉकी को शामिल कर लिया तब से यह खेल हॉकी ओलंपिक का हिस्सा है। 1928 ओलंपिक में बेहतर तैयारी के लिए सन 1925 में इंटर प्रोविंशियल टूर्नामेंट का आयोजन किया ।उद्घाटन सत्र में 5 टीमों ने हिस्सा लिया ,ये टीम थी यूनाइटेड प्रोविंस (UP), पंजाब ,बंगाल , राजपूताना और सेंट्रल प्रोविंस । चंद्र को सेना ने यूनाइटेड प्रॉमिनेंस की तरफ से खेलने की अनुमति प्रदान की। ध्यान सिंह के ध्यान चंद बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है । दरअसल ध्यान सिंह दिन भर सेना में अपनी सेवा देते थे और हॉकी से लगाव इतना गहरा था कि रात में वह हॉकी की हॉकी का अभ्यास करते थे ।लेकिन उस वक्त न तो फ्लड लाइट की सुविधा थी और ना ही कोई और वैकल्पिक स्रोत । इसलिए ध्यान सिंह को चांद की रोशनी का इंतजार करना पड़ता था, जब चांद की रोशनी होती, तब ध्यान सिंह अपना हॉकी का खेल निखारते , इसी घटनाक्रम से लोग बहुत प्रभावित हुए और उनके साथी खिलाड़ियों में उन्हें चंद कहना शुरू कर दिया और ध्यान सिंह ध्यान चंद बन गए। 1928 ओलंपिक की तैयारी के लिए शुरू हुए टूर्नामेंट के पहले मैच में ध्यानचंद ने सेंटर फॉरवर्ड में खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया ।टूर्नामेंट के पहले मैच में शुरुआत के 3 मिनट में ध्यानचंद ने अपने जादुई खेल से गोल कर दर्शकों के दिल में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी ।टूर्नामेंट के खत्म होते होते ध्यानचंद सभी के चहेते खिलाड़ी बन गए और टूर्नामेंट बहुत कामयाब रहा ।इसी कामयाबी का नतीजा था कि हॉकी फेडरेशन ने इससे हर 2 वर्ष पर आयोजित करने का फैसला किया। भारत की हॉकी टीम 1928 ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए 10 मार्च 1927 को लंदन में Folkestone festival में स्थानीय टीम के साथ मैच खेला था यह मैच का आयोजन वर्ल्ड ओलंपिक की तैयारी और फंड की कमी को पूरा करने के लिए किया था हॉकी टीम ने अपने ग्यारह मैच जीते ,जिसमें ध्यानचंद और उनके मिडफील्डर साथी ब्रूम एरिज पेनिंगर का शानदार खेल रहा । कहा जाता है की भारतीय टीम का खेल इतना शानदार था कि जिससे घबराकर 1928 ओलंपिक में इंग्लैंड ने अपनी टीम उतारने से मना कर दिया और इंडियन हॉकी टीम को ब्रिटिश इंडिया टीम के रूप में खिलाया गया। २४ अप्रैल को भारतीय टीम ने अपने ओलंपिक इस सफर की शुरुआत की टूर्नामेंट से पहले उनका सामना अभ्यास मैच में स्थानीय डच, जर्मन और बेलगाम टीम के साथ था जिस भारत ने बहुत ही बड़े अंतर से जीत लिया। ग्रीष्मकालीन 1927 ओलंपिक में ब्रिटिश भारतीय हॉकी टीम को ऑस्ट्रिया बेल्जियम डेनमार्क और स्विट्ज़रलैंड के साथ ग्रुप ए में रखा गया । 17 मई को भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक में अपना आगाज ऑस्ट्रिया पर 6-0 से जीत के साथ शुरू किया जिसमें चंद ने तीन गोल किए अगले दिन बेल्जियम को 9-0 से हराया , जिसमें चंद ने एक गोल दागा । इस सफर में अगले मैच भारत का मुकाबला डेनमार्क से था जिसे चंद के शानदार गोल से 5- ० से हराया । चार दिन में 3 मैच खेलकर और जीत कर भारत सेमीफाइनल में पहुंचा । 2 दिन बाद सेमीफाइनल में भारत का मुकाबला स्विट्ज़रलैंड से था जिसमें चंद ने चार गोल किए भारत में यह मुकाबला 6-० से जीता । लगातार मैच खेलने से टीम के कई खिलाड़ियों को चोट लग गई थी जिसमें फिरोज खान ,शौकत अली और खेर सिंह भी थे ।चंद भी बीमार हो चुके थे और फाइनल में भारत का मुकाबला टीम का मुकाबला स्थानीय टीम नीदरलैंड्स से था । बड़े खिलाड़ियों गैरमौजूदगी के कारण खराब सेहत के बावजूद चंद मुकाबला खेलने उतरे। आधी ताकत से उतरी टीम ने चंद के दो बेहतरीन गोल से नीदरलैंड को 3-० से हरा दिया । इस जीत के साथ भारत ने अपना पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल जीत लिया । पांच मैचों में 14 गोल दाग कर ध्यानचंद टूर्नामेंट के टॉप स्कोरर बने । पूरे टूर्नामेंट में भारत का प्रदर्शन इतना शानदार था जिसकी तारीफ में एक स्थानीय अखबार ने लिखा । "This is not a game of hockey but magic. Dhyan Chand is infact the magician of hockey" देश लौटने पर टीम का स्वागत बड़े जोरदार तरीके से हुआ हजारों की तादाद में लोग मुंबई बंदरगाह पर आए । टीम के शानदार प्रदर्शन का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब टीम ओलंपिक खेलने के लिए गई थी तब उसे छोड़ने केवल तीन लोग आए थे और टीम की वापसी पर हजारों लोग उनका अभिवादन कर रहे थे यह था भारतीय टीम के खेल का जादू। ओलंपिक पदक जीतने के बाद चंद को सेना ने प्रमोशन दिया लांस नायक के पद पर सेना ने उनकी तब्दीली पंजाब रेजीमेंट के वजीरिस्तान में हो गई । 2 साल बाद 1932 ओलंपिक की तैयारी के लिए हॉकी फेडरेशन ने इंटर प्रोविंशियल टूर्नामेंट का आयोजन किया ।हॉकी फेडरेशन ने सेना से चंद को टूर्नामेंट में भेजने के लिए अनुमति मांगी जिसे सेना ने मना कर दिया । उसके बाद चंद ने अपना अभ्यास जारी रखा। चंद का खेल कितना शानदार था,इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें बिना टूर्नामेंट खेले भारत की हॉकी टीम में चुन लिया गया जबकि बाकी सभी खिलाड़ियों को चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। कहते है के विजेता टीम में ज्यादा बदलाव नहीं करने चाहिए ,पर 1932 की ओलंपिक टीम में 1928 के विजेता टीम के केवल चार खिलाड़ी थे जिनमें ध्यानचंद शामिल थे। इस बार टीम की कमान लाल साहब बोखारी के हाथों में थी ।ध्यानचंद के लिए टीम चयन में एक खुशखबरी विधि उनके छोटे भाई रूप सिंह को लेफ्ट इन के पोजीशन पर टीम में शामिल किया गया। ओलंपिक टीम टूर्नामेंट से पहले तैयारी परखने के लिए कोलंबो रुकी ।भारतीय टीम का जादू दिखा दोनों मैचों में । सिलोन(श्रीलंका) से खेले गए पहले मैच में भारतीय टीम ने 20- 0 से हराया और दूसरे मैच में १०- ० से हराया । टीम के शानदार प्रदर्शन की तारीफ सिलोन के अखबार में छपने लगी और टीम के शानदार प्रदर्शन की तुलना देवीय शक्ति से की जाने लगी । सिलोन में शानदार प्रदर्शन करने के बाद भारतीय टीम 30 मई को सैन फ्रांसिस्को के लिए रवाना हुई ।ओलंपिक शुरू से 3 हफ्ते पहले वे लॉस एंजिल्स पहुंच गए। 4 अक्टूबर 1932 को भारत ने अपना पहला मैच जापान के खिलाफ खेला, जिससे 11-1 से जीता। इस मैच में चंद, रूप सिंह और गुरमीत सिंह ने तीन तीन गोल दागे ।टूर्नामेंट का फाइनल 11 अगस्त को खेला गया जिसमें भारत का सामना मेजबान अमेरिका से हुआ। बेहतरीन खेल दिखाने वाली भारतीय टीम ने फाइनल में विकराल रूप दिखाया भारतीय मिडफील्डर और फॉरवर्ड अमेरिका के डिफेंस पर बरस पड़े और दन दनाते हुए चौबीस गोल कर दिए जो एक वर्ल्ड रिकॉर्ड बना यह वर्ल्ड रिकॉर्ड अगले 72 सालों तक कायम रहा। साल 2003 में यह रिकॉर्ड टूटा उस रिकॉर्ड भरे फाइनल में चंद ने आठ ,रूप सिंह में दस, गुरमीत ने पांच और पिरिंगिन एक गोल दागा । इस ओलंपिक में चंद्र को जोड़ीदार के रूप में उनके भाई का साथ प्राप्त हुआ। दोनों ने मिलकर कुल 35 गोल में 25 गोल दागे। इस शानदार प्रदर्शन को देखते हुए लोग उन दोनों को हॉकी ट्विंस कहने लगी ।इस शानदार प्रदर्शन की चर्चा लॉस एंजिल्स अखबारों में छपने लगी एक अखबार ने लिखा "The All-India field hockey team which G. D. Sondhi brought to Los Angeles to defend their 1928 Olympic title, was like a typhoon out of the east. They trampled under their feet and all but shoved out of the Olympic stadium the eleven players representing the United States." ओलंपिक के बाद भारतीय टीम ने लॉस एंजिल्स में यूनाइटेड स्टेट XI के साथ एक मैच खेला जिसे 24- 1 से जीत लिया ।न्यूयॉर्क के बाद भारतीय टीम का दौरा इंग्लैंड का था, जो काफी थका देने वाला था । 15 दिन के पखवाड़े में विभिन्न देशों में 9 मैच खेले, जिसमें 4 अंतरराष्ट्रीय मैच नीदरलैंड, जर्मनी ,चेक और हंगरी से थे। टीम ने इसके बाद अपना खर्चा निकालने के लिए सिलोन और भारत में मैच खेला। टूर्नामेंट के अंत तक भारत ने 37 मैच खेले थे जिसमें 34 जीते 2 ड्रॉ और एक रद्द हुआ। ध्यानचंद के खेल का असर इन आंकड़ों से पता चलता है की कुल 338 गोल में 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे, इस शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें भारत में हॉकी का जादूगर कहा जाने लगा। अगले कुछ साल ध्यानचंद के लिए घरेलू टूर्नामेंट में काफी अहम रहे साल 1933 में उन्होंने अपनी घरेलू टीम झांसी हीरोज की तरफ से beighton cup में भाग लिया जो उस समय का भारतीय हॉकी का सर्वश्रेष्ठ टूर्नामेंट था । इसी कप में ध्यानचंद की जिंदगी का सबसे अच्छा मैच खेला इसके बारे में उन्होंने लिखा है । If anybody asked me which was the best match that I played in, I will unhesitatingly say that it was the 1933 Beighton Cup final between Calcutta Customs and Jhansi Heroes. Calcutta Customs was a great side those days; they had Shaukat Ali, Asad Ali, Claude Deefholts, Seaman, Mohsin, and many others who were then in the first flight of Indian hockey. I had a very young side. Besides my brother Roop Singh, and Ismail, who played for the Great Indian Peninsular Railway in Mumbai, I had no other really great player in the team. But I had a team which was determined to do or die. It was a great match, full of thrills, and it was just opportunism that gave us the victory. Customs were pressing hard and our goal was at their mercy. Suddenly I broke through and from midfield gave a long through pass to Ismail, who ran with Jesse Owens' speed half the length of the ground. A misunderstanding occurred between the Customs left-half and the goalkeeper, and Ismail, taking every advantage of it, cut through and netted the only goal of the match. We felt very proud of our triumph. इस कप को जीतने के बाद झांसी हीरोज ने ध्यानचंद की कप्तानी में कोलकाता में खेला गया लक्ष्मी विलास कप जीता और साल 1935 में शानदार तरीके से bieghton कप को डिफेंड किया । दिसंबर 1934 में भारतीय हॉकी फेडरेशन ने टीम को न्यूजीलैंड के दौरे पर भेजा भाई रूप सिंह के साथ ध्यानचंद को बिना किसी ट्रायल के टीम में चयन कर लिया गया इस दौरे पर ध्यानचंद को एक अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली आलबदार के नवाब के मना करने पर टीम की कमान ध्यानचंद को सौंपी गई। इस लंबे टूर पर भारतीय टीम ने 48 मैच खेले जिसमें 28 न्यूजीलैंड के साथ ,बाकी सिलोन और ऑस्ट्रेलिया के साथ ।भारत के खेल का जादू यह रहा न केवल उसने हर मैच जीता बल्कि 584 गोल दाग दिए यानी औसतन हर मैच में 12 गोल । ध्यानचंद ने 48 मैच में 23 मैच खेले जिसमें उन्होंने 201 गोल दागे। भारत लौटने पर चंद वापिस अपनी बैरक में शामिल हो गए। दिसंबर 1935 में इंडियन हॉकी फेडरेशन ने ओलंपिक 1936 के लिए टीम चुनने के लिए इंटर प्रोविंशियल टूर्नामेंट का आयोजन किया । इस बार भी सेना ने ध्यानचंद को सेना ने खेलने की अनुमति नहीं दी और इस बार भी चंद को बिना ट्रायल दिए ओलंपिक टीम में चुन लिया गया। ओलंपिक टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही । दौरे की शुरुआत में घर में खेले गए अभ्यास मैच में दिल्ली XI के हाथों 4-1 से हार का सामना करना पड़ा ।इस हार के बाद टीम की ओलंपिक जीतने की संभावना पर प्रश्न उठने लगे । सारे प्रश्नों के साथ टीम 27 जून को मारिशिस के लिए रवाना हुई । अभ्यास मैच खेलने के बाद ओलंपिक टीम बर्लिन के लिए चल दी । मारिशिस से बर्लिन का सफर काफी भयावह रहा । टीम को थर्ड कंपार्टमेंट में बैठकर सफर करना पड़ा । इस भयावह सफर का अंत 13 जुलाई को तब हुआ ,जब टीम ने बर्लिन में कदम रखा । 17 जुलाई को भारत का अभ्यास मैच मेजबान जर्मनी के साथ था, जिसमें उसे 4-1 से शिकस्त खानी पड़ी । ये ओलंपिक में भारत की पहली हार थी । लगातार दो टूर्नामेंट जीतने वाली और हर मैच में विरोधी टीम को पराजित करने वाली टीम के इस तरह के आगाज की कतई उम्मीद नहीं थी । टीम की ओलंपिक जीतने की उम्मीद धूमिल हो गई थी । टीम के मनोबल को बढ़ाने के लिए टीम मैनेजर पंकज गुप्ता ने इन फॉर्म अली दारा को भारत से बुलावा लिया । अभ्यास मैच की हार भुलाने के लिए भारत के पास बीस दिन थे। टीम का पहला मुकाबला हंगरी से था, जिसे भारत ने 4-0 से जीतकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन दिखाया । ग्रुप के बाकी मैचों में भारत टीम ने दिखा दिया ,क्यों वे ओलंपिक चैंपियन हैं , उन्होंने USA को 7-0 से , जापान को 9-0 से हराया , जिसमें चंद ने छह गोल दागे । भारतीय टीम का चौथा मैच सेमीफाइनल मैच था जिसमें उनका सामना फ्रांस से था । इस मुकाबले में चंद के शानदार चार गोल की बदौलत टीम 10-0 से जीतने में सफल रही ।दूसरे सेमीफाइनल में मेजबान जर्मनी ने डेनमार्क को 6-0 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया । 19 अगस्त को फाइनल था भारत और जर्मनी के बीच । अभ्यास मैच की हार का असर दिख रहा था । लोग कहने लगे थे कि भारत और गोल्ड मेडल के बीच में कोई टीम अा सकती है , वो है जर्मनी और इस बार का गोल्ड मेडल जर्मनी का है । इन सब बातों का असर टीम के खिलाड़ियों पर काफी था । मैच की सुबह सभी खिलाड़ी काफी नर्वस थे ।उनकी इस नर्वसनेस को दूर करने के लिए मैनेजर पंकज गुप्ता ने टीम को लॉकर रूम में बुलाया । मीटिंग के दौरान उन्होंने congress tricolour flag को सामने रखा और कहा कि हमें इसके लिए मैच खेलना है और जीतना हैं । इससे सभी खिलाड़ियों में जोश का संचार हुआ । सभी खिलाड़ियों ने झंडे को सैल्यूट किया, प्रे किया और शेर की तरह मैदान पर खेलने के लिए उतरे । पहले हाफ में हॉकी का खेल तेज गति पर खेला गया ।भारतीय टीम जर्मन टीम पर चढ़कर खेल रही थी । हमेशा आक्रामक खेल दिखाने वाली जर्मन टीम रक्षात्मक मुद्रा में आ गई । सारी ताकत डिफेंस में छोकने के बाद भी जर्मन पहले भाग के खत्म होते होते 1-0 से पीछे थी । मध्यांतर के बाद दूसरे हाफ में भारतीय टीम ने हमले तेज कर दिए , जिससे जर्मन का डिफेंस पूरी तरह बिखर गया और भारत ने मैच 8-1 से जीत लिया । जिसमें चंद ने तीन, दारा ने दो , रूप सिंह और जफर ने एक एक गोल किया । कई मीडिया रिपोर्ट्स ने इस मैच की रिपोर्टिंग अलग तरीके से की । उन्होंने दावा किया कि फाइनल मैच ने चंद ने छह गोल दागे और भारत ने 8-1 से मैच जीता ,जबकि अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन ने तीन गोल की बात स्वीकार की है । इस मैच का जिक्र करते हुए ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा ' गोल ' में लिखा । When Germany was four goals down, a ball hit Allen's pad and rebounded. The Germans took full advantage of this and made a rush, netting the ball before we could stop it. That was the only goal Germany would score in the match against our eight, and incidentally the only goal scored against India in the entire Olympic tournament. India's goal-getters were Roop Singh, Tapsell and Jaffar with one each, Dara two and myself three चंद ने तीन ओलंपिक टूर्नामेंट खेले । जिसमें बारह मैचों में उन्होंने तैंतीस गोल दागे । 1936 ओलंपिक के बाद ध्यानचंद का एक किस्सा जग मशहूर हुआ ।फाइनल के बाद जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने ध्यानचंद की तारीफ की और उनसे मुलाकात की । मुलाकात के दौरान ,हिटलर ने पूछा कि भारत में क्या करते हो, तो चंद ने बताया कि वे सेना में सैनिक हैं । हिटलर ये सुनकर काफी हैरत में अा गया और तुरंत एक प्रस्ताव रखा कि तुम मेरे देश में अा जाओ , मैं तुम्हे कर्नल बना दूंगा और सारी सुविधाएं दूंगा । देशभक्ति के गौरव में ध्यानचंद ने आदरपूर्वक इस प्रस्ताव को मना कर दिया और कहा कि मैं सैनिक में खुश हूं । यह जवाब सुनकर हिटलर चकित रह गए । चंद के खेल का प्रभाव केवल हॉकी जगत तक सीमित नहीं था ,बल्कि ये जादू ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन को बर्लिन तक खींच लाया । मैच के बाद दोनों दिग्गज आपस में मिले, ध्यानचंद की तारीफ करते हुए डॉन ब्रैडमैन ने कहा कि जितने आराम से मैं रन बनाता हूं ,उतनी ही सहजता से ध्यानचंद गोल करते हैं । डॉन ब्रैडमैन का यह कथन ध्यानचंद के खेल के स्तर को बताने के लिए पर्याप्त है , कि वे कितने बड़े खिलाड़ी थे । ओलंपिक 1936 के बाद चंद ने दुबारा अपनी आर्मी रेजीमेंट को ज्वाइन किया । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे अपनी आर्मी हॉकी में व्यस्त हो गए । बस एक बार साल 1941 में beighton cup में खेलने के लिए कलकत्ता गए । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जहां विश्व में हॉकी बंद हो गई थी, तब ध्यानचंद का ध्यान अपनी आर्मी रेजीमेंट पर था । इस दौरान उन्हें प्रमोशन पर प्रमोशन मिल रहे थे ।पहले उन्हें वायसराय कमिश्नर ऑफिसर ( VCO) नियुक्त किया गया ।इसके बाद उन्हें जमेदार के पद पर प्रमोशन मिला । जब द्वितीय विश्व युद्ध में जब ऑफिसर्स की कमी होने लगी , तो चंद को जुलाई 1942 को कार्यवाहक सूबेदार बना दिया गया ।9 अप्रैल को चंद को आपातकालीन स्थिति में 14वी पंजाब बटालियन में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में मिला , जो युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट के समान था । युद्ध के अंतिम समय में आर्मी टीम का नेतृत्व किया, जिससे मणिपूर, बर्मा और सिलोन का दौरा किया । जब युद्ध 1945 में समाप्त हो गया ,तब चंद ने महसूस किया कि अब हॉकी में नए खिलाड़ियों का समय अा गया है और उन्हें सन्यास ले लेना चाहिए, लेकिन हॉकी के खेल प्रेमियों को ये कैसे अच्छा लगता? साल 1947 में, एशियन स्पोर्ट्स फेडरेशन ने इंडियन हॉकी फेडरेशन से अपनी टीम को टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए अनुमति भागी । इस प्रस्ताव के साथ यह शर्त रख दी, कि यह दौरा तभी मुमकिन है जब चंद टीम में खेले । अब इस प्रस्ताव को ठुकराना चंद के वश में नहीं था और वे टीम के कप्तान बने । टीम ने दौरे का आगाज जीत से किया। 23 नवंबर को टीम बम्बई से चली और 15 दिसंबर को मोबनसा पहुंची । जहां उसने 9 मैच खेले और सारे मैच जीते । दौरे के अंत तक उम्र के चालीसवे साल में होने पर शानदार प्रदर्शन किया ,उन्होंने खेले गए 22 मैच में 61 गोल दाग दिए । ईस्ट अफ्रीकन दौरे से वापिस आने के बाद साल 1948 की शुरुआत में चंद ने निश्चित किया । वह धीरे - धीरे हॉकी को अलविदा कह देंगे । फिर उन्होंने अपना ध्यान प्रदर्शनी मैच और राज्यों के खिलाफ मैच में लगाया । राज्य की टीम के सामने उन्होंने शेष भारत का प्रतनिधित्व करते थे । इस दौरान 1948 ओलंपिक भारतीय टीम ने चंद की टीम को 2-1 से हरा दिया। इस मैच में टीम का एकमात्र गोल चंद ने किया । चंद ने आखिरी मैच बंगाल के विरुद्ध खेला, जिसमें वो शेष भारत का प्रतनिधित्व कर रहे थे । ये मैच ड्रॉ में समाप्त हुआ । मैच के बाद बंगाल हॉकी एसोसिशन ने एक पब्लिक फंक्शन आयोजित किया, जिसमें ध्यानचंद के भारतीय हॉकी के प्रति सेवाओं के लिए सम्मान किया गया । सम्मान के साथ चंद का हॉकी कैरियर समाप्त हो गया ।उन्होंने 170 मैच में 585 गोल दागे अपने है हॉकी कैरियर में शानदार खेल से सबको आकर्षित किया ।जितना चंद का खेल का करिश्मा था उतने ही उनके खेल के किस्से भी मशहूर हुए। एक किस्सा यह है कि जब ध्यानचंद नीदरलैंड के खिलाफ खेले थे तो उनकी शानदार ड्रिबलिंग इस तरह थी कि विपक्षी उनसे गेंद छीन नहीं पा रहे थे और ध्यान चंद गोल पर गोल किए जा रहे थे, इसे देखकर नीदरलैंड के खिलाड़ियों को लगा कि चंद की हॉकी स्टिक में कोई मैगनेट है इससे वजह से गेम स्टिक से चिपकी है। तो उन्होंने रेफरी से शिकायत की चंद की हॉकी स्टिक में चुंबक है ।शिकायत मिलने पर चंद की स्टिक को चुंबक का परीक्षण करने के लिए बीच में से तोड़ दिया, पर चुंबक नहीं मिली। इसके बाद नई स्टिक से ध्यानचंद ने ज्यादा गोल किए। दूसरा किस्सा इससे भी ज्यादा दिलचस्प है ।हुआ यह था एक घरेलू मैच चल रहा था और ध्यान चंद बार-बार लॉन्ग शॉट ले रहे थे और बार-बार गोल पोस्ट की हुई बाहर निकल जाती और गोल नहीं होता ।बार-बार ऐसा होने पर ध्यानचंद परेशान हो गए और उन्होंने रेफरी से शिकायत की ,गोल पोस्ट की नाप ठीक नहीं है ।चंद की शिकायत पर गोल पोस्ट को जांचा गया तो मिला कि गोल पोस्ट की नाप गलत है जिससे आयोजकों ने गलती से बना दिया था। हॉकी को अलविदा कहने के बाद चंद ने अब भारतीय सेना में अपनी आपातकालीन कमीशन की सेवाओं को जारी रखा । साल 1951 में चंद के सम्मान में भारत के नेशनल स्टेडियम में ध्यानचंद टूर्नामेंट का आयोजन हुआ जिसे ध्यानचंद ने दर्शक के रूप में बैठकर आनंद लिया। लगभग 34 साल की सेवा के बाद चंद ने 29 अगस्त 1956 को सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर रिटायरमेंट लिया । उसी साल भारत ने ध्यानचंद को पदम भूषण से सम्मानित किया, जोकि भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने माउंट आबू राजस्थान में एक कोचिंग कैंपस शुरू किया ।बाद में उन्हें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स पटियाला में मुख्य हॉकी कुछ नियुक्त किया गया ,जिसका दायित्व उन्होंने अगले कुछ सालों तक निभाया । चंद ने अपने जीवन का आखिरी समय अपने घर झांसी उत्तर प्रदेश में गुजारा । एक और किस्सा है चंद का, आखिरी समय में चंद को लिवर कैंसर की समस्या से गुजरना पड़ा । उनकी हालत इतनी कमजोर हो गई थी कि उन्हें ऐम्स दिल्ली में भर्ती कराना पड़ा और कमजोर इतनी हालत हो चुकी थी कि लोगों ने उन्हें पहचान नहीं पाए । मात्र ₹180 की पेंशन पर उन्हें अपना इलाज एम्स में एक आम नागरिक की तरह करना पड़ा, सरकार ने उनके कष्ट समय में उनकी सुध नहीं ली और बीमारी से लड़ते हुए 3 दिसंबर 1979 उन्होंने एम्स दिल्ली में अपनी आखिरी सांस ली । LEGACY ध्यानचंद हॉकी जगत में न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में में एक महान खिलाड़ी थे। उनकी लाजवाब ड्रिबलिंग स्किल , हॉकी स्किल को खेल से जुड़े लोगों ने अपने अपनी पूरी तरह से ग्लोरिफाई किया और उसे किस्से के रूप में याद किया । ध्यानचंद ना केवल अपनी पीढ़ी के सुपरस्टार से बल्कि उन्होंने आने वाली कई पीढ़ियों को हॉकी की तरफ आकर्षित किया। बहुत सारे हॉकी प्लेयर्स ने ध्यानचंद को अपना आदर्श बताया है और उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए हॉकी खेलना शुरू किया । चंद के जन्मदिन यानी 29 अगस्त को भारत सरकार ने खेल दिवस घोषित किया । इस दिन भारत के राष्ट्रपति राष्ट्रपति भवन में अर्जुन अवार्ड ,द्रोणाचार्य पुरस्कार, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार खेल क्षेत्र से जुड़ी हुई हस्तियों को देते हैं । साल 2012 में बीसवें नेशनल अवार्ड्स के दौरान भारत सरकार द्वारा ध्यानचंद को मरणोपरांत जैम ऑफ इंडिया चेन नवाजा गया, जिसे ध्यानचंद के बेटे अशोक ध्यानचंद ने ग्रहण किया । साल 2002 में भारत का सबसे बड़ा खेल अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार " ध्यान चंद अवॉर्ड " दिया जाने लगा यह अवार्ड उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिन्होंने अपने खेल के दौरान खेल को उठाया हो और उसके बाद भी खेल के प्रति अपना योगदान दिया हो । साल 2002 में ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एक हॉस्टल का नाम ध्यानचंद के नाम पर रखा गया लंदन में जिमखाना का नाम भी ध्यानचंद के नाम पर रखा गया। भारत सरकार ने ध्यानचंद के सम्मान में पोस्टल स्टांप पेपर छपवाया और फर्स्ट ड्राइं कलर भी । यह सम्मान पाने वाले वह इकलौते भारतीय हॉकी खिलाड़ी हैं । इसके साथ साथ विभिन्न राज्य सरकारों ने ध्यानचंद के सम्मान में कई अवार्ड और स्कॉलरशिप देने की सुविधा शुरू की है । ध्यानचंद के सम्मान में झांसी में सीपरी में एक ऊंची पहाड़ी पर ध्यानचंद की हॉकी खेलते हुए एक मूर्ति बनाई गई जै झांसी के प्रति ध्यानचंद के लगाव को दर्शाती है ।

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Major Dhyanchand Biography Author : Sachin Goswami Voiceover Artist : RJ Chaitali मेजर ध्यानचंद | लेखक - सचिन गोस्वामी in Hindi, is one of our best biography stories available in Hindi in our catalog. This story is created by SACHIN GOSWAMI. SACHIN GOSWAMI is a prominent personality known for writing biography stories. Biography stories not just talk about the life of a person and his/her achievements but their struggles as well. A successful person is not just known for his luxurious life but due to his hard work. There are so many celebrities, sportspersons, and businessmen who have worked hard throughout their lives. And we get to learn a lot from their life. Hence, biography stories are of great help if you are seeking motivation to work hard. The inspiration we get from people is the stepping stones that lead us to a successful goal. If we apply the rules they’ve applied then we are sure to get what they achieved. We understand that our users emotionally connect with the audios more when it is in their language. Hence, we offer a variety of biography stories in different languages like Hindi, Gujarati, Telugu, Marathi, Bangla, etc. These biography stories are available for free and can be downloaded and saved on our app. And the best part is that you can access it while traveling, while working out in the gym, and doing anything, anywhere at any point of time be it early morning or late at night. So, stream, download, and enjoy the ad-free experience.मेजर ध्यानचंद | लेखक - सचिन गोस्वामी हिंदी में, हमारी सूची में हिंदी में उपलब्ध हमारी सर्वश्रेष्ठ जीवनी कहानियों में से एक है । यह कहानी SACHIN GOSWAMI द्वारा लिखी गई है। SACHIN GOSWAMI जीवनी कहानियां सुनाने के लिए जाना जाने वाला एक प्रमुख व्यक्तित्व है । जीवनी कहानियां न सिर्फ किसी व्यक्ति के जीवन और उसकी उपलब्धियों के बारे में बात करती हैं बल्कि उनके संघर्षों के बारे में भी बात करती हैं । एक सफल व्यक्ति सिर्फ अपनी आलीशान जिंदगी के लिए नहीं बल्कि अपनी मेहनत के कारण जाना जाता है। ऐसी कई हस्तियां, खिलाड़ी और बिजनेसमैन हैं, जिन्होंने जिंदगी भर मेहनत की है। और हमें उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । इसलिए, जीवनी कहानियों बहुत मदद की है अगर आप कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरणा ढूंढ रहे हैं तो । प्रेरणा हमें लोगों के दृड़संकल्प व एक सफल लक्ष्य के लिए नेतृत्व रखने वालो से मिलती है। हम समझते हैं कि हमारे उपयोगकर्ता भावनात्मक रूप से ऑडियो के साथ अधिक कनेक्ट करते हैं जब यह उनकी भाषा में होता है। इसलिए, हम हिंदी, गुजरती, तेलुगू, मराठी, बांग्ला आदि जैसी विभिन्न भाषाओं में विभिन्न प्रकार की जीवनी कहानियां पेश करते हैं। ये जीवनी कहानियां मुफ्त में उपलब्ध हैं और हमारे ऐप पर डाउनलोड किए जा सकते हैं। और सबसे अच्छी बात यह है कि आप इसे यात्रा करते समय, जिम में काम करते समय, और कुछ भी काम करते समय, इसे किसी भी समय - सुबह जल्दी या देर रात में सुन सकते है । इसलिए, विज्ञापन-मुक्त अनुभव को स्ट्रीम करें, डाउनलोड करें और आनंद लें।